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बिहार में गिरती पुलिसिया साख का सवाल….कौन बनेगा अगला Bihar का नया Director General Of Police

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देशज टाइम्स अपराध ब्यूरो। बिहार में नये पुलिस महानिदेशक कौन होंगे यह सवाल आम लोगों के जुबान पर हैं। नये डीजीपी से लोंगों को बहुत उम्मीदें हैं। 19 दिसंबर को डीजीपी एस के सिंघल सेवानिवृत हो रहें हैं। बहुत बेसब्री से लोग इस बात का इंतजार कर रहें हैं कि बिहार का डीजीपी कौन होगा। पुलिस की गिरती व्यवस्था से आम लोग परेशान हैं उन्हें उम्मीद हैं कि नये डीजीपी के पद भार ग्रहण के बाद पुलिसिया व्यवस्था में सुधार हो सकता हैं।

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इस राज्य के कुछ जिलों को छोड़ बांकी के जिलों में पुलिसिया व्यवस्था का स्तर बहुत गिर गया हैं। आम लोग इस व्यवस्था से काफी परेशान हैं। पुलिस के पर्यवेक्षण का तरीका भी बदल गया हैं। घटना स्थल पर कोई भी पर्यवेक्षणकर्ता नहीं जाते हैं, लेकिन इनका पर्यवेक्षण रिपोर्ट निकल जाता हैं। ऐसे में न्याय की बात करना बेइमानी हैं।

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डीएसपी कार्यालय में प्राथमिकी के मजमून के हिसाब से अलग अलग पुलिसकर्मियों को जिम्मा दिया गया हैं। इस कुर्सी पर बैठे पुलिसकर्मी वादी/प्रतिवादी दोनों को फोन करते हैं। अलग अलग समय में इन्हें गवाहों के साथ बुलाया जाता हैं। दोनों पक्षों की और से गवाही ली जाती हैं। फिर उस टेबल पर बैठे पुलिसकर्मी दोनों पक्षों से पैसे का डिमांड करता हैं।

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जो भी पक्ष अधिक पैसा देता हैं उसके पक्ष में टिप्पणी निकाल दी जाती हैं। यही नहीं डीएसपी की ओर से निकाले गये पर्यवेक्षण टिप्पणी को ही एसपी/या एसएसपी सत्य मानकर अग्रसारित कर देते हैं, और एसपी/एसएसपी का प्रतिवेदन भी भी उसी अनुसार निकल जाता हैं।एक आध मामले ही शायद ऐसे मिलेंगे जिसमें डीएसपी के पर्यवेक्षण टिप्पणी को एसपी/एसएसपी की ओर से गलत करार दिया जाता हैं।

सरकार भी मानती हैं कि पुलिस में अनुशासन जरूरी हैं इसके लिये ही कई पद हैं ताकि इंस्पेक्टर की गलती को डीएसपी और डीएसपी के गलतियों को एसपी /एसएसपी और आईजी समीक्षा कर सही लोंगों को न्याय देंगे पर ठीक इसके विपरीत सब कुछ प्रत्येक जिला में हो रहा हैं।

इन 10 वर्षों में शायद एक भी डीएसपी के विरुद्ध कोई भी प्रतिवेदन सरकार को न एसपी/एसएसपी भेजे होंगे ना कोई ही कोई आईजी। लाजमी हैं इस कारण पीड़ित व्यक्ति को न्याय कैसे मिलेंगे।

दरभंगा जिला में अनगिनत ऐसे मामले हैं और कई बड़े-बड़े मामले हैं जिसमें पीड़ित व्यक्ति को दर दर की ठोकरें खानी पर रही हैं। इसी का नतीजा यह भी है कि कई जिलों के पुलिस पदाधिकारी यहां तक की एसपी भी हाई कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान उनके वर्दी की हेकड़ी निकल जाती हैं।

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और, यही घटनाक्रम जब सोशल मीडिया पर तैरता हैं तो पूरे पुलिस विभाग की बदनामी होती हैं।वरीय पुलिस पदाधिकारियों के नाकामियों के कारण पुलिस विभाग में दलालों की संख्या बढ़ गई हैं। कई दलाल किस्म के लोग तो फेसबुक, व्हाट्सएप आदि पर एस्टेट्स में बजावते डीएसपी, एसपी/एसएसपी का फोटो लगा लेते हैं।

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यही नहीं इनके अधीनस्थ काम कर रहें पुलिस कर्मियों को डराने लगते हैं। उनसे काम भी निकाल लेते हैं। ऐसी व्यवस्था दस वर्ष पहले नहीं थी। अब सवाल यही हैं नये डीजीपी के प्रभार के बाद क्या पुलिसिया व्यवस्था में सुधार होगा या फिर ऐसे ही सिस्टम चलता रहेगा जहां बिना पैसों की कोई बात नहीं होती।

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