
इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं रहता—वह ज़मीन, स्मारकों और समाज की स्मृति में भी जीवित रहता है। लेकिन जब वही इतिहास धुंधला कर दिया जाए, उसके प्रतीकों को बदल दिया जाए और सच्चाई को ढकने की कोशिश की जाए, तब सवाल उठना लाज़मी हो जाता है। भागलपुर में आज ऐसा ही एक सवाल गूंज रहा है—क्या हम सच में अपने पहले आदिवासी क्रांतिकारी तिलका मांझी को भूल चुके हैं? इतिहासकारों और साहित्यकारों ने भले ही हमारे अमर शहीद क्रांतिकारी को जिस भी रूप में लिया हो, लेकिन सच्चाई को झुठलाने की कोशिश एक न एक दिन नाकाम हो कर रहेगी। हम बात कर रहे हैं, अमर शहीद तिलका मांझी की। जिन्होंने अंग्रेजों की नींव हिला कर रख दी थी। उन्होंने देशभक्ति के जज्बे में अंग्रेज कलेक्टर क्लीवलैंड की हत्या करके आजादी का बिगुल बजाया था। हकीकत, शहीद तिलका मांझी की समाधि पर एक अदद दीप भी नहीं जली है। जो परम्परा दो संथाल मुलाजिमों की वर्ष 1947 तक कायम थी वो करीब अस्सी साल यानि आठ दशक से लुप्त है।
आज़ादी का पहला बिगुल और एक भूला हुआ नायक
18वीं सदी में जब अंग्रेजी हुकूमत अपनी जड़ें मजबूत कर रही थी, तब बिहार के पहाड़ी और जंगल क्षेत्रों से एक आवाज उठी—विद्रोह की आवाज। तिलका मांझी ने न सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया, बल्कि गरीबों और आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी।

1770 के भयानक अकाल के बाद जब जनता भूख से मर रही थी और अंग्रेज राजस्व वसूली में लगे थे, तब मांझी ने अंग्रेजी खजाने को लूटकर उसे जरूरतमंदों में बांटा। यह सिर्फ विद्रोह नहीं था—यह व्यवस्था के खिलाफ खुला युद्ध था।1784 में अंग्रेज अधिकारी Augustus Cleveland पर हमला इस संघर्ष का निर्णायक क्षण बना। स्थानीय परंपराओं के अनुसार, मांझी ने ताड़ के पेड़ से तीर चलाकर क्लीवलैंड को मार गिराया—हालांकि अंग्रेजी रिकॉर्ड इसे बीमारी से मौत बताते हैं।
शहादत और उसके बाद की चुप्पी
1785 में तिलका मांझी को पकड़कर भागलपुर में बरगद के पेड़ से फांसी दी गई। इतना ही नहीं—उनके शव को घसीटा गया, ताकि डर का माहौल बने।
लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है—उनके शव का क्या हुआ?
‘मंदिर’ या ‘स्मारक’—या सच्चाई को छिपाने की चाल?
लेकिन स्थानीय लोगों का एक बड़ा वर्ग इसे तिलका मांझी की समाधि मानता है—जिसे जानबूझकर दबा दिया गया। अगर यह सही है, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं—यह साक्ष्य नष्ट करने का मामला है।
सीधी बात: अगर खुदाई हो जाए, तो सच्चाई सामने आ सकती है। लेकिन प्रशासन ने अब तक ऐसा करने की हिम्मत नहीं दिखाई।

तिलका मांझी के नाम पर सम्मान देने की बातें तो खूब हुईं, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट ही नजर आती है। हालात ऐसे रहे कि उनके नाम पर एक दीप जलाना भी किसी ने जरूरी नहीं समझा, जबकि राजनीतिक स्तर पर उनके नाम का इस्तेमाल लगातार होता रहा। तिलका मांझी चौक पर एक ऐसा मंदिर मौजूद है, जहां किसी भी तरह की मूर्ति स्थापित नहीं है, जो अपने आप में असामान्य स्थिति है। हैरानी की बात यह भी है कि उसी मंदिर के ठीक सामने क्लीवलैंड की प्रतिमा स्थापित कर दी गई, जिसके पीछे के कारण और परिस्थितियां अब तक स्पष्ट नहीं हो सकी हैं।
- यह मंदिर जैसा दिखता है, लेकिन अंदर कोई मूर्ति नहीं है
- कभी यहां फारसी भाषा में शिलालेख था, जो अब गायब है
- क्लीवलैंड की प्रतिमा मंदिर के अंदर नहीं, बल्कि बाहर स्थापित की गई
इतिहासकारों के अनुसार, यह औपनिवेशिक “धार्मिक अनुकृति” (religious mimicry) का उदाहरण हो सकता है—जहां अंग्रेजों ने अपने अधिकारी को देवता की तरह स्थापित करने की कोशिश की।
‘बिना मूर्ति का मंदिर’—एक बड़ा संकेत
भारत जैसे देश में मंदिर बिना मूर्ति के होना असामान्य है।
तो सवाल उठता है:
- क्या यह वास्तव में मंदिर है?
- या किसी को दफनाने की जगह?
- या इतिहास को दबाने का एक ढांचा?
यह सवाल सिर्फ स्थानीय नहीं—यह राष्ट्रीय स्तर का ऐतिहासिक प्रश्न है।
आजादी के बाद 1970 के दशक में तत्कालीन जिला प्रशासन ने इस स्थल को “तिलका मांझी चिल्ड्रेन पार्क” का नाम दिया, जिसका रिकॉर्ड नगर पालिका में दर्ज है। हालांकि, 1980 के दशक में बुढ़ानाथ निवासी माधवानंद पुरी ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए इस परिसर की देखरेख अपने हाथ में ले ली। कुछ समय बाद उन्होंने कथित तौर पर फर्जी तरीके से रामकृष्ण मिशन बेलूर मठ के नाम पर एक स्कूल खोल दिया। वर्ष 1995 में जब इस मामले की जानकारी मठ के सचिव तक पहुंची, तो कड़ा रुख अपनाते हुए स्कूल बंद करा दिया गया, लेकिन परिसर पर पुरी का प्रभाव बना रहा। इसके बाद 2008 में फिर से रामकृष्ण अभेदानंद के नाम पर स्कूल खोला गया, जिसे स्थानीय विरोध और जनहित याचिका के बाद 2011 में बंद करना पड़ा।

स्थानीय लोगों के अनुसार, एक समय ऐसा भी था जब शाम 6 बजे के बाद इस रास्ते से गुजरने में तत्कालीन जमींदार और अधिकारी भी हिचकिचाते थे। बताया जाता है कि 1947 तक इस मंदिर में अखंड दीप जलता था, जिसकी जिम्मेदारी संथाल समुदाय के दो कर्मियों के पास थी। बाद में उनकी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई, जिसके बाद वह परंपरा भी समाप्त हो गई और मंदिर पूरी तरह उपेक्षित हो गया।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि
- शहर में तिलका मांझी की प्रतिमा है
- विश्वविद्यालय उनके नाम पर है
- लेकिन उनकी संभावित समाधि पर एक दीप तक नहीं जलता
यह दिखाता है कि नाम का इस्तेमाल तो होता है, लेकिन सम्मान नहीं दिया जाता।
सीधी भाषा में—यह प्रतीकात्मक राजनीति है, वास्तविक सम्मान नहीं।
एक स्थानीय युवक ने इस पूरे मामले पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उसका कहना है कि यदि क्लीवलैंड की स्मृति में यह स्थल विकसित किया गया था, तो अंग्रेजों ने मंदिर के भीतर उसकी प्रतिमा स्थापित क्यों नहीं करवाई? साथ ही यह भी सवाल उठता है कि तत्कालीन डीएम को इस स्थान का नाम “तिलका मांझी चिल्ड्रेन पार्क” रखने की जरूरत क्यों पड़ी। युवक के दावों के अनुसार, इलाके में यह चर्चा लंबे समय से है कि यह स्थल वास्तव में तिलका मांझी की समाधि है, जिस पर बाद में मंदिर का निर्माण कर इसे क्लीवलैंड मेमोरियल के रूप में स्थापित कर दिया गया। उसका मानना है कि यदि इस कथित समाधि स्थल की वैज्ञानिक तरीके से खुदाई कराई जाए, तो सच्चाई सामने आ सकती है और इतिहास के इस विवाद पर स्पष्टता मिल सकती है।
तिलका मांझी सिर्फ एक नाम नहीं—वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत का प्रतीक हैं।

लेकिन आज उनका इतिहास अधूरा है, उनकी स्मृति विवादों में है, और उनकी समाधि उपेक्षित है।
सवाल सीधा है—
क्या हम सच जानना चाहते हैं, या इसी झूठ के साथ जीना ठीक है?
जब तक उस स्थल की सच्चाई सामने नहीं आती, तब तक यह कहना गलत नहीं होगा— तिलका मांझी की आत्मा को अब भी शांति नहीं मिली है।








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