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Bhagalpur News: 239 साल पहले जिसने रखी गौ – स्वराज की नींव, आर्थिक स्ट्राइक की टैक्स टेररिज्म… क्या भगत सिंह से कम था ‘ अंग का डकैत ‘ ? | Deshaj Times Special Ep. 05 | कब मिलेगी बाबा तिलका मांझी की आत्मा को शांति?

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भागलपुर। इतिहास की किताबों ने हमें पढ़ाया कि मंगल पांडे पहले क्रांतिकारी थे, लेकिन भागलपुर की मिट्टी गवाह है कि उनसे 70 साल पहले ही एक ‘जंगल के बेटे’ ने ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी थीं। बाबा तिलका मांझी अंग्रेजों के खिलाफ पहली ‘आर्थिक स्ट्राइक’ करने वाले रणनीतिकार थे!

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5000 मवेशी और ‘टैक्स टेररिज्म’ पर चोट

हवेली खड़गपुर उस दौर में अंग्रेजों का सबसे बड़ा राजस्व वसूली सेंटर था। क्लीवलैंड ने जब राजपुर में लगान वसूली का क्रूर फरमान सुनाया, तो तिलका मांझी ने कागजों पर नहीं, बल्कि मैदान में जवाब दिया। उन्होंने विद्रोह का बिगुल फूंका और अंग्रेजों के 5000 मवेशी हांक लिए!

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गणित समझिए — हवेली खड़कपुर उस दौर में ब्रिटिश हुकूमत का वह रणनीतिक केंद्र था, जहाँ से न केवल मुंगेर बल्कि पूरे भागलपुर क्षेत्र की राजस्व वसूली (Revenue Collection) को नियंत्रित किया जाता था। जब कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड ने ‘राजमहल की पहाड़ियों’ के आदिवासियों पर लगान का क्रूर बोझ लादा, तो तिलका मांझी ने इसे केवल आर्थिक शोषण नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी और स्वाभिमान पर प्रहार माना। उन्होंने उस समय के ‘टैक्स टेररिज्म’ का जवाब अपनी प्रसिद्ध ‘आर्थिक स्ट्राइक’ से दिया—एक सुनियोजित छापे में अंग्रेजों के 5000 मवेशियों को मुक्त कराकर उन्होंने ब्रिटिश रसद और कृषि व्यवस्था की कमर तोड़ दी। यह केवल एक विद्रोह नहीं, बल्कि ‘गौ-स्वराज’ की वह नींव थी, जिसने साबित किया कि भारतीय समाज के लिए मवेशी केवल संपत्ति नहीं, बल्कि संस्कृति और जीविका का आधार थे।

Bhagalpur News: 80 सालों से नहीं जली बाबा Tilka Majhi की समाधि पर दीप… Deshaj Times Special Ep. 01 | कब मिलेगी बाबा तिलका मांझी की आत्मा को शांति?

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इतिहास की विडंबना देखिए, जिसे ब्रिटिश अभिलेखों में ‘डाकू’ या ‘विद्रोही’ कहा गया, वे वास्तव में ‘गुरिल्ला युद्ध’ के प्रथम प्रवर्तक थे। 1784 में सुल्तानगंज की पहाड़ियों से तीर चलाकर क्लीवलैंड का अंत करने वाले तिलका मांझी, मंगल पांडे से भी लगभग 70 साल पहले आजादी का बिगुल फूंक चुके थे। आज 2026 में, जब हम गौ-रक्षा और स्वदेशी स्वाभिमान की बात करते हैं, तो हमें अंग जनपद के इस महान सपूत को याद करना होगा, जिन्होंने 1857 से 70 साल पहले यानी आज से करीब 239 वर्ष पहले गौ-स्वराज की नींव रखी।

Bhagalpur News: बीत गए 35 साल…’Tilka Majhi’ के नाम चैप्टर कब जोड़ेगा भागलपुर TMB विश्वविद्यालय @Deshaj Times Special Ep. 02 | कब मिलेगी बाबा तिलका मांझी की आत्मा को शांति?

तिलका मांझी का बलिदान भगत सिंह के बलिदान से कम नहीं था; फर्क बस इतना है कि भगत सिंह ने असेंबली में बम फेंककर बहरों को सुनाया था, और तिलका मांझी ने अंग्रेजों के आर्थिक तंत्र को ध्वस्त कर उन्हें उनकी औकात दिखाई थी। 1785 में भागलपुर के चौराहे पर बरगद के पेड़ से झूलते हुए उस महानायक ने जो बीज बोया, वही आगे चलकर 1857 की क्रांति का वटवृक्ष बना।

Before Mangal Pandey, there was Tilka Manjhi — the forest warrior who answered British tax terror with rebellion, not surrender. | Photo: Deshaj Times
Before Mangal Pandey, there was Tilka Manjhi — the forest warrior who answered British tax terror with rebellion, not surrender. | Photo: Deshaj Times

यह कोई डकैती नहीं थी; यह शोषण के विरुद्ध ‘इकोनॉमिक सर्जिकल स्ट्राइक’ थी। अंग्रेज आदिवासियों की गाय-भैंस लगान के नाम पर कुर्क कर ले जाते थे, तिलका मांझी ने उनकी रसद और ताकत ही छीन ली। आंख के बदले आंख, मवेशी के बदले मवेशी!

जब मवेशी वापस नहीं मिले, तो क्लीवलैंड तिलमिला गया। इसी गुस्से में उसने ‘हत्या का अंतिम आदेश’ जारी किया।

  • सच ये है: तिलका ने सिर्फ अंग्रेजों की ‘अवैध संपत्ति’ छीनी, किसी गरीब का एक दाना नहीं छुआ। यह लूट नहीं, ‘सांस्कृतिक संपत्ति की घर वापसी’ थी।

नुक्कड़ नाटकों की गूंज: जब सड़कों पर ज़िंदा हुए तिलका

भारतीय अस्मिता के मानचित्र पर कुछ नाम स्याही से नहीं, बल्कि पसीने और रक्त से लिखे गए हैं। महाश्वेता देवी और सफदर हाशमी दो ऐसे रचनाधर्मी व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने हाशिए पर धकेल दिए गए समाज की पदचाप को मुख्यधारा के साहित्य और रंगमंच की धड़कन बना दिया। विशेषकर बाबा तिलका मांझी के उस विद्रोही स्वर को, जिसे विस्मृति के अंधकार में विलीन करने का प्रयास किया गया था, इन दोनों मनीषियों ने अपनी लेखनी और अभिनय से पुनर्जीवित किया।

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महाश्वेता देवी: शब्द जहाँ शास्त्र बनते हैं

महाश्वेता देवी मात्र एक लेखिका नहीं, बल्कि उन दमित कंठों की ‘स्वर-साधिका’ थीं, जिन्हें सदियों से मौन रखा गया। उन्होंने जनजातीय इतिहास के धूल-धूसरित पृष्ठों को पलटकर उसे समकालीन ‘फिक्शन’ के साथ इस प्रकार गुंथा कि इतिहास स्वयं को वर्तमान के आईने में देखने लगा।
अस्मिता का प्रतीक ‘तीर’: उनके कालजयी उपन्यास ‘चोट्टि मुंडा और उसका तीर’ (1980) में ‘तीर’ केवल एक अस्त्र नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्तरजीविता (Cultural Survival) का महाकाव्य बन गया। यहाँ तिलका मांझी का विद्रोही स्वर एक अंतर्धारा की भांति प्रवाहित होता है, जो यह संदेश देता है कि जनजातीय प्रतिरोध कोई अतीत की घटना नहीं, बल्कि शोषण के विरुद्ध एक सतत निरंतरता है।

  • संग्रहालयीकरण (Museumization) का विरोध: महाश्वेता जी ने जनजातीय जीवन को किसी ‘संग्रहालय’ की वस्तु बनाने के बजाय उसे एक जीवंत प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत किया। ‘शालगिरार डाके’ (शालगिरह की पुकार पर) में उन्होंने तिलका मांझी के उन ‘साल के पत्तों’ का विशद वर्णन किया, जो एकता और क्रांति के गुप्त संदेशवाहक थे।
  • वैश्विक सुबअल्टरन विमर्श: गायत्री चक्रवर्ती स्पिवक के अनुवादों ने तिलका के संघर्ष को वैश्विक विमर्श के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया। वहीं, उनके नाटकों ने ग्रामीण अंचलों में यह सिद्ध कर दिया कि रंगमंच इतिहास के सबसे प्रभावी दस्तावेजों में से एक है।
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सफदर हाशमी: गलियों के कोलाहल में गूंजता इंकलाब

1980 का दशक वह कालखंड था जब जनतंत्र की जड़ें हिल रही थीं। उस समय सफदर हाशमी और उनके संगठन ‘जन नाट्य मंच’ (जनम) ने रंगमंच को संभ्रांत कक्षों से निकालकर धूल भरी गलियों में खड़ा कर दिया। हाशमी का दर्शन स्पष्ट था—”रंगमंच को जनता की देहरी तक पहुँचना चाहिए।”

इतिहास की सक्रिय ऊर्जा: ‘जनम’ ने भागलपुर के जनजातीय क्षेत्रों में नाटकों के माध्यम से तिलका मांझी को एक स्थिर ऐतिहासिक मूर्ति के बजाय एक सक्रिय राजनीतिक ऊर्जा के रूप में रूपांतरित कर दिया। इनका उद्देश्य मनोरंजन नहीं, बल्कि ऐतिहासिक चेतना को वर्तमान के किसान-मजदूर आंदोलनों से जोड़ना था।
क्रांति का प्रहार: नाटक का वह मर्मस्पर्शी संवाद आज भी रंगमंच की रगों में दौड़ता है:

“साहब! ये गाय हमारी है, ये घास हमारी है, तो तुम्हारा टैक्स कैसा? ये तीर हमारा है और अब ये जान भी तुम्हारी नहीं रहेगी!”

यह संवाद केवल औपनिवेशिक कराधान पर प्रहार नहीं था, बल्कि भूमि और संसाधनों पर स्थानीय समाज के संप्रभु अधिकार का उद्घोष था।

प्रतिरोध की साझी विरासत

महाश्वेता देवी की लेखनी और सफदर हाशमी का नुक्कड़ नाटक—दोनों ही उस ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ के वाहक हैं, जो सत्ता को सच का आईना दिखाती है। इन दोनों ने यह सिद्ध कर दिया कि जब साहित्य और कला इतिहास के सबसे पीड़ित तबके के साथ खड़े होते हैं, तो वे केवल रचना नहीं, बल्कि भविष्य के निर्माण की नींव रखते हैं। तिलका मांझी का संघर्ष आज भी इन कृतियों के माध्यम से हमारे बीच जीवंत है।

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इतिहासकारों ने भले ही तिलका को भुला दिया, लेकिन बिहार और बंगाल के नुक्कड़ नाटकों ने उन्हें घर-घर पहुँचाया।

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ध्यान से समझिए, यह ख़ास फ़र्क…तिलका मांझी vs भगत सिंह

Before Mangal Pandey, there was Tilka Manjhi — the forest warrior who answered British tax terror with rebellion, not surrender. | Photo: Deshaj Times
Before Mangal Pandey, there was Tilka Manjhi — the forest warrior who answered British tax terror with rebellion, not surrender. | Photo: Deshaj Times
विशेषतातिलका मांझी (1785)भगत सिंह (1928-31)
हथियारताड़ के पेड़ से ‘जहरीला तीर’असेंबली में ‘इंकलाबी बम’
प्रहार5000 मवेशी छीनकर खजाना खाली कियाब्रिटिश साख (Prestige) पर चोट की
अंतिम समयघोड़ों से घसीटा गया, फिर बरगद पर फांसीहंसते हुए फंदे को चूमा
विडंबनाआज भी सिलेबस से ‘लापता’क्रांति के वैश्विक प्रतीक

देशज टाइम्स की चार्जशीट: TMBU जवाब दो!

Before Mangal Pandey, there was Tilka Manjhi — the forest warrior who answered British tax terror with rebellion, not surrender. | Photo: Deshaj Times
Before Mangal Pandey, there was Tilka Manjhi — the forest warrior who answered British tax terror with rebellion, not surrender. | Photo: Deshaj Times

“अगर अपनी मिट्टी और मवेशी बचाने वाला डकैत है, तो समूचे महाद्वीप को लूटने वाले अंग्रेज क्या थे? तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (TMBU) जवाब दे—तिलका को ‘लुटेरा’ बताने वाले उन ब्रिटिश इतिहासकारों की मानसिकता से आजादी कब मिलेगी?”

मुल्जिम नं 1: वे ब्रिटिश इतिहासकार जिन्होंने क्रांति को ‘अपराध’ लिखा।

मुल्जिम नं 2: TMBU प्रशासन—जो 1991 से नाम तो बाबा का इस्तेमाल कर रहा है, पर उनकी अस्मिता की रक्षा नहीं कर सका।

मुल्जिम नं 3: वो सिस्टम—जो क्लीवलैंड की कब्र को ‘हेरिटेज’ मानता है, पर तिलका की शहादत स्थली को भूल जाता है।

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“तिलका मांझी अध्याय” तुरंत सिलेबस में जोड़ो, वरना डिग्री पर से उनका नाम हटाओ! क्योंकि जिस शिक्षा में अपने पुरखों का सम्मान न हो, वह शिक्षा नहीं, मानसिक गुलामी का प्रमाण पत्र है।

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