Mrityunjay Tiwari BJP: बिहार की राजनीति में शुक्रवार को एक बड़ा सियासी उलटफेर देखने को मिला है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के वरिष्ठ नेता और लंबे समय तक पार्टी के प्रवक्ता रहे मृत्युंजय तिवारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हो सकते हैं। भाजपा का दामन थामने से ठीक पहले उन्होंने तेजस्वी यादव को लेकर एक तीखा बयान दिया, जिससे Bihar का सियासी पारा अचानक चढ़ गया है। सूत्रों के अनुसार, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से उनकी बातचीत पूरी हो चुकी थी और वे भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी की मौजूदगी में पार्टी में शामिल हो सकते हैं।
‘अब तेजस्वी यादव से बात का कोई मतलब नहीं’
भाजपा में शामिल होने से पहले मृत्युंजय तिवारी ने साफ संकेत दिया कि उन्होंने राजद छोड़ने का फैसला कर लिया है। उन्होंने अपने बयान में कहा कि,






“अब तेजस्वी यादव से बात करने का कोई मतलब नहीं है।”
उनके इस बयान को राजद नेतृत्व से बढ़ती दूरी और नाराजगी के तौर पर देखा जा रहा है। सियासी गलियारों में उनके इस कथन के बाद चर्चाओं का दौर तेज हो गया है, जो राजद के लिए आने वाले समय में नई चुनौतियां खड़ी कर सकता है।

राजद में कैसा रहा मृत्युंजय तिवारी का सफर?
मृत्युंजय तिवारी का नाम राजद के सबसे सक्रिय प्रवक्ताओं में शामिल रहा है। वे वर्षों तक पार्टी के प्रवक्ता के रूप में कार्यरत रहे और टीवी डिबेट, प्रेस कॉन्फ्रेंस तथा राजनीतिक मंचों पर लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव की नीतियों का मजबूती से बचाव करते थे। बिहार की राजनीति के लगभग हर बड़े मुद्दे पर उन्होंने राजद का पक्ष रखा, जिससे उनकी पहचान पार्टी के तेज-तर्रार और आक्रामक प्रवक्ता के रूप में बनी थी।
भाजपा को क्या होगा फायदा?
भाजपा आगामी विधानसभा चुनाव से पहले लगातार दूसरे दलों के प्रभावशाली नेताओं को अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। ऐसे में मृत्युंजय तिवारी का भाजपा में शामिल होना पार्टी के लिए राजनीतिक और सामाजिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार, भाजपा उन्हें बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में भी सक्रिय भूमिका दे सकती है। ऐसी भी अटकलें हैं कि वे भाजपा प्रत्याशी नीरज सिन्हा के समर्थन में चुनाव प्रचार कर सकते हैं। हालांकि, इस संबंध में अभी तक भाजपा की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
बिहार की राजनीति पर क्या होगा असर?
मृत्युंजय तिवारी का राजद छोड़कर भाजपा में जाना केवल एक नेता का दल-बदल नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे चुनाव से पहले बदलते राजनीतिक समीकरणों के रूप में देखा जा रहा है। इस कदम से भाजपा को विपक्ष पर हमला करने के लिए एक अनुभवी चेहरा मिलेगा, जबकि राजद को अपने पुराने और चर्चित प्रवक्ताओं में से एक को खोना पड़ेगा, जिसका असर पार्टी की रणनीति पर दिख सकता है। यह घटनाक्रम बिहार की राजनीति में नई हलचल पैदा करेगा और आने वाले दिनों में इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं।









