Varanasi Elephant: बिहार से आई एक हथिनी के बिहार लौटने के बाद वाराणसी में एक हाथी का मिजाज ऐसा बिगड़ा कि उसे संभालना महावतों के लिए भी बेहद मुश्किल हो गया। बताया जा रहा है कि हथिनी के वापस जाने के करीब एक सप्ताह बाद यह हाथी आक्रामक हो उठा और जमकर उत्पात मचाया। इस बेकाबू हाथी को नियंत्रित करने के लिए विशेषज्ञ टीम को लगभग 13 घंटे तक कड़ी मशक्कत करनी पड़ी।
कानपुर चिड़ियाघर के पशु चिकित्सक डॉ. नासिर खान ने इस घटना पर अपनी राय दी है। उन्होंने बताया कि हाथी के व्यवहार में बदलाव की एक संभावना हथिनी की गंध से जुड़ी हो सकती है। हालांकि, उनके मुताबिक, इसके पीछे हार्मोनल बदलाव और ‘मस्त’ जैसी अवस्था की भूमिका भी हो सकती है, जो नर हाथियों में आक्रामकता बढ़ाती है।
हथिनी के जाने के बाद बेकाबू हुआ हाथी
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, डॉ. नासिर खान ने हाथी के अचानक आक्रामक होने की वजह जानने के लिए उसके व्यवहार से जुड़ी पुरानी जानकारी जुटाई थी। इस दौरान पता चला कि रामलीला मेले में बिहार से एक हथिनी को लाया गया था। वह प्रजनन के लिए अनुकूल अवस्था में थी। कुछ दिनों बाद हथिनी को वापस बिहार भेज दिया गया। डॉक्टर के आकलन के अनुसार, उसके जाने के लगभग एक सप्ताह बाद हाथी के व्यवहार में बदलाव आने लगा।
हाथियों की सूंघने की क्षमता बहुत विकसित होती है। वे गंध से मादा हाथी की प्रजनन संबंधी अवस्था का भी पता लगा लेते हैं। ऐसे में, हथिनी के संपर्क और उसके चले जाने के बाद हाथी में हार्मोनल बदलाव होने की आशंका जताई गई है, जिससे उसका मिजाज बिगड़ गया।
60 लोगों की टीम ने 13 घंटे में संभाला मोर्चा
इस घटना की शुरुआत 18 अक्टूबर की सुबह करीब 10:30 बजे हुई थी। हाथी को संभालने की कोशिश में कई जिलों के महावत जुटे, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। डॉ. नासिर खान के मुताबिक, हाथी का मुख्य महावत इस दौरान घायल हो गया था। इसके बाद वह दूसरे महावतों के निर्देशों पर भी प्रतिक्रिया नहीं दे रहा था। शुरुआत में मालिक की इच्छा थी कि हाथी को दवा देकर बेहोश करने के बजाय हुक और चेन की मदद से काबू किया जाए। शाम 7 बजे से आधी रात तक इसी तरीके से कोशिश की गई, लेकिन हाथी लगातार इधर-उधर दौड़ता रहा।
हालात की गंभीरता को देखते हुए, आखिरकार उसे ट्रैंकुलाइज करने यानी दवा की मदद से बेहोशी की अवस्था में लाने का निर्णय लिया गया। सूचना मिलने पर डॉ. नासिर खान उसी दिन शाम करीब 6 बजे घटनास्थल पर पहुंचे। उनके साथ गोरखपुर की टीम भी मौजूद थी। वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ लगभग 25 महावतों समेत कुल 60 लोग इस अभियान में शामिल हुए। हाथी को सुरक्षित तरीके से नियंत्रित करने के लिए ट्रैंकुलाइजिंग गन से डार्ट करने की तैयारी की गई। घेराबंदी की गई और उसे सुरक्षित जगह तक ले जाने के लिए जेसीबी की व्यवस्था की गई। डॉक्टर के अनुसार, ऐसे रेस्क्यू में सबसे पहले भीड़ को दूर रखना और हाथी के आसपास सुरक्षित घेरा बनाना बेहद जरूरी होता है।
क्यों आक्रामक हो जाते हैं नर हाथी?
डॉ. नासिर खान के अनुसार, अक्टूबर से मार्च के बीच नर हाथियों में ‘मस्त’ की अवस्था देखने को मिल सकती है। इस दौरान टेस्टोस्टेरोन का स्तर बढ़ने से उनके व्यवहार में बड़ा बदलाव आता है और वे अधिक आक्रामक हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में वे अपने परिचित महावत पर भी हमला करने से नहीं हिचकते। हालांकि, डॉक्टर ने यह स्पष्ट नहीं किया कि वाराणसी की घटना में हाथी पूरी तरह मस्त की अवस्था में था, लेकिन उनके मुताबिक, उसमें इस अवस्था जैसे लक्षण दिखाई दे रहे थे।
कानपुर चिड़ियाघर के पशु चिकित्सक डॉ. नासिर खान ने कहा, ‘इसकी एक संभावना हथिनी की गंध से जुड़ी हो सकती है। हालांकि, इसके पीछे हार्मोनल बदलाव और मस्त जैसी अवस्था की भूमिका भी हो सकती है।’
रेस्क्यू के बाद हाथी को शोरगुल से दूर रखना, उसकी लगातार निगरानी करना और जरूरत के अनुसार उपचार देना आवश्यक है। उसकी स्थिति के हिसाब से यह निगरानी कुछ दिनों से लेकर कई महीनों तक चल सकती है।







