Bihar Gold Smuggling: बागडोगरा में पकड़ी गई सहरसा नंबर की फॉर्च्यूनर (BR 19 T 0005) से 465 ग्राम सोना बरामद होने के बाद बिहार में सोना तस्करी के एक बड़े नेटवर्क पर सवाल खड़े हो गए हैं। अब जांच का मुख्य केंद्र यह है कि जिस वाहन से यह सोना मिला, वह पिछले महीनों में बागडोगरा-सिलीगुड़ी और बिहार के बीच कितनी बार आया-जाया था। स्थानीय स्तर पर ऐसी चर्चा है कि इस गाड़ी का इस्तेमाल महीने में कई बार सोने की खेप लाने-ले जाने के लिए किया जाता था, हालांकि इसकी पुष्टि विस्तृत जांच के बाद ही हो सकेगी। ऐसे में, इस वाहन की पिछली आवाजाही के रिकॉर्ड सामने आना जांच की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
टोल प्लाजा रिकॉर्ड से सामने आएगा वाहन की आवाजाही का पूरा ब्योरा
जांच एजेंसियां यदि संबंधित टोल प्लाजा के रिकॉर्ड और सीसीटीवी फुटेज की पड़ताल करती हैं, तो फॉर्च्यूनर की पुरानी आवाजाही का पूरा ब्योरा सामने आ सकता है। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि इस वाहन ने बागडोगरा-सिलीगुड़ी से बिहार की ओर जाने वाले मार्ग पर पहले कितने फेरे लगाए थे। वाहन के पुराने फेरों का रिकॉर्ड मिलने के बाद, प्रत्येक यात्रा के उद्देश्य और उस दौरान गाड़ी में मौजूद लोगों के बारे में भी गहन जांच की जा सकेगी। इससे न केवल मौजूदा बरामदगी, बल्कि पूर्व की यात्राओं से जुड़ी तस्वीर भी साफ हो सकेगी।
एक खेप में 465 ग्राम सोना, पुराने फेरों पर भी कड़ी नजर जरूरी
एक ही बार में 465 ग्राम सोने की बरामदगी यह संकेत देती है कि जांच को केवल मौजूदा खेप तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि वाहन की पिछली आवाजाही तक इसका विस्तार करना चाहिए। यदि जांच में यह सामने आता है कि यह वाहन लगातार इस रूट पर आता-जाता रहा है, तो पूर्व की यात्राओं में किसी संदिग्ध गतिविधि की संभावना की भी पड़ताल की जा सकती है। इसके लिए टोल रिकॉर्ड को वाहन के मोबाइल लोकेशन, चालक के मोबाइल नंबर, सीसीटीवी फुटेज और अन्य डिजिटल साक्ष्यों से मिलान करने की आवश्यकता होगी।
कितनी खेप की आवाजाही हुई, जांच से सामने आ सकता है पूरा हिसाब
जांच का एक अहम सवाल यह भी है कि क्या बरामद 465 ग्राम सोना केवल एक खेप थी या इससे पहले भी इसी वाहन से ऐसी आवाजाही हुई थी। इसका जवाब वाहन के पुराने फेरों और उनसे जुड़े रिकॉर्ड की जांच से मिल सकता है। उदाहरण के लिए, यदि रिकॉर्ड में महीने में कई बार इस वाहन की आवाजाही सामने आती है, तो प्रत्येक फेरे की अलग-अलग पड़ताल की जा सकती है। वाहन कहां से चला, किन स्थानों पर रुका और किन लोगों के संपर्क में रहा, जैसे बिंदुओं की जांच से कथित नेटवर्क की कड़ियों तक पहुंचने में मदद मिल सकती है।
जांच एजेंसियां इस बात की भी पड़ताल करेंगी कि कहीं यह एक बड़े अंतरराष्ट्रीय सोना तस्करी गिरोह का हिस्सा तो नहीं, जिसका जाल बिहार तक फैला हुआ है। पुराने रिकॉर्ड खंगालने से कई अहम सुराग मिल सकते हैं।
टैक्स चोरी के एंगल से भी जांच की जरूरत
सोने की कथित तस्करी के साथ राजस्व के संभावित नुकसान का पहलू भी जांच का विषय हो सकता है। यदि बरामद सोना अवैध तरीके से सीमा पार कर लाए जाने की पुष्टि होती है, तो इसकी खरीद, स्रोत, परिवहन और बिक्री से जुड़े दस्तावेजों की जांच जरूरी होगी। जांच एजेंसियां यह भी पता कर सकती हैं कि पूर्व में इस वाहन से लाई गई कथित सोने की खेप से संबंधित कोई वैध बिल, दस्तावेज या कर भुगतान का रिकॉर्ड था या नहीं। हालांकि, वास्तविक टैक्स नुकसान का आकलन सोने के स्रोत और लेन-देन की पुष्टि के बाद ही संभव होगा।
बिहार कनेक्शन की भी हो सकती है पड़ताल
बागडोगरा में हुई इस कार्रवाई के बाद बिहार से जुड़े लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। वाहन की आवाजाही, चालक और वाहन मालिक के संपर्कों तथा पुराने यात्राओं की पड़ताल से कथित नेटवर्क के बिहार कनेक्शन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी सामने आ सकती है। यदि टोल रिकॉर्ड के आधार पर वाहन के पुराने फेरों की जांच होती है, तो कार्रवाई केवल बरामद 465 ग्राम सोने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इससे जुड़ी संभावित अन्य कड़ियों की भी पड़ताल हो सकेगी।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि 465 ग्राम सोना लेकर पकड़ी गई सहरसा नंबर की फॉर्च्यूनर इससे पहले इस रूट पर कितनी बार गई थी। हर यात्रा में वाहन कहां गया, किसके संपर्क में रहा और क्या गतिविधि हुई, इसकी जानकारी पुराने टोल रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज और उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों से मिलान कर जुटाई जा सकती है। यदि ऐसे रिकॉर्ड सामने आते हैं, तो कथित सोना तस्करी के नेटवर्क की वास्तविक तस्वीर समझने में जांच एजेंसियों को बड़ी मदद मिल सकती है।







