Bihar Jitan Ram Manjhi: गया के खिजरसराय स्थित बाना महादलित टोला में एक परिवार के दुख साझा करने पहुंचे केंद्रीय मंत्री और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी एक तस्वीर को लेकर चर्चा में आ गए हैं। इस तस्वीर में जीतन राम मांझी कुर्सी पर बैठे दिख रहे हैं, जबकि उनके आसपास कई लोग जमीन पर बैठे या खड़े हैं। सोशल मीडिया पर उनकी यह तस्वीर सामने आने के बाद संवेदनशीलता पर सवाल उठने लगे हैं।
जीतन राम मांझी ने अपने ‘एक्स’ अकाउंट पर इस मुलाकात की तस्वीरें साझा की थीं। उन्होंने बताया कि वह बाना महादलित टोला निवासी स्वर्गीय कांति देवी के परिजनों से मिलने गए थे। इस दौरान उन्होंने परिवार को सांत्वना दी और हरसंभव मदद का भरोसा दिलाया। मांझी ने यह भी कहा कि दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित कर परिवार को न्याय दिलाना उनकी प्राथमिकता है। हालांकि, इस मुलाकात का मकसद नेक होने के बावजूद सोशल मीडिया पर बहस का केंद्र बिंदु उनकी कुर्सी बन गई है।
चमकती कुर्सी पर क्यों उठे सवाल?
वायरल हो रही तस्वीर में जीतन राम मांझी एक चमकीली नई कुर्सी पर बैठे नजर आ रहे हैं, जिस पर एक स्टिकर भी लगा है। वहीं, आसपास के घर साधारण दिखते हैं और कई लोग जमीन पर बैठे या खड़े हैं। इस अंतर को देखकर लोगों के मन में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर यह कुर्सी वहां किसने रखी थी और इसका इंतजाम कैसे किया गया था। कुछ लोग यह भी पूछ रहे हैं कि क्या यह कुर्सी परिवार के घर में पहले से थी, या मांझी के आने पर विशेष रूप से लाई गई थी। इस तस्वीर से यह स्पष्ट नहीं होता कि कुर्सी परिवार ने खरीदी थी या किसी और ने व्यवस्था की थी। इसलिए, कुर्सी को परिवार की आर्थिक स्थिति से जोड़कर कोई ठोस दावा करना सही नहीं होगा।
सोशल मीडिया पर लोगों की तीखी प्रतिक्रिया
इस तस्वीर पर लोगों ने तीखी प्रतिक्रियाएं दी हैं। काजल सिंह नाम की एक यूजर ने टिप्पणी की, ‘सर साथ साथ कुर्सी का भी प्रचार कर रहे। और अपने लोगो के साथ कौन इतना उच्च कुर्सी पर बैठता है भला, अपनों के साथ जो जमीन पर बैठने का आनंद है वो इतनी उच्च कुर्सी पर बैठने से नहीं मिलेगा।’
‘यह चित्र आपको बता देगा कि जनार्दन कौन होते हैं। जनता या माननीय जी? समानता सबको चाहिए, लेकिन तभी तक, जब तक आप ऊंची कुर्सी तक न पहुंच जाएं।’
वहीं, ‘छोरा गया वाला’ नाम के यूजर ने तंज कसते हुए लिखा, ‘मांझी जी आपको बैठने के लिए भी मुशर्रफ टोला में चक्का कुर्सी लाया गया। सोचिए आप अपने समाज के लोगों में बराबरी में भी नहीं बैठ सकते। क्या विकास कीजिएगा महराज। वैसे भी भी कुछ किए नहीं है इतने दिनों में।’
यह घटना एक बार फिर इस बात पर बहस छेड़ती है कि दुख की घड़ी में किसी परिवार से मिलने जाने पर व्यवस्था और लोगों के साथ व्यवहार में कितनी संवेदनशीलता होनी चाहिए। किसी के दुख में शामिल होने का असली अर्थ केवल मुलाकात करना नहीं, बल्कि उनकी परेशानी को समझना और न्याय दिलाने के लिए ठोस कदम उठाना भी है।







