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झारखंड के राष्ट्रीय पदक विजेता आर्यन और ईशुनाथ मुखी का टूटता सपना, अब बॉक्सिंग छोड़ने पर मजबूर

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Indian Boxers: आर्थिक तंगी ने तोड़ा सपना! झारखंड के दो युवा बॉक्सरों पर आया खेल छोड़ने का संकट, राष्ट्रीय पदक जीतने के बाद भी मदद से महरूम।

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Indian Boxers: झारखंड के राष्ट्रीय पदक विजेता आर्यन और ईशुनाथ मुखी का टूटता सपना, अब बॉक्सिंग छोड़ने पर मजबूर

झारखंड के जमशेदपुर शहर के भालूबासा से एक ऐसी दर्दनाक कहानी सामने आई है, जो खेल जगत के हर चाहने वाले को झकझोर कर रख देगी। दो सगे भाई, आर्यन मुखी और ईशुनाथ मुखी, जिन्होंने अपनी मुक्केबाजी के दम पर झारखंड को चार राष्ट्रीय पदक दिलाए, आज गरीबी और सरकारी उपेक्षा के कारण अपना पसंदीदा खेल छोड़ने को मजबूर हैं। यह खबर न केवल खेल प्रेमियों के लिए बल्कि पूरे देश के लिए चिंता का विषय है, जहाँ प्रतिभाएं संसाधनों की कमी के चलते दम तोड़ रही हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। इन युवा मुक्केबाजों की कहानी भारतीय खेल व्यवस्था पर कई सवाल खड़े करती है।

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Indian Boxers: गरीबी की मार झेलते चैंपियन मुक्केबाज

आर्यन और ईशुनाथ, दोनों ने रिंग में अपनी ताकत और जुनून का प्रदर्शन करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर कई जीत हासिल की हैं। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति हमेशा से कमजोर रही है। उनके माता-पिता मजदूरी करके घर चलाते हैं, और ऐसे में इन दोनों खिलाड़ियों के लिए महंगे उपकरण, डाइट और प्रशिक्षण का खर्च उठाना असंभव होता जा रहा है। इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल करने के बावजूद, राज्य या केंद्र सरकार से उन्हें कोई ठोस मदद नहीं मिली है, जिससे उनका भविष्य अंधकारमय दिख रहा है।

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  • खिलाड़ी: आर्यन मुखी और ईशुनाथ मुखी
  • स्थान: भालूबासा, जमशेदपुर, झारखंड
  • उपलब्धि: झारखंड के लिए चार राष्ट्रीय बॉक्सिंग पदक
  • वर्तमान स्थिति: आर्थिक तंगी के कारण बॉक्सिंग छोड़ने पर मजबूर

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सरकार और खेल संघों की बेरुखी इन युवा प्रतिभाओं के हौसले को तोड़ रही है। उनका सपना था कि वे देश के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतें, लेकिन अब उन्हें अपने परिवार का पेट पालने के लिए मजदूरी करने पर मजबूर होना पड़ रहा है। देशज टाइम्स बिहार का N0.1 मानता है कि यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है।

संघर्षों से भरा मुक्केबाजी का सफर

इन दोनों भाइयों ने विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी। बिना किसी बड़े प्रायोजक या सरकारी सहायता के, उन्होंने कड़ी मेहनत की और अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। स्थानीय स्तर पर उन्हें कुछ पहचान मिली, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचने के बाद भी जब मदद नहीं मिली, तो उनका मनोबल टूटने लगा। भालूबासा के छोटे से घर में पले-बढ़े इन भाइयों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उनके राष्ट्रीय गौरव का यह सफर इतनी जल्दी थम जाएगा। यह सिर्फ आर्यन और ईशुनाथ की कहानी नहीं है, बल्कि भारत के कोने-कोने में ऐसी अनगिनत प्रतिभाएं हैं जो सही समय पर सहायता न मिलने के कारण गुमनामी के अंधेरे में खो जाती हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1 और हम ऐसी कहानियों को उजागर करते रहेंगे।

आगे क्या? मदद की आस और अनिश्चित भविष्य

मुखिया परिवार अभी भी उम्मीद लगाए बैठा है कि सरकार या कोई सामाजिक संस्था उनकी मदद के लिए आगे आएगी। उनका मानना है कि अगर उन्हें सही प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता मिल जाए, तो वे भारत के लिए और भी बड़े पदक ला सकते हैं। लेकिन, समय बीतता जा रहा है और उनका धैर्य जवाब दे रहा है। यह देखना होगा कि क्या झारखंड सरकार और खेल विभाग इन युवा चैंपियनों को बचाने के लिए कोई कदम उठाते हैं, या फिर देश दो होनहार मुक्केबाजों को खो देगा। उनकी यह दुर्दशा उन सभी नीतियों और दावों पर सवालिया निशान लगाती है जो खेल और खिलाड़ियों को बढ़ावा देने के लिए किए जाते हैं।

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