
संजय कुमार राय, देशज टाइम्स अपराध ब्यूरो प्रमुख। शरीर पर पुलिस की वर्दी, ऊपर से कई आंकाओं का संरक्षण, ऐसे में डर किसका? एक सिपाही होकर पुलिस लाइन के कई पदाधिकारियों के साथ गाली-गलौज करना कहां तक जायज और कितना नाजायज? अनुशासनिक व्यवस्था को तार-तार करना और रौब दिखाना शायद कोई आईपीएस भी नहीं कर सकता।
यह हम नहीं कह रहें हैं, बल्कि पुलिस विभाग के एक-एक सिपाही से लेकर पुलिस लाइन के पदाधिकारी कह रहें हैं। और, हम जो एक ऑडियो आपको सुना रहे हैं उसकी आवाज और खनक से भी पता चल ही जाएगा पाठकों को कि इनका चिल्लाना सब पर भारी हैं। लोग नाम बताना नहीं चाहते, लेकिन दबी जुबान से बताते भी हैं। Sanjay Kumar Roy की EXCLUSIVE रिपोर्ट
इसके बाद सवाल उठ खड़ा होता है कि कौन हैं राजू यादव। शायद इनसे एसएसपी और आईजी भली-भांति अवगत होंगे। क्योंकि, विभाग के बड़े पदाधिकारी हैं। और उनके मातहत काम करने वाले अदना सा सिपाही राजू यादव हैं। कई पुलिसकर्मी ही बताते हैं कि यह कथित पुलिस मेंस एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं।
इन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि एसोसिएशन के पदाधिकारी बड़े ओहदे और ताकतवर होते हैं। इसी का नतीजा हुआ कि इनकी गुंडागर्दी विख्यात हो गई। पुलिस पदाधिकारी तो डरने ही लगे, आम आदमी भी भयाक्रांत हो गया।
इन्हें यह पता नहीं हैं कि आम लोग पुलिस की वर्दी की कितनी इज्जत करते हैं। आम लोग अपनी सीमा समझते हैं। लेकिन, यह वर्दी में अपनी सीमा लांघ जाते हैं। वे खुद को पहचान नहीं पाते कि वो एक सिपाही मात्र हैं। सिपाही राजू को शायद यह पता नहीं हैं कि उनकी गलतियों पर उनके एसएसपी ही उनके विरुद्ध बर्खास्तगी तक की कार्रवाई कर सकते हैं?
दरभंगा आईजी ललन मोहन प्रसाद ने इनकी गुंडागर्दी पर विराम लगाने और विभाग को व्यवस्थित करने के लिये ठोस निर्णय लेते हुए कड़ा कदम उठाया। और, वर्षों से जमे पुलिसकर्मी के विरुद्ध एक्शन लेते हुए विरमित करने का आदेश एसएसपी को दिया।
सुनिए ऑडियो…..
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विरमित होने के बाद भी यह पुलिस कर्मी दूसरे जिले में जाने को तैयार नहीं हैं। जबकि, आईजी ललन मोहन प्रसाद का सख्त निर्देश है कि इस जिले से दूसरे जिले में विरमित हुये सिपाही पुलिस लाइन से कमान लेकर स्थानांतरित जिलों में अपना योगदान दें। लेकिन, इस आदेश के बावजूद कमान लेकर इस जिला से जाने को तैयार नहीं हैं।
ऐसे में, जिला के वरीय पदाधिकारियों के सामने बड़ी समस्या उत्पन्न हो गई हैं। इन्हें अब सख्त कदम उठाने की जरूरत हैं। आईजी ललन मोहन प्रसाद ने कथित पुलिस मेंस एसोसिएशन के अध्यक्ष राजू के मामले को गंभीरता से लेकर पुलिस अधीक्षक को मिथिला क्षेत्रादेश संख्या 556/22 के द्वारा उसे मधुबनी जिला बल के लिये जिलादेश संख्या 1979/22 के द्वारा एक नवंबर से विरमित का आदेश दिया गया था। इसमें उन्होंने मधुबनी जिला बल के लिए विरमित का आदेश दिया हैं।
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इसी बीच सूत्रों का कहना हैं कि सिपाही राजू ऐन-केन प्रकार से दस दिनों की छुट्टी यह कहते हुए प्राप्त कर लिया कि उसका पुत्र बीमार हैं। अब यहां एक प्रश्न जरूर खड़ा होता हैं कि विरमित होने के बाद उसे छुट्टी कौन दिया और कैसे दिया। नियम के मुताबिक विरमित हुए स्थान पर योगदान के बाद वह छुट्टी लेने का अधिकार रखता है। फिर उसे छुट्टी कौन दिया। छुट्टी देने वाला अधिकारी भी ऐसे में दोषी माना जाएगा।
बरहाल, आईजी के पत्र के आलोक में परिचारी प्रवर ने वरीय पुलिस अधिकारी को जो जवाब दिया है। उसमें स्पष्ट लिखा हुआ है कि छुट्टी लेने के बाद पूरा दिन सिपाही राजू को पुलिस केंद्र में घूमते देखा गया है। उनसे इस बाबत वरीय पदाधिकारी पूछ रहें हैं कि आदेश के बावजूद स्थानांतरित जिला के लिये सिपाही राजू ने आदेश पत्र लिया या नहीं।
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इस आदेश की प्रति सिपाही राजू को भी परिचारी प्रवर ने उपलब्ध करा दिया हैं। सिपाही राजू यादव को दिये इस पत्र में यह भी उल्लेख है कि आपके द्वारा ली गई अवकाश पत्र को वरीय पुलिस पदाधिकारियों के आदेश से रद किया जाता हैं, ताकि अविलंब कर्तव्य पर योगदान देते हुए स्थानांतरित जिला के लिये आदेश पत्र प्राप्त कर उक्त जिला में योगदान देना सुनिश्चित करें।
परिचारी प्रवर ने दिए पत्र में कहा हैं कि कर्तव्य पर उपस्थित नहीं होने की स्थिति में आपके विरुद्ध अनुशासनिक कार्रवाई के लिए वरीय पदाधिकारियो के पास अनुशंसा की जाएगी। परिचारी प्रवर ने इसकी एक कॉपी एसएसपी को भी देकर सूचित कर दिया हैं।
पुलिस में अनुशासनिक व्यवस्था अगर ध्वस्त होता हैं, तो पूरा विभाग बदनाम होता है। और, यह बदनामी नहीं हो, इसके लिये सुसंगत कार्रवाई की जाती हैं। इस व्यवस्था को सशक्त बनाने के लिए जिला के सभी पुलिस पदाधिकारी प्रयासरत रहते हैं। बावजूद इसके सिपाही राजू समेत अन्य बार-बार वरीय पुलिस अधिकारियों के आदेश को ठेंगा बता देते हैं। इन सबों को वरीय पुलिस अधिकारियों को ठगने की आदत हैं।
कई आईपीएस अधिकारियों को यह लोग कभी पत्नी बीमार हैं, कभी बच्चा बीमार है, कभी बच्चे की हालत सीरियस है। आदि, कई तरह का बहाना बनाकर आवेदन देते हैं। कई बार तो ऐसा भी देखा गया हैं कि विरमित हुए स्थान पर योगदान नहीं देकर जिला में मंडराते रहते हैं। और ज्योंही एसएसपी या आईजी की बदली होती है तो जिला में आये दूसरे पदाधिकारी से पुनः सामंजस्य करा लेते हैं फिर जिला में बने रहते हैं।
सूत्रों का कहना हैं कि इनको वेतन से फर्क नहीं पड़ता। इनकी कमाई लाखों में हैं। कोई जमीन का धंधा बेनामी रूप से करता है। तो कोई अन्य श्रोतों से कमाता हैं। सूत्रों का कहना हैं कि इन सबों को अवैध रूप से कमाने के कई जरिया हैं। इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता हैं। अगर फर्क कहीं पड़ता है या दिखता है तो वह है पुलिस का सामुच्य प्रशासन जिसपर आम आवाम विश्वास करते हैं, न्याय और भरोसा की उम्मीद पाले बैठे हैं, जो सदियों तक यूं ही बैठे रहेंगे….मगर, ऐसे तंत्र से भरोसा अब टूटने लगा है, इसे संभालकर रखना उसे बचाना वरीय पुलिस पदाधिकारियों का परम कर्तव्य है।





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