
LPG Crisis: पश्चिम एशिया के रण में उलझी दुनिया, भारत में चूल्हे की आंच पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। भू-राजनीतिक उथल-पुथल से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गहराते असर के बीच, सरकार ने देश में गैस की अबाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कमर कस ली है।
LPG Crisis: भारत में ऊर्जा संकट गहराया हुआ है, और इस पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है। पश्चिम एशिया में 28 फरवरी को इजराइल और अमेरिका द्वारा ईरान पर संभावित हमले के बाद से युद्ध की आशंकाएं तेज हो गई हैं, जिससे होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा उत्पन्न हुई है। इस भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर संकट गहरा दिया है, जिसका सीधा असर भारत पर भी पड़ रहा है। इसी खतरे को भांपते हुए, भारत सरकार ने मार्च 2026 से आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 लागू कर दिया है। इसका मुख्य उद्देश्य देश में तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति तथा वितरण को नियंत्रित करना है। सरकार का सर्वोपरि लक्ष्य घरेलू उपभोक्ताओं और महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए गैस की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करना है, ताकि आम जनजीवन और अर्थव्यवस्था प्रभावित न हो।
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार, देश की सभी तेल रिफाइनरी कंपनियों को स्पष्ट आदेश दिए गए हैं कि वे उपलब्ध प्रोपेन और ब्यूटेन से अधिकतम मात्रा में तरलीकृत पेट्रोलियम गैस का उत्पादन करें। यह भी सुनिश्चित किया गया है कि प्रोपेन या ब्यूटेन को पेट्रो रसायन उत्पादों या अन्य औद्योगिक उपयोग के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा। यानी, इन महत्वपूर्ण संसाधनों का उपयोग मुख्य रूप से घरेलू रसोई गैस उपलब्ध कराने के लिए ही किया जाएगा। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
क्यों गहराया LPG Crisis का संकट?
सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम की धारा 3 और 5 का उपयोग करते हुए तेल विपणन कंपनियों के लिए आपूर्ति से जुड़ी सख्त सीमाएं भी तय कर दी हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुख कंपनियां, जैसे भारतीय तेल निगम, हिन्दुस्तान पेट्रोलियम निगम और भारत पेट्रोलियम निगम, को निर्देश दिया गया है कि वे खरीदी गई तरलीकृत पेट्रोलियम गैस केवल घरेलू उपभोक्ताओं तक ही पहुंचाएं। इसके अलावा, जमाखोरी और कालाबाजारी को रोकने के लिए गैस सिलेंडर की नई बुकिंग के बीच कम से कम 25 दिन का अनिवार्य अंतराल तय किया गया है। यह कदम बाजार में कृत्रिम कमी पैदा होने से रोकेगा और सभी तक गैस की उपलब्धता सुनिश्चित करेगा।
प्राकृतिक गैस आपूर्ति को और अधिक सुचारु बनाने के लिए सरकार ने प्राकृतिक गैस आपूर्ति विनियमन आदेश 2026 भी लागू किया है। इसके तहत घरेलू पाइप गैस, संपीडित प्राकृतिक गैस (CNG) तथा उर्वरक कारखानों को गैस आवंटन में प्राथमिकता दी जाएगी। यह दूरदर्शी कदम कृषि और परिवहन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को इस संकट से अप्रभावित रखने के लिए उठाया गया है, क्योंकि इन क्षेत्रों पर सीधा असर अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव डाल सकता है।
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अधिनियम की शक्ति और वितरण पर नियंत्रण
आपको बता दें कि आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 एक केंद्रीय कानून है, जिसका मूल उद्देश्य जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति को बाधित होने से बचाना है। यदि जमाखोरी, कालाबाजारी या किसी बाहरी संकट के कारण किसी आवश्यक वस्तु की उपलब्धता प्रभावित होती है, तो सरकार इस कानून के तहत उत्पादन, वितरण और कीमतों को नियंत्रित कर सकती है। वर्ष 2020 में इस कानून में संशोधन किया गया था, जिसके बाद अनाज, दाल, आलू, प्याज और खाद्य तेल जैसे कृषि उत्पादों पर नियंत्रण केवल युद्ध, अकाल या गंभीर प्राकृतिक आपदा जैसी असाधारण स्थितियों में ही लगाया जा सकता है। संशोधन के बाद से केंद्र सरकार इस कानून का उपयोग पांच बार कर चुकी है।
इस बार यह अभूतपूर्व कदम इसलिए उठाया गया है क्योंकि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण भारत को मिलने वाली तरलीकृत पेट्रोलियम गैस की आपूर्ति पर दबाव काफी बढ़ गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रभावित होने से सऊदी अरब जैसे प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं से आने वाली प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में भी रुकावट आई है। इसका असर देश के कई शहरों में दिखने लगा है, जहां कुछ होटलों और भोजनालयों को गैस की कमी के कारण अपनी रसोई अस्थायी रूप से बंद करनी पड़ी है। इसके अतिरिक्त, पिछले सप्ताह एलपीजी सिलेंडरों की कीमतों में की गई वृद्धि ने भी आम लोगों की जेब पर बड़ा असर डाला है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
भविष्य की तैयारी: गैस भंडारण पर जोर
इस संकट के बीच, तेल विपणन कंपनियां देश में गैस भंडारण क्षमता बढ़ाने की दिशा में भी तेजी से काम कर रही हैं। कंपनियां अब भूमिगत चट्टानी गुफाओं में गैस भंडारण की संभावनाओं पर विस्तृत तकनीकी और आर्थिक अध्ययन कर रही हैं, ताकि भविष्य में आपूर्ति संकट से बेहतर तरीके से निपटा जा सके। यह एक दीर्घकालिक रणनीति है, जो देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगी।
संसद की पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस संबंधी स्थायी समिति ने भी पिछले वर्ष दिसंबर में इस दिशा में महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जहां भौगोलिक परिस्थितियां अनुकूल हों, वहां देशभर में और अधिक भूमिगत गैस भंडारण गुफाएं विकसित की जानी चाहिए, ताकि भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो सके। यह सुझाव अब जमीनी हकीकत का रूप ले रहा है।
फिलहाल, तेल कंपनियां आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में स्थित तरलीकृत पेट्रोलियम गैस भंडारण गुफा का उपयोग आयातित प्रोपेन और ब्यूटेन को सुरक्षित रखने के लिए कर रही हैं। इसके अलावा, हिन्दुस्तान पेट्रोलियम निगम ने कर्नाटक के मंगलुरु में पिछले वर्ष देश की सबसे बड़ी भूमिगत चट्टानी गुफा आधारित गैस भंडारण परियोजना शुरू की थी। इस भंडारण केंद्र की क्षमता लगभग अस्सी हजार टन है और यह एक मौजूदा गैस संयंत्र परिसर के भीतर ही बनाया गया है, जो इसकी रणनीतिक महत्वता को दर्शाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भूमिगत चट्टानी गुफाएं बड़ी मात्रा में गैस को सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल तरीके से संग्रहित करने का एक प्रभावी माध्यम हैं। इससे न केवल आपूर्ति व्यवस्था मजबूत होती है, बल्कि परिवहन और वितरण की लागत भी कम हो सकती है। यह तकनीक भविष्य में भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता के लिए गेम चेंजर साबित हो सकती है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारत द्वारा उठाए गए ये सभी कदम समय की मांग हैं। आवश्यक वस्तु अधिनियम का प्रभावी उपयोग, घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता देना और गैस भंडारण क्षमता में रणनीतिक विस्तार जैसे उपाय आने वाले समय में देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, जिससे भारत ऐसे वैश्विक संकटों का सामना अधिक मजबूती से कर पाएगा।





