



Vande Mataram Controversy: जब राष्ट्र और आस्था के बीच की रेखा उलझ जाए, तो विवादों का जन्म निश्चित है। केंद्र सरकार के एक निर्देश ने देश में ऐसी ही बहस छेड़ दी है, जिसमें जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है।
वंदे मातरम विवाद: मदनी का आरोप – अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों पर हमला
वंदे मातरम विवाद: केंद्र के निर्देश पर मदनी का सीधा हमला
Vande Mataram Controversy: जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने गुरुवार को केंद्र सरकार के उस निर्देश की कड़ी आलोचना की है, जिसमें आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगान से पहले वंदे मातरम के सभी छह श्लोकों को बजाना अनिवार्य किया गया है। उन्होंने इस कदम को ‘धार्मिक स्वतंत्रता पर खुला हमला’ और ‘अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन’ करार दिया है।
यह निर्देश केंद्रीय गृह मंत्रालय (एमएचए) द्वारा राष्ट्रगान और वंदे मातरम के लिए विस्तृत दिशानिर्देश जारी करने के बाद आया है। इन दिशानिर्देशों में स्पष्ट कहा गया है कि जब किसी कार्यक्रम में राष्ट्रगान और वंदे मातरम दोनों प्रस्तुत किए जाते हैं, तो पहले वंदे मातरम के आधिकारिक संस्करण के सभी छह श्लोक बजाए जाने चाहिए। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
एक सोशल मीडिया पोस्ट में, मौलाना मदनी ने केंद्र सरकार के इस ‘एकतरफा और दबावपूर्ण’ निर्णय को ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत घोषित करने और उसके सभी श्लोकों को सभी सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों, कॉलेजों और समारोहों में अनिवार्य करने को न केवल भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता पर एक स्पष्ट हमला बताया, बल्कि इसे अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों को कम करने का एक ‘सुनियोजित प्रयास’ भी करार दिया है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि मुसलमान किसी को भी ‘वंदे मातरम’ गाने या बजाने से नहीं रोकते। हालांकि, गीत के कुछ श्लोक ऐसी मान्यताओं पर आधारित हैं जो मातृभूमि को देवता के रूप में चित्रित करते हैं। यह एकेश्वरवादी धर्मों की मूलभूत मान्यताओं के विपरीत है। चूंकि एक मुसलमान केवल एक अल्लाह की पूजा करता है, इसलिए उसे यह गीत गाने के लिए मजबूर करना संविधान के अनुच्छेद 25 और सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णयों का स्पष्ट उल्लंघन है।
धार्मिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर खतरा
मौलाना मदनी ने आगे कहा कि यह निर्णय धार्मिक स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान को कमजोर करता है, और सच्ची देशभक्ति के बजाय राजनीति को दर्शाता है। उनकी पोस्ट में यह भी लिखा था कि इस गीत को अनिवार्य बनाना और नागरिकों पर इसे थोपने का प्रयास देशभक्ति की अभिव्यक्ति नहीं है; बल्कि यह ‘चुनावी राजनीति, सांप्रदायिक एजेंडा और मूलभूत मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने का जानबूझकर किया गया प्रयास’ है।
अपने देश के प्रति सच्चे प्रेम का मापदंड नारों में नहीं, बल्कि चरित्र और बलिदान में निहित है। इसके ज्वलंत उदाहरण मुसलमानों और जमीयत उलेमा-ए-हिंद के ऐतिहासिक संघर्ष में स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। ऐसे निर्णय देश की शांति, एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करते हैं और संविधान की भावना को ठेस पहुंचाते हैं। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: https://deshajtimes.com/news/national/
यह याद रखना चाहिए कि मुसलमान केवल एक ईश्वर की पूजा करते हैं; वे सब कुछ सहन कर सकते हैं, लेकिन वे ईश्वर के साथ किसी को शरीक करना स्वीकार नहीं कर सकते। इसलिए, ‘वंदे मातरम’ को अनिवार्य बनाना संविधान, धार्मिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर स्पष्ट हमला है, आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।



