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मार्च, 14, 2026
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संत ने बताया परमात्मा को पाने का सबसे सीधा तरीका, कहा- ‘मंदिर नहीं, घर में छिपे हैं भगवान’

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पूर्णिया न्यूज़: क्या भगवान सिर्फ मंदिरों और मूर्तियों में बसते हैं? क्या लंबे-चौड़े अनुष्ठान और यज्ञ ही परमात्मा तक पहुंचने का एकमात्र रास्ता हैं? पूर्णिया में हुए एक सत्संग में संत अभय साहेब ने इन सभी सवालों का एक ऐसा जवाब दिया, जिसने लोगों को अपनी आस्था और भक्ति के बारे में नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया. उन्होंने ईश्वर को पाने का जो सबसे सरल रास्ता बताया, वो किसी तीर्थ में नहीं, बल्कि आपके अपने घर में ही मौजूद है.

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संत अभय साहेब ने श्रद्धालुओं की एक विशाल सभा को संबोधित करते हुए कहा कि हम मंदिरों में देवियों की पूजा करते हैं, लेकिन घर में मौजूद जीवित देवियों, यानी अपनी मां, बहन, पत्नी और बेटी का सम्मान करना भूल जाते हैं. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो व्यक्ति नारी का सम्मान नहीं कर सकता, उसकी पूजा-पाठ और भक्ति व्यर्थ है. परमात्मा की सच्ची भक्ति का सीधा संबंध नारी के सम्मान से है.

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घर की ‘देवी’ का अपमान, फिर मंदिर में कैसी पूजा?

अपने प्रवचन में उन्होंने सामाजिक पाखंड पर गहरा प्रहार किया. संत अभय ने कहा, “यह कैसा विरोधाभास है कि हम एक पत्थर की मूर्ति को पूजते हैं, उसे भोग लगाते हैं, लेकिन घर की लक्ष्मी (पत्नी) को अपमानित करते हैं, उसे भूखा रखते हैं. जिस घर में नारी का अनादर होता है, वहां कभी भी परमात्मा का वास नहीं हो सकता.” उन्होंने जोर देकर कहा कि शास्त्रों और वेदों का भी यही सार है कि जहां नारी की पूजा होती है, यानी उसे सम्मान दिया जाता है, देवता वहीं निवास करते हैं.

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उन्होंने आगे कहा कि ईश्वर को पाने के लिए जंगलों या पहाड़ों में भटकने की जरूरत नहीं है. ईश्वर आपके कर्मों में बसता है. यदि आप अपने परिवार की महिलाओं को आदर और सम्मान देते हैं, तो यह किसी भी बड़ी पूजा या अनुष्ठान से बढ़कर है. यही सच्ची और जीवित भक्ति है.

सच्ची भक्ति का मार्ग आडंबर नहीं, आदर है

संत अभय साहेब ने लोगों को बाहरी आडंबरों से बचकर सच्ची आंतरिक भक्ति का मार्ग अपनाने की सलाह दी. उन्होंने कहा कि परमात्मा भाव के भूखे हैं, दिखावे के नहीं. सच्ची भक्ति का सार इन सिद्धांतों में छिपा है:

  • नारी का सम्मान: परिवार और समाज में हर महिला को पूरा सम्मान देना ही पहली भक्ति है.
  • सेवा भाव: जरूरतमंदों और माता-पिता की सेवा करना किसी भी तीर्थ यात्रा से बढ़कर है.
  • कर्म की शुद्धता: अपने कर्मों को शुद्ध रखें, क्योंकि ईश्वर आपके चढ़ावे को नहीं, आपके कर्मों को देखता है.
  • आंतरिक शांति: सच्ची भक्ति मन की शांति से आती है, न कि शोर-शराबे वाले अनुष्ठानों से.
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संत के इन विचारों ने वहां मौजूद हर व्यक्ति को गहराई से प्रभावित किया. उनका संदेश स्पष्ट था – अगर आप ईश्वर को खोजना चाहते हैं, तो इसकी शुरुआत अपने घर से, अपनी सोच से और नारी को सम्मान देने से करें.

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