
समस्तीपुर: बिहार के समस्तीपुर जिले में एचआइवी/एड्स की रोकथाम के लिए सरकारी अमला करोड़ों रुपये खर्च कर रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके ठीक विपरीत नजर आती है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा चलाए जा रहे जागरूकता अभियान और कार्यक्रमों के बावजूद जिले में लोगों के बीच एचआइवी/एड्स को लेकर जागरूकता का घोर अभाव देखा जा रहा है। यह स्थिति सरकारी महकमे के लाख दावों की पोल खोल रही है और इन कार्यक्रमों की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
एचआइवी/एड्स जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारी के प्रति लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से सरकार हर साल करोड़ों की राशि का आवंटन करती है। इन पैसों से विभिन्न माध्यमों से प्रचार-प्रसार, कार्यशालाओं का आयोजन, और स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा जागरूकता फैलाने का काम किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को इस बीमारी के कारणों, बचाव के उपायों और इसके प्रति सामाजिक बहिष्कार को समाप्त करना है। लेकिन समस्तीपुर के आंकड़े और आम लोगों से बातचीत यह दर्शाती है कि यह जागरूकता अभियान अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में बुरी तरह विफल साबित हो रहे हैं।
ग्रामीण इलाकों में विशेष चिंता का विषय
विशेषकर ग्रामीण और सुदूर इलाकों में स्थिति अधिक चिंताजनक है। इन क्षेत्रों में रहने वाले अधिकांश लोग एचआइवी/एड्स के संक्रमण के तरीकों, सुरक्षित यौन संबंधों के महत्व और कंडोम के उपयोग के बारे में अनभिज्ञ हैं। स्वास्थ्य केंद्रों पर भी इस विषय पर पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा रही है, जिससे लोग भ्रमित और असुरक्षित स्थिति में जी रहे हैं। कई बार तो लोग इस बीमारी से जुड़े मिथकों और गलत धारणाओं का शिकार हो जाते हैं, जो संक्रमण के प्रसार को और बढ़ाता है।
जिला मुख्यालय और शहरी क्षेत्रों में भले ही थोड़ी बहुत जागरूकता नजर आती हो, लेकिन वह भी शत-प्रतिशत नहीं है। सार्वजनिक स्थानों पर लगने वाले पोस्टर, बैनर और नुक्कड़ नाटकों का असर सीमित दायरे तक ही रहता है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि वे नियमित रूप से जागरूकता कार्यक्रम चला रहे हैं और आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से लोगों तक जानकारी पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों को झुठलाती नजर आती है।
सरकारी प्रयासों पर सवाल
सवाल यह उठता है कि जब सरकार इस बीमारी की रोकथाम के लिए भारी भरकम राशि खर्च कर रही है, तो फिर भी जागरूकता का यह अभाव क्यों है? क्या इन कार्यक्रमों का क्रियान्वयन सही तरीके से हो रहा है? क्या आवंटित राशि का सदुपयोग हो रहा है? या फिर जागरूकता फैलाने के तरीकों में बदलाव की जरूरत है? इन सवालों के जवाब तलाशे बिना एचआइवी/एड्स जैसी गंभीर बीमारी पर अंकुश लगाना मुश्किल है।
यह आवश्यक है कि सरकारी जागरूकता कार्यक्रमों को अधिक प्रभावी और जन-केंद्रित बनाया जाए। केवल राशि खर्च करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि यह सुनिश्चित करना होगा कि जानकारी सही व्यक्ति तक, सही समय पर और सही तरीके से पहुंचे। समुदाय-आधारित संगठनों और स्वयंसेवी संस्थाओं को भी इस अभियान में सक्रिय रूप से जोड़ा जाना चाहिए ताकि जमीनी स्तर पर लोगों को जोड़ा जा सके।

