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फ़रवरी, 27, 2026
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Karnataka Politics: कर्नाटक कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर मचा घमासान, डीके शिवकुमार के समर्थक विधायकों ने की ताजपोशी की मांग

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Karnataka Politics: कर्नाटक की सियासी बिसात पर एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर बिसात बिछाई जा रही है, जहां उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के खेमे में हलचल तेज हो गई है। बेंगलुरु के एक निजी होटल में हुई विधायकों की गुप्त बैठक ने आलाकमान पर दबाव बढ़ा दिया है कि वे शिवकुमार को राज्य के शीर्ष पद पर आसीन करें।

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कर्नाटक पॉलिटिक्स: कर्नाटक कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर मचा घमासान, डीके शिवकुमार के समर्थक विधायकों ने की ताजपोशी की मांग

कर्नाटक पॉलिटिक्स: कुर्सी की जंग और डीके शिवकुमार के 40 समर्थक विधायकों का शक्ति प्रदर्शन

राज्य की सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी में नेतृत्व को लेकर चल रहा विवाद अब एक अहम मोड़ पर पहुँच गया है। उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के वफादार विधायकों ने बेंगलुरु के एक निजी होटल में अपनी ताकत का प्रदर्शन करते हुए पार्टी आलाकमान से खुले तौर पर मांग की है कि डी.के. शिवकुमार को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया जाए। यह घटनाक्रम कर्नाटक पॉलिटिक्स के गलियारों में तूफान ले आया है।

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मगाडी के विधायक एच.सी. बालकृष्ण द्वारा बुलाई गई इस बैठक ने सियासी तापमान को और बढ़ा दिया है। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, करीब 40 विधायक इस रणनीति बैठक में शामिल हुए। भले ही इसे बालकृष्ण के जन्मदिन के उपलक्ष्य में एक अनौपचारिक मिलन समारोह बताया गया, लेकिन अंदरूनी चर्चाएँ पूरी तरह से नेतृत्व परिवर्तन और मुख्यमंत्री पद की दौड़ पर केंद्रित थीं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

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कांग्रेस सूत्रों ने बताया कि गुरुवार रात को लगभग ‘‘समान विचारधारा वाले 40 विधायक’’ एक होटल में इकट्ठा हुए और यह तय किया कि वे शिवकुमार को मुख्यमंत्री पद पर आसीन कराने के लिए मिलकर पार्टी आलाकमान से पैरवी करेंगे। बालकृष्ण ने संवाददाताओं से बातचीत में बताया कि उनका जन्मदिन शनिवार को है, इसलिए उन्होंने गुरुवार को ही “समान विचारधारा वाले” लोगों को मिलने के लिए आमंत्रित किया था।

जब उनसे बैठक में हुई चर्चा के बारे में पूछा गया, तो बालकृष्ण ने साफ तौर पर कहा कि “यदि पार्टी में ऐसी ही स्थिति बनी रही तो भविष्य में हमारे लिए कठिनाई होगी।” उन्होंने शीर्ष नेतृत्व से इस नेतृत्व विवाद को जल्द से जल्द सुलझाने का आग्रह किया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह मामला दिल्ली ले जाने का नहीं है, बल्कि दिल्ली में बैठे आलाकमान को कर्नाटक में चल रही इन घटनाओं की पूरी जानकारी है।

बालकृष्ण ने बताया कि जब कांग्रेस विधायक अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में जाते हैं, तो उन्हें नेतृत्व परिवर्तन को लेकर लगातार जनता और कार्यकर्ताओं के सवालों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा, ‘‘हमारे क्षेत्रों में यही चर्चा होती है और इससे हम असहज महसूस करते हैं। हमें शीर्ष नेतृत्व से इस पर विराम लगाने का अनुरोध करना चाहिए।’’

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ढाई साल का फार्मूला और 2028 के चुनाव पर असर

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि नेताओं को अलग-अलग बुलाकर समाधान नहीं निकलेगा, बल्कि जब विधायक एक साथ मिलते हैं, तो स्वाभाविक रूप से इस विषय पर बातचीत होती है। कई विधायकों का मानना है कि जब तक यह मुख्यमंत्री पद की दौड़ का मुद्दा सुलझेगा नहीं, तब तक पार्टी के लिए स्थिति कठिन रहेगी और भविष्य अनिश्चित रहेगा। बालकृष्ण ने यहाँ तक संकेत दिया कि इस अनिश्चितता का असर 2028 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की स्थिति पर भी पड़ सकता है।

कर्नाटक कांग्रेस इकाई के अध्यक्ष पद में बदलाव की मांग पर बालकृष्ण ने कहा कि यदि शीर्ष नेतृत्व चाहे तो बदलाव कर सकता है। डी.के. शिवकुमार पिछले 10 वर्षों से इस पद पर हैं। उन्होंने कहा, ‘‘हम केवल अंतिम निर्णय चाहते हैं। अध्यक्ष बदलें या कोई और, यह मुख्य बात नहीं है। हमारी मांग है कि यहाँ पार्टी की स्थिति को अंतिम रूप दिया जाए।’’ आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

यह पूछे जाने पर कि क्या वह सीधे तौर पर मुख्यमंत्री बदलने की वकालत कर रहे हैं, बालकृष्ण ने कहा, ‘‘शीर्ष नेतृत्व ने कहा है कि निर्णय लिया जाएगा। अध्यक्ष बदलना हो या मुख्यमंत्री, यह उनका अधिकार है। लेकिन निर्णय अवश्य होना चाहिए। हम चाहते हैं कि भ्रम समाप्त हो।’’ यह बैठक 6 मार्च से शुरू हो रहे कर्नाटक विधानसभा के बजट सत्र से लगभग एक सप्ताह पहले हुई है, जिसने सियासी सरगर्मी और बढ़ा दी है।

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कुछ अन्य विधायकों ने भी नाम न छापने की शर्त पर कहा कि वे चाहते हैं कि डी.के. शिवकुमार, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का स्थान लें। राज्य में यह सत्ता संघर्ष नवंबर 2025 से और तेज हुआ है, जब कांग्रेस सरकार ने अपने ढाई वर्ष का कार्यकाल पूरा किया।

कांग्रेस के सत्ता में आने के समय ऐसी खबरें आई थीं कि सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच सत्ता-साझाकरण का समझौता हुआ था, जिसके तहत सिद्धारमैया पहले ढाई वर्ष मुख्यमंत्री रहेंगे और उसके बाद शिवकुमार कार्यभार संभालेंगे। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि कभी नहीं हुई। शिवकुमार समय-समय पर संकेत देते रहे हैं कि ऐसा समझौता हुआ था और इसके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है। वहीं, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का कहना है कि वह पूरे पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा करेंगे। यह सियासी रस्साकशी फिलहाल थमती नजर नहीं आ रही है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

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