Sheikhpura Mukhiya News: शेखपुरा जिले में एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान बड़ा विवाद सामने आया है। बरबीघा प्रखंड की सामास बुजुर्ग पंचायत की निर्वाचित महिला मुखिया बेबी देवी मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की उपस्थिति में आयोजित इस कार्यक्रम के मंच पर उन्हें जगह न दिए जाने से बेहद नाराज हो गईं। उन्होंने इसे महिला जनप्रतिनिधियों का घोर अपमान करार दिया है।
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यह घटना मंगलवार को बरबीघा प्रखंड के सामास बुजुर्ग पंचायत में आयोजित एक सहयोग शिविर कार्यक्रम के दौरान हुई। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी इस कार्यक्रम में उपस्थित थे, जिसके चलते यह आयोजन काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा था। इसी दौरान, पंचायत की स्थानीय मुखिया बेबी देवी मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा पाने के कारण बेहद खफा दिखाई दीं। श्रीमती देवी ने बताया कि वह जनता द्वारा चुनी गई एक प्रतिनिधि हैं, लेकिन उन्हें मंच पर बैठने के लिए स्थान नहीं दिया गया। उन्होंने इस घटना को जनप्रतिनिधियों के सम्मान से जुड़ा हुआ एक गंभीर मामला बताया और अपनी नाराजगी सार्वजनिक रूप से व्यक्त की। उनका कहना था कि यदि स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधियों को ही उचित सम्मान नहीं मिलेगा, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का ही अपमान है।
मंच पर नहीं मिली जगह, फूटा गुस्सा
महिला मुखिया बेबी देवी ने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए कहा कि पंचायत की निर्वाचित प्रतिनिधि होने के बावजूद उन्हें मंच पर उचित स्थान नहीं दिया गया, जबकि वे अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं। इस घटना को लेकर उनका गुस्सा साफ दिखाई दिया। उन्होंने इस तरह के आयोजनों में स्थानीय जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा किए जाने पर कड़ा एतराज जताया। उन्होंने आगे कहा कि महिला सम्मान के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। सरकार एक ओर महिलाओं को आरक्षण देकर उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर चुने हुए महिला प्रतिनिधियों को ही अनदेखा किया जाता है। इस घटना ने एक बार फिर Bihar Mahila Samman के दावों पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
क्या केवल भाषणों तक सीमित है महिला सशक्तिकरण?
श्रीमती देवी ने साफ शब्दों में कहा कि यदि जनता द्वारा चुनी गई महिला मुखिया को ही ऐसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में उचित सम्मान नहीं मिलेगा, तो महिला सशक्तिकरण और उनकी भागीदारी की बातें केवल भाषणों तक ही सीमित रह जाएंगी। उन्होंने यह भी जोड़ा कि पंचायत स्तर पर जनप्रतिनिधि दिन-रात जनता की समस्याओं के समाधान के लिए प्रयासरत रहते हैं। इसके बावजूद, जब बड़े सरकारी कार्यक्रमों में इन्हीं स्थानीय प्रतिनिधियों को महत्व नहीं दिया जाता, तो उनका मनोबल बुरी तरह प्रभावित होता है। उनका मानना है कि ऐसे व्यवहार से जनप्रतिनिधियों की कार्यक्षमता पर भी नकारात्मक असर पड़ता है और जनता के साथ उनका जुड़ाव कमजोर होता है।
इस मामले पर मुखिया प्रतिनिधि पिंटू पासवान ने भी अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि जो राजनीतिक दल महिलाओं के सम्मान और अधिकारों की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, उन्हें सबसे पहले अपने ही कार्यक्रमों में महिला जनप्रतिनिधियों को सम्मान देना सीखना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि जनता द्वारा चुनी गई एक महिला प्रतिनिधि को मंच पर स्थान न मिलना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। यह घटना कार्यक्रम में मौजूद लोगों के बीच भी चर्चा का विषय बनी रही। कई लोगों ने इस पूरे प्रकरण को स्थानीय जनप्रतिनिधियों के मान-सम्मान से जुड़ा एक संवेदनशील मुद्दा बताया। उनका कहना था कि ऐसे आयोजनों में प्रोटोकॉल का सही ढंग से पालन होना चाहिए और चुने हुए प्रतिनिधियों को उनका वाजिब हक मिलना चाहिए।
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फिलहाल इस पूरे मामले पर प्रशासन या कार्यक्रम आयोजकों की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। इस घटना के बाद स्थानीय राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी जोरदार चर्चा शुरू हो गई है। लोग इस बात पर विचार कर रहे हैं कि महिला सशक्तिकरण के दावों को जमीनी स्तर पर कैसे और बेहतर तरीके से लागू किया जाए। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि इस विवाद पर संबंधित पक्ष क्या स्पष्टीकरण देते हैं और भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं। यह घटना लोकतांत्रिक ढांचे में जनप्रतिनिधियों के सम्मान और महिला सशक्तिकरण की बहस को एक नई दिशा दे सकती है।







