
Bhagalpur News: आस्था जब इतिहास की डोर पकड़कर चलती है तो पीढ़ियां उसे उत्सव बना देती हैं। भागलपुर के बैजानी गांव में कुछ ऐसा ही नज़ारा देखने को मिला, जहां 200 साल पुरानी एक परंपरा आज भी ज़िंदा है और हज़ारों लोगों को अपनी छांव में समेटे हुए है। जगदीशपुर प्रखंड के अंतर्गत आने वाले इस गांव में पारंपरिक बेहरी पूजा का आयोजन बड़े ही श्रद्धा और धूमधाम के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर न केवल स्थानीय बल्कि दूर-दराज के क्षेत्रों से भी श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा।
Bhagalpur News: क्या है बेहरी पूजा की 200 साल पुरानी कहानी?
स्थानीय लोगों के अनुसार, इस पूजा का इतिहास लगभग दो शताब्दियों पुराना है, जिसकी शुरुआत एक भीषण बाढ़ के बाद हुई थी। ग्रामीण बताते हैं कि उस प्रलयकारी बाढ़ के दौरान, एक श्रृंगारित पाकड़ का विशाल वृक्ष नदी के किनारे आकर रुक गया। उसी रात, गांव के पंडित त्रिलोकी नाथ झा को स्वप्न में मां काली ने दर्शन दिए और उस वृक्ष के स्थान पर अपनी प्रतिष्ठा करने का आदेश दिया। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। देवी का आदेश पाकर पंडित जी ने उस वृक्ष को अपनी भूमि पर स्थापित किया और एक छोटे से मंदिर में पूजा-अर्चना आरंभ कर दी।
मान्यता है कि मंदिर स्थापना के बाद देवी की कृपा से पंडित त्रिलोकी नाथ झा को संतान सुख की प्राप्ति हुई। इस चमत्कार के बाद पूरे गांव में देवी के प्रति आस्था और भी गहरी हो गई। ग्रामीणों के सहयोग से समय के साथ वहां मां काली का एक भव्य मंदिर बनाया गया। तभी से यह वार्षिक पूजा चैत्र मास में रामनवमी के बाद पड़ने वाले मंगलवार या शनिवार को निरंतर आयोजित की जाती है।
इन अनुष्ठानों के बिना अधूरी है पूजा
बेहरी पूजा का अनुष्ठान कई चरणों में संपन्न होता है, जिसकी शुरुआत मां के श्रृंगार और ध्वजारोहण के साथ होती है। इसके बाद विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनमें शामिल हैं:
- फूलाइस
- चंडी पाठ
- बलिदान
- हवन एवं आरती
- कन्या पूजन
- ब्राह्मण भोजन
इन सभी अनुष्ठानों के दौरान पूरा गांव भक्ति के रस में डूबा रहता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
भक्तों की हर मुराद होती है पूरी
ग्रामीणों में यह अटूट विश्वास है कि जो भी भक्त सच्चे मन से मां के दरबार में आता है, उसकी सभी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं। यही वजह है कि हर साल इस पूजा में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती ही जा रही है। इस वर्ष भी पूजा के अवसर पर सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण और श्रद्धालु मौजूद रहे, जिससे पूरे क्षेत्र का वातावरण भक्तिमय हो गया। 200 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी क्षेत्र के लिए आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बनी हुई है।






