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मार्च, 17, 2026
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हवाई जहाज में स्वदेशी पायलटों की भरमार, फिर भी उड़ानों को क्यों चाहिए विदेशी ‘सारथी’?

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दिल्ली न्यूज़: देश का एविएशन सेक्टर आजकल चर्चा का विषय बना हुआ है, खासकर इंडिगो के ऑपरेशनल संकट के बाद। एक तरफ़ हज़ारों की संख्या में भारतीय पायलट तैयार खड़े हैं, वहीं दूसरी तरफ़ विदेशी पायलटों की ज़रूरत क्यों पड़ रही है? संसद में पेश एक रिपोर्ट ने इस उलझन को सुलझाया है।

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नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री मुरलीधर मोहोल ने संसद में देश की हवाई यात्रा व्यवस्था से जुड़ी एक अहम रिपोर्ट पेश की है। उन्होंने बताया कि भारत की छह प्रमुख घरेलू एयरलाइंस के बेड़े में कुल 13,989 पायलट शामिल हैं। यह आँकड़ा भारतीय विमानन क्षेत्र के बढ़ते क़द को दर्शाता है, लेकिन इसी के साथ यह सवाल भी खड़ा होता है कि इतनी बड़ी संख्या में स्वदेशी पायलटों के होते हुए भी विदेशी पायलटों की आवश्यकता क्यों पड़ती है?

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देश में कितने पायलट?

मंत्री मोहोल ने राज्यसभा में दिए अपने लिखित जवाब में विभिन्न एयरलाइंस के पायलटों की संख्या का विस्तृत ब्यौरा दिया। आंकड़ों के अनुसार:

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  • एयर इंडिया के पास 6,350 पायलट हैं।
  • एयर इंडिया एक्सप्रेस के पास 1,592 पायलट तैनात हैं।
  • देश की सबसे बड़ी घरेलू एयरलाइन इंडिगो के बेड़े में 5,085 कॉकपिट क्रू सदस्य हैं।
  • अकासा एयर में 466 पायलट कार्यरत हैं।
  • स्पाइसजेट के पास 385 पायलट हैं।
  • सरकारी स्वामित्व वाली एलायंस एयर में 111 पायलट सेवाएं दे रहे हैं।
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ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारतीय विमानन क्षेत्र में तेजी से विस्तार हो रहा है और पायलटों की मांग भी लगातार बढ़ रही है।

विदेशी पायलटों की ज़रूरत क्यों?

लगभग 14,000 भारतीय पायलटों की मौजूदगी के बावजूद, एयरलाइंस को विदेशी पायलटों की आवश्यकता पड़ रही है। इस स्थिति पर स्वयं मंत्री मोहोल ने स्पष्टीकरण दिया। उन्होंने बताया कि एयरलाइन कंपनियों के बेड़े (फ्लीट) में लगातार विस्तार हो रहा है, और उन्हें समय पर उड़ानों का संचालन सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रशिक्षण प्राप्त ‘रेटेड पायलटों’ की ज़रूरत होती है। कई आधुनिक और नए विमान ऐसे होते हैं, जिनके संचालन के लिए विशिष्ट प्रकार की ट्रेनिंग अनिवार्य होती है। यह विशेष प्रशिक्षण हर भारतीय पायलट को तुरंत उपलब्ध नहीं हो पाता। ऐसी परिस्थितियों में, एयरलाइंस अस्थायी आधार पर अंतरराष्ट्रीय पायलटों को नियुक्त करती हैं। इसका मुख्य उद्देश्य उड़ानों में किसी भी प्रकार की देरी या रद्दीकरण से बचना और हवाई संचालन को सुचारू बनाए रखना है।

पायलट प्रशिक्षण में तेज़ी

मंत्री ने संसद को सूचित किया कि देश में फ्लाइंग ट्रेनिंग ऑर्गेनाइजेशन (FTOs) का नेटवर्क तेजी से विस्तृत हो रहा है। नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) ने नवंबर तक FTOs को 61 नए प्रशिक्षण विमानों को अपने बेड़े में शामिल करने की अनुमति दी है, जिससे देश में पायलट प्रशिक्षण की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसके अतिरिक्त, वर्ष 2025 में दो नए FTOs को भी मंज़ूरी दी गई है।

वर्तमान में, देश भर के 62 विभिन्न स्थानों पर 40 FTOs सक्रिय रूप से कार्यरत हैं और वे लगातार अपनी प्रशिक्षण सुविधाओं को आधुनिक बना रहे हैं। इन प्रयासों से यह उम्मीद की जा रही है कि आने वाले वर्षों में भारत की विदेशी पायलटों पर निर्भरता धीरे-धीरे कम होगी और देश आत्मनिर्भर बन पाएगा।

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मंत्रालय का हस्तक्षेप कितना?

नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री मुरलीधर मोहोल ने इस बात पर स्पष्टता दी कि फ्लाइंग ट्रेनिंग की सुविधाओं का विस्तार और उनका संचालन पूरी तरह से बाज़ार की ताक़तों पर निर्भर करता है। FTOs अपने व्यावसायिक निर्णयों के आधार पर यह तय करते हैं कि वे कितने प्रशिक्षण विमान शामिल करेंगे या कितने प्रशिक्षकों को नियुक्त करेंगे। नागरिक उड्डयन मंत्रालय सीधे तौर पर इन निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं करता है।

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भविष्य की तस्वीर

वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए, यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जब तक भारतीय विमानन उद्योग में बेड़े का तेज़ी से विस्तार होता रहेगा और नए आधुनिक विमान शामिल किए जाते रहेंगे, तब तक विदेशी पायलटों की मांग बनी रहेगी। हालांकि, भारत में FTOs की बढ़ती क्षमता और पायलट प्रशिक्षण की गुणवत्ता में हो रहे सुधारों के साथ, यह उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले वर्षों में विदेशी पायलटों पर हमारी निर्भरता धीरे-धीरे कम होगी और देश के अपने प्रशिक्षित पायलट इस मांग को पूरा करने में सक्षम होंगे।

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