
“बाबा तिलका मांझी, खाम खुंटी काना हो” अतीत की चिंगारी, वर्तमान का आईना…भागलपुर से एक जागी हुई कलम की जुबानी…बाबा जब बरगद की जड़ों पर बैठते हैं, तो उनकी आवाज़ में 13 जनवरी 1784 की वही आग होती है जिसने क्लीवलैंड के घमंड को तोड़ा था। वे आज के कुलपतियों और बाबुओं से पूछते हैं कि जिस ‘खाम-खुंटी’ (जल-जंगल-ज़मीन) की रक्षा के लिए उन्होंने अपना ख़ून बहाया था, उसे आज अपनों की ही दलाली और भ्रष्टाचार के बाज़ारों में क्यों बेचा जा रहा है? जिस यूनिवर्सिटी में गरीब मां महुआ बेचकर अपने बच्चे की फीस जोड़ती है, वहाँ आज विद्या की नहीं, सिर्फ़ सौदों की बोलियां लग रही हैं।

मगर यह कहानी सिर्फ़ जंग की नहीं है; इसमें झिनो और तिलका की अधूरी मोहब्बत का वह मर्मस्पर्शी अफ़साना भी है जिसने सिखाया कि धरती का कर्ज़ मोहब्बत के इंतज़ार से कहीं ज़्यादा बड़ा होता है। झिनो महुआ के पेड़ के नीचे सो गई, मगर उस गीली लकड़ी से उठी चिता की टीस आज भी बाबा की आँखों में तैर रही है। वे आज के युवाओं से कहते हैं—”मोहब्बत ज़रूर करना, पर अपनी मिट्टी से बेवफ़ाई करके नहीं।”

लेखक की काँपती कलम को झकझोरते हुए बाबा ने साफ़ कह दिया है कि आज के दौर में कलम पर लगा ‘डर का ज़हर’ सबसे ज़्यादा ख़तरनाक है। जब लेखनी सौदा करने लगे, तो शहीदों की चिता की लकड़ियां भी बिक जाती हैं। आइए, देशज टाइम्स की इस रूह कँपा देने वाली विशेष रिपोर्ट के ज़रिए भोर के उस संकल्प को महसूस करते हैं, जहाँ एक डरी हुई कलम अब एक नुकीला तीर बन चुकी है, जो हर उस दफ़्तर और कुर्सी को बेधने के लिए तैयार है जहाँ आज भी ‘क्लीवलैंडगीरी’ का नंगा नाच चल रहा है।
1. अमावस की रात: जब सपना इतिहास बन गया
भागलपुर। कल रात अमावस की थी। भागलपुर के ऊपर आसमान स्याह था। गंगा की लहरें भी चुप थीं, जैसे कोई फरमान सुनने को ठिठक गई हों। हवा में महुआ की गंध थी—वही गंध जो 240 साल पहले भी थी, जब तिलका बाबा के तीर पर जहर चढ़ता था। दूर कहीं मांदर की थाप उठ रही थी। थाप नहीं, धरती का दिल धड़क रहा था।
नींद में लगा—कोई बरगद के नीचे खड़ा है। बरगद वही, जिसके नीचे अंग्रेजों ने बाबा को फांसी दी थी। माथे पर शिकन, जैसे पहाड़ की दरारें। हाथ में टूटा तीर, पर टूटा नहीं था हौसला। आँखों में 240 साल पुरानी आग—न बुझी है, न बुझेगी।
बाबा तिलका मांझी…!
पांवों में बिवाई नहीं थी, पर चाल में पहाड़ की मजबूती थी। धोती मटमैली, पर माथे का तेज सूरज को मात दे रहा था।
मैंने पूछा—
“बाबा, इतनी रात गए?”
हवा थम गई। पत्ते तक सहम गए। वो बोले—
“तुम्हारे शहर में मेरी यूनिवर्सिटी है न? तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय? उसी को देखने चला आया। पर देखता हूँ, नाम मेरा है, काम कंपनी वाला है। बोर्ड पर ‘तिलका मांझी’ लिखा है, और फाइलों में सौदेबाजी लिखी है।”
सन्नाटा चीरती उनकी आवाज में 13 जनवरी 1784 की वो रात बोल रही थी। वो रात जब भागलपुर की मिट्टी ने पहली बार अंग्रेजी खून चखा था। जब उनका तीर क्लीवलैंड का कलेजा चीरकर निकल गया था, और पहाड़ों ने ‘हूल’ का नारा लगाया था।
बाबा बरगद की जड़ पर बैठ गए। जड़ें अब भी उतनी ही गहरी थीं जितनी उनकी जिद।

“सुना है वहां कुलपति बैठता है। हमारे जमाने में राजा बैठते थे। राजा का काम था—प्रजा की रक्षा, जंगल की रक्षा, बोली की रक्षा। कुलपति का काम क्या है? विद्या की रक्षा। पर आज विद्या फाइलों में बंद है। AC कमरे में कैद है। कुर्सी पर बैठे लोग कागज उलटते हैं, जमीर नहीं। हस्ताक्षर करते हैं, इतिहास नहीं पढ़ते।
हमने अंग्रेज से लड़ाई लड़ी थी कि हमारी खाम-खुंटी न छिने। खाम-खुंटी यानी जल-जंगल-जमीन। हमारा हक, हमारी पहचान। आज यूनिवर्सिटी की खाम-खुंटी कौन उखाड़ रहा है? वही, जिन्हें रखवाली सौंपी गई थी। नियुक्ति में बोली लगती है, जैसे बाजार में भैंस बिकती है। डिग्री में दलाली चलती है, जैसे कंपनी का लगान। बाबा, ये तो कंपनी से भी बड़ा जुल्म हुआ। अंग्रेज कम से कम सामने से वार करता था। ये तो अपनों की पीठ में छुरा घोंपते हैं।
दीवारों पर मेरा नाम टांगा है, मेरा चित्र टांगा है। माला भी चढ़ाते हैं। पर काम में मेरा ईमान नहीं टांगा। मेरा तीर नहीं टांगा। बाबू रजिस्टर पर दस्तखत करते हैं और 4 बजे घर। छात्र फीस की रसीद लिए दर-दर भटकता है, खिड़की-खिड़की पर माथा पटकता है। शिक्षक पढ़ाने से डरता है, क्योंकि सवाल पूछे जाएंगे। नोट्स बेचने से नहीं डरता, क्योंकि जेब भरती है।

हमने क्लीवलैंड को तीर मारा था क्योंकि वो हमारी बोली छीन रहा था, हमारी जमीन पर ‘दामिन-ए-कोह’ का ठप्पा लगा रहा था। आज तुम कलम चलाते हो तो किसके लिए चलाते हो? अपने पेट के लिए, प्रमोशन के लिए, या उस लड़के के लिए जो पहाड़ से उतरकर, भादो की कीचड़ में सने पांव लेकर BA में नाम लिखाने आया है? उसकी मां ने महुआ बेचकर फीस जोड़ी है बेटा।”
बाबा उठे। टूटा तीर जमीन में गाड़ दिया। मिट्टी फटी नहीं, कलेजा फटा।
“सुनो, यूनिवर्सिटी कोई इमारत नहीं होती। ईंट-गारा-सीमेंट नहीं होती। वो चिंगारी होती है। हमने 1784 में चिंगारी जलाई थी—हूल की चिंगारी। तुम 2026 में उसे बुझा रहे हो। याद रखना—हमारे तीर में जहर होता था। एक बार लगा तो काम तमाम। आज के लड़के की आँख में सवाल है। सवाल का जहर ज्यादा खतरनाक होता है। वो लेट से असर करता है। धीरे-धीरे चढ़ता है। पर जब चढ़ता है न, तो कुर्सियां हिल जाती हैं, तख्त पलट जाते हैं।”
झिनो का महुआ और अधूरा इश्क: धरती से बड़ा कोई नहीं
बाबा की आवाज भर्रा गई। आँखें दूर पहाड़ की तरफ टिक गईं। मानो वहां झिनो खड़ी हो, मांडर लिए।
“बेटा, तुम सोचते होगे कि हमने सिर्फ जंग लड़ी। खून ही बहाया। नहीं। हम भी इंसान थे। हाड़-मांस के। दिल हमारा भी धड़कता था। मैं भी एक लड़की से प्यार करता था। लेकिन…

उसका नाम था ‘झिनो’। नाम नहीं, नदी थी वो। मांडर की थाप पर जब वो नाचती, तो लगता जंगल भी पांव थिरकाने लगा है। पत्ते भी ताल देने लगे हैं। उसने एक दिन मेरे हाथ में महुआ का फूल रखकर कहा था—’तिलका, तू मांझी बनेगा, मैं तेरी मांझिन बनूंगी। एक झोपड़ी बनाएंगे, महुआ के पेड़ के नीचे। तू तीर बनाएगा, मैं खाना बनाऊंगी।’
मैंने हां कहा था। आँखों में सपना भरकर हां कहा था। पर उसी रात कंपनी के सिपाही आए। खबर लाए—लगान दोगुना हो गया। और बेगारी में मेरे बाप को रस्सी से बांधकर घसीट ले गए। बाप की पीठ पर कोड़े के निशान देखे थे मैंने।
झिनो ने मेरी आँखों में आग देखी। बदले की आग। जंगल की आग। समझ गई। कुछ नहीं बोली। बस मेरा धनुष मुझे थमाकर बोली—’जा तिलका। पहले कर्ज चुकाओ। धरती का कर्ज। खाम-खुंटी का कर्ज। ये महुआ का पेड़, ये पहाड़, ये नदी— कर्जदार हैं हम। मोहब्बत इंतजार कर लेगी। धरती इंतजार नहीं करती।’
मैं चला गया। तीर-धनुष उठाकर। पीछे मुड़कर नहीं देखा। अगर देख लेता, तो शायद लौट आता। और लौट आता तो क्लीवलैंड नहीं मरता। झिनो इंतजार करती रही। महुआ के पेड़ के नीचे।

जंगल-जंगल भटका। रात-रात भर जागा। कंपनी के थाने फूंके। लगान की रसीदें जलाईं। अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया। जब लौटा तो झिनो का गांव उजड़ चुका था। क्लीवलैंड ने ‘दामिन-ए-कोह’ के नाम पर सबको खदेड़ दिया था। पहाड़िया बिलख रहे थे।
लोगों ने बताया—झिनो आखिरी दम तक कहती थी ‘तिलका आएगा। हमारी खाम-खुंटी लौटाएगा। हमारा मान लौटाएगा।’ फिर एक दिन उसी महुआ के पेड़ के नीचे… वो सो गई। हमेशा के लिए सो गई। जागी नहीं।
मैंने उस पेड़ को सीने से लगाया था बेटा। छाल पर अब भी उसके हाथों के रंग के निशान थे, मेहंदी के। उसी पेड़ की लकड़ी से मैंने अपना आखिरी धनुष बनाया। उसी से क्लीवलैंड को मारा।
1785 में जब अंग्रेजों ने मुझे इस बरगद से लटकाया, फंदा गले में कसा, दर्द नहीं हुआ। सच कहता हूँ, दर्द नहीं हुआ। दर्द तो तब हुआ था जब झिनो की चिता के लिए सूखी लकड़ी नहीं मिली थी। जंगल वालों ने गीली लकड़ी से ही उसे आग दी थी।

आज तुम्हारी यूनिवर्सिटी के लड़के-लड़कियां हाथ पकड़कर घूमते हैं। लाइब्रेरी में साथ पढ़ते हैं। कैंटीन में हंसते हैं। अच्छा लगता है। बहुत अच्छा लगता है। पर उनसे कहना—मोहब्बत करना, जरूर करना। इश्क जिंदगी है। पर अपनी मिट्टी से बेवफाई करके नहीं। डिग्री लेना, जरूर लेना। पढ़ना-लिखना ही तो हथियार है। पर अपनी खाम-खुंटी बेचकर नहीं। अपनी बोली, अपनी पहचान गिरवी रखकर नहीं।
क्योंकि शौक की कीमत लगती है, और जिद का अंजाम होता है। मोहब्बत की कीमत भी लगती है—कभी-कभी पूरी जिंदगी। और धरती से गद्दारी की कीमत लगती है—सात पुश्तें।“
एक कलम की टीस, एक शहीद की कसक: जब स्याही खून बन जाए
बाबा मेरी मेज पर रखी अधलिखी कॉपी पर बैठ गए। कॉपी पुरानी थी। पन्ने पीले पड़ गए थे। स्याही सूख रही थी। कलम मेरे हाथ में कांप रही थी—डर से नहीं, दर्द से।
बोले—
“लिखते क्यों नहीं? तेरी कलम को लकवा मार गया है क्या?”
मैंने कहा—”बाबा, दर्द से हाथ बंधे हैं। टीस ऐसी है कि रात भर सोने नहीं देती। कसक ऐसी है कि रोटी हलक से नहीं उतरती। पीड़ा ये कि सच लिखूं तो कुर्सी नाराज हो जाती है। ट्रांसफर का डर, सस्पेंशन का डर, मुकदमे का डर। और कसक ये कि झूठ लिखूं तो तुम नाराज हो जाओगे। तुम्हारी आत्मा धिक्कारेगी। और पीड़ा ये कि कागज महंगा हो गया है बाबा, और जमीर उससे भी महंगा। जमीर का भाव तो बाजार में है ही नहीं।

यूनिवर्सिटी में भ्रष्टाचार देखा। फाइलों में दीमक की तरह लगा है। लिखा—तो अगले दिन संपादक का फोन आया, ‘खबर हटा दो’। नशे के सौदागर देखे। स्कूल के गेट पर ब्राउन शुगर बेचते। लिखा—तो धमकी आ गई, ‘कलम तोड़ देंगे, हाथ तोड़ देंगे’। बाबा, तुमने तो एक क्लीवलैंड मारा था। एक को मार दिया तो दहशत फैल गई थी। यहां तो हर गली में क्लीवलैंड कुर्सी पर बैठा है। हर विभाग में एक क्लीवलैंड। किस-किस पर तीर चलाऊं? तीर कम पड़ जाएंगे।”
बाबा ने कॉपी पलटी। हर पन्ने पर कटी हुई लाइनें थीं। लाल स्याही से कटी। सेंसर की हुई सच्चाइयां थीं। मेरी हिम्मत की लाशें थीं।
हंसकर बोले—पर हंसी में भी दर्द था। “हमारे जमाने में तीर पर जहर लगाते थे, सीधा कलेजे में उतरता था। तुम्हारे जमाने में कलम पर डर लगाते हैं? डर का जहर धीरे-धीरे मारता है बेटा।
हम तो जंगल में थे। दुश्मन साफ था—सफेद टोपी वाला अंग्रेज। लक्ष्य साफ था—आजादी। तुम्हारे तो सौ दुश्मन हैं—डर, लोभ, लालच, ट्रांसफर, मुकदमा, लाइक, व्यूज, सब्सक्राइबर। बेटा, जब लेखनी सौदा करने लगे, जब सवाल की जगह दलाली करने लगे, तो समझो शहीदों की चिता की लकड़ी भी बिक गई। हम तो फिर भी लकड़ी पर जले थे। तुम कागज पर बिक रहे हो।
नाम तो दे दिया, काम कब दोगे? जयंती पर फूल चढ़ाते हो, क्विंटल माला चढ़ाते हो। मेरी जिद पर, मेरे ‘हूल’ पर, मेरी बगावत पर पहरा बैठाते हो। पुलिस लगा देते हो। भाषण में गरजते हो ‘तिलका अमर रहे’, ‘तिलका मांझी जिंदाबाद’। और फाइल में दबे पांव लिखते हो ‘मामला दबा रहे’, ‘जांच ठंडे बस्ते में रहे’।
बेटा, शहीद को माला से ज्यादा डर चुप्पी से लगता है। फूल से ज्यादा डर झूठ से लगता है। तुम चुप हो गए, तुम बिक गए, तो समझो मुझे दूसरी बार फांसी दे दी। पहली बार अंग्रेज ने दी थी, दूसरी बार तुम दोगे।”
बाबा ने मेरा हाथ पकड़ा। उनका हाथ अब भी जंगल की तरह खुरदुरा था। महुआ के तने जैसा सख्त। मेरे हाथ को देखा—कागज की तरह मुलायम, पर स्याही से स्याह। डर से स्याह।
“रो मत पगले। रोने से जंग नहीं जीती जाती। तीर और कलम में फर्क नहीं होता। दोनों का काम है चुभना। सोए हुए को जगाना। फर्क सिर्फ इतना है—हमने खून बहाया, लाल खून। तुम्हें स्याही बहानी है, काली स्याही। पर स्याही भी जब सच्ची हो, तो खून से कम नहीं होती।
तेरी टीस ही तेरी ताकत है। यही टीस तुझे रात भर जगाएगी। तेरी कसक ही तेरा क्लीवलैंड है। इसी कसक से लड़ना है तुझे। जब-जब रात में नींद न आए, करवटें बदलो, समझना हम तेरा दरवाजा खटखटा रहे हैं। हम, और झिनो, और वो सब जो खाम-खुंटी के लिए मरे।

लिख। डर के बिना लिख। बिकने के बिना लिख। झुके बिना लिख। क्योंकि जिस दिन लेखनी मर जाती है, जिस दिन सवाल मर जाता है, उस दिन शहीद दूसरी बार मरते हैं। और दूसरी मौत, पहली से ज्यादा दर्दनाक होती है।”
भोर का संकल्प: अतीत से वर्तमान तक, और भविष्य तक
नींद टूटी तो भोर हो चुकी थी। पूरब में लाली फैल रही थी। खिड़की से ठंडी हवा आ रही थी। कॉपी भीगी हुई थी। मेज पर रखी थी। आंसू से या स्याही से, पता नहीं। शायद दोनों से। कलम भी भीगी थी।
दिमाग में सवाल कौंधा—क्लीवलैंड मर गया, पर क्लीवलैंडगीरी जिंदा क्यों है? वो तो एक था। ये तो हर विभाग में, हर गली में, हर कुर्सी पर बैठे हैं। नाम बदल गया है, काम वही है—लूटना, दबाना, छीनना।
कलम उठाई। हाथ अब कांप नहीं रहा था। टीस अब भी थी। कसक अब भी थी। पर अब वो टीस धार बन गई थी। कलम की नोक तीर की नोक बन गई थी।
लिख दिया सबसे ऊपर, मोटे अक्षरों में—
“बाबा, आज से शौक की कीमत भी लिखूंगा, और जिद का अंजाम भी। सच की कीमत भी लिखूंगा, और चुप्पी का अंजाम भी।”
क्योंकि शौक आँखों पर पर्दा डाल देता है। आदमी को अंधा कर देता है। जिद कानों में रुई ठूंस देती है। आदमी को बहरा कर देती है। और जब शौक को जिद का साथ मिल जाए, जब लालच को सत्ता का साथ मिल जाए, तो बर्बादी मुकम्मल हो जाती है। कौम की, नस्ल की, यूनिवर्सिटी की, मुल्क की।
आखिरी बात: चेतावनी भी, उम्मीद भी

जब-जब कुर्सी पर बैठे लोग सो जाते हैं, जब-जब उनकी आत्मा मर जाती है, तब-तब शहीदों को सपनों में आना पड़ता है। हमें जगाने। हमें झकझोरने। हमें याद दिलाने कि हम क्यों जिए, हम क्यों मरे।
“बाबा तिलका मांझी, खाम खुंटी काना हो”—आज ये पुकार सिर्फ नारा नहीं है। ये चेतावनी है। ये आगाज है। आज ये पुकार कुलपति के AC कमरे से लेकर, रजिस्ट्रार के दफ्तर से लेकर, मंत्रालय के गलियारे तक, और ऊपर दिल्ली तक गूंजेगी। गूंजनी चाहिए।
वरना कल को इतिहास की किताब में एक नई पंक्ति जुड़ेगी, काले अक्षरों में—
“एक यूनिवर्सिटी थी, जिसके नाम के आगे ‘शहीद’ लगा था, और काम के आगे सन्नाटा। जिसके गेट पर तिलका मांझी का बोर्ड था, और अंदर क्लीवलैंड की आत्मा भटकती थी।”
और बाबा, अगली बार सपने में आओ तो डांटना मत। गरियाना मत। क्योंकि ये कलम अब सोएगी नहीं। ये आँखें अब बंद नहीं होंगी। ये जमीर अब बिकेगा नहीं।

पहले धरती, फिर धड़कन। पहले स्याही, फिर सांस। पहले सवाल, फिर सलाम।
पहले खाम-खुंटी, फिर कोई और चीज।
—एक कलम, जो अब तीर है। एक टीस, जो अब आग है। एक कसक, जो अब इंकलाब है | देशज टाइम्स, भागलपुर








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