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बिहार शराबबंदी पर बड़ा बवाल! मांझी के बाद पप्पू यादव की एंट्री, नई बहस, बदले नियम, खत्म हो अवैध कारोबार, क्या झुकेगी सरकार? JDU की तो ना है!

Bihar Liquor Ban: पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने बिहार में लागू शराबबंदी कानून की मौजूदा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की मांग की है। उन्होंने जीतन राम मांझी के गुजरात मॉडल के सुझाव का समर्थन करते हुए इसके आर्थिक और सामाजिक प्रभावों पर भी सवाल उठाए, लेकिन सत्ताधारी जदयू ने समीक्षा से साफ इनकार कर दिया है।

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Bihar Liquor Ban: बिहार में शराबबंदी कानून को लेकर राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। पूर्णिया से निर्दलीय सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने इस कानून की व्यापक समीक्षा की मांग की है। उनके इस बयान ने सत्ताधारी जनता दल यूनाइटेड (JDU) की मुश्किलों को बढ़ा दिया है, जिसने शराबबंदी की समीक्षा से साफ इनकार कर दिया है।

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पप्पू यादव ने मौजूदा शराबबंदी व्यवस्था की दोबारा समीक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार को केवल कानून बनाए रखने पर नहीं, बल्कि उसके लागू होने के तरीके पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए।

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मांझी के बाद पप्पू यादव की एंट्री: शराबबंदी पर नई बहस

बिहार में शराबबंदी का मुद्दा अब सिर्फ विपक्ष की राजनीति तक सीमित नहीं रहा है। सत्ता पक्ष के सहयोगी रहे हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के संरक्षक जीतन राम मांझी भी लंबे समय से इसके क्रियान्वयन पर सवाल उठाते रहे हैं। मांझी ने हाल के दिनों में फिर दोहराया कि शराबबंदी की नीति खराब नहीं है, लेकिन इसे लागू करने में गंभीर खामियां हैं। उन्होंने गुजरात मॉडल की तर्ज पर व्यवस्था में बदलाव की बात कही थी।

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अब पप्पू यादव ने भी इसी बहस को आगे बढ़ाया है। दिल्ली से पटना पहुंचने के बाद मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि सरकार को शराबबंदी को लेकर व्यापक स्तर पर समीक्षा करनी चाहिए। उनके मुताबिक, सवाल सिर्फ यह नहीं है कि शराबबंदी रहे या नहीं, बल्कि असली सवाल यह है कि मौजूदा व्यवस्था अपने तय लक्ष्यों को किस हद तक पूरा कर पा रही है।

शराबबंदी को लेकर सरकार को व्यापक स्तर पर समीक्षा करनी चाहिए। सवाल केवल यह नहीं है कि शराबबंदी रहे या नहीं। असली सवाल यह है कि मौजूदा व्यवस्था अपने लक्ष्य को किस हद तक पूरा कर रही है।

पप्पू यादव के सुझाव: बदले नियम, खत्म हो अवैध कारोबार

पप्पू यादव ने पूर्ण शराबबंदी की मौजूदा व्यवस्था में अलग-अलग परिस्थितियों के आधार पर नियमों पर विचार करने का सुझाव दिया। उन्होंने स्कूलों और मंदिरों जैसे संवेदनशील स्थानों के आसपास शराब पर प्रतिबंधों को सख्ती से लागू रखने की बात कही। इसके साथ ही, उन्होंने पांच सितारा और सात सितारा होटलों के लिए अलग व्यवस्था पर विचार किए जाने का सुझाव भी दिया।

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उनका तर्क है कि शराबबंदी की नीति को एक ही तरीके से लागू करने के बजाय, उसके सामाजिक और प्रशासनिक प्रभावों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। हालांकि, इस तरह की व्यवस्था में बदलाव का अंतिम फैसला सरकार और संबंधित कानून के तहत ही हो सकता है। पप्पू यादव ने शराबबंदी को आर्थिक नजरिए से भी देखने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि सरकार को यह आकलन करना चाहिए कि शराबबंदी के कारण संभावित राजस्व पर कितना असर पड़ा है, और अवैध शराब के कारोबार से किस तरह की समानांतर अर्थव्यवस्था विकसित हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि अवैध शराब की बिक्री से नेताओं, अधिकारियों और अपराधियों के लिए कमाई का रास्ता बन रहा है।

JDU का स्पष्ट रुख: शराबबंदी बनी रहेगी

शराबबंदी को लेकर हालिया बहस में राजस्व और अवैध कारोबार दोनों प्रमुख मुद्दे बनकर सामने आए हैं। कुछ नेता इसे नीति की खामी के बजाय उसके क्रियान्वयन की समस्या बताते हैं। वहीं, जनता दल यूनाइटेड ने शराबबंदी की समीक्षा से साफ इनकार कर दिया है। जदयू की ओर से कहा गया है कि बिहार में शराबबंदी खत्म नहीं होगी।

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पप्पू यादव ने शराबबंदी के मुद्दे पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दृष्टिकोण का सम्मान करने की बात कही। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी कानून की समय-समय पर समीक्षा होना एक सामान्य प्रक्रिया है। इसका मतलब यह नहीं है कि कानून को पूरी तरह से खत्म किया जा रहा है। उनके मुताबिक, समीक्षा का उद्देश्य यह पता लगाना होना चाहिए कि कानून से अपेक्षित परिणाम मिल रहे हैं या नहीं। अगर किसी व्यवस्था से अनपेक्षित समस्याएं पैदा हो रही हैं, तो उन्हें दूर करने के उपाय तलाशे जाने चाहिए। बिहार में शराबबंदी अप्रैल 2016 से लागू है। इसके बाद से शराब की बिक्री और सेवन पर कानूनी रोक लगाई गई है, लेकिन राज्य में अवैध शराब की बरामदगी और इस कानून के तहत होने वाली कार्रवाई लगातार राजनीतिक मुद्दा बनी हुई है।

यह देखना दिलचस्प होगा कि विपक्ष और सत्ता पक्ष के सहयोगी रहे नेताओं की इस मांग पर सरकार क्या रुख अपनाती है। बिहार में शराबबंदी का मुद्दा हमेशा से संवेदनशील रहा है और आने वाले समय में इस पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है।

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