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Bhagwat Katha: दरभंगा में आचार्य वेदानन्द शास्त्री ने बताया महारास का गूढ़ रहस्य, जीवन के हर ह्रास का होता है अंत

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Bhagwat Katha: दरभंगा बेनीपुर के नवादा गांव में इन दिनों भक्ति की बयार बह रही है, जहां श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन हो रहा है। छठे दिन आचार्य वेदानन्द शास्त्री ने ‘महारास’ की महिमा का ऐसा गुणगान किया कि श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए। उन्होंने बताया कि यह सिर्फ एक प्रसंग नहीं, बल्कि दुनियावी बंधनों से मुक्ति का सबसे बड़ा मार्ग है।

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श्रीमद् Bhagwat Katha में महारास का महत्व

बेनीपुर क्षेत्र के नवादा गांव में चल रहे श्रीमद् Bhagwat Katha के छठें दिन आचार्य वेदानन्द शास्त्री जी ने श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि महारास का अर्थ है दुनिया के सभी बंधनों से स्वयं को मुक्त करना। यह ऐसा शस्त्र है जो मनुष्य के जीवन के ह्रास, यानी कमजोरियों को खत्म कर देता है और जीव को स्वच्छंद व मुक्त बनाता है। आचार्य वेदानन्द शास्त्री जी ने विस्तार से समझाया कि प्रत्येक मनुष्य को रास प्रसंग में अवश्य भाग लेना चाहिए।

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मानव जीवन की सार्थकता और सत्संग

आदि गुरु शंकराचार्य के वचनों का उल्लेख करते हुए कथा में बताया गया कि सर्वप्रथम मनुष्य बनना ही दुर्लभ है। और एक बार मनुष्य योनि प्राप्त हो जाने पर यदि सत्संग मिल जाए, तो फिर जीवन में कोई कमी नहीं रहती। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि किसी मनुष्य को वास्तविक मानव बनना है, तो उसे सत्संग की शरण में आना ही पड़ेगा। भक्तजन अपने मन से यही कहते हैं कि जीवन के उथल-पुथल से दूर, सत्संग वाली नगरी चलो, जहां शांति और आनंद की प्राप्ति होगी, अन्यथा मनुष्य हाथ मलते रह जाएगा।

श्रीकृष्ण की अद्भुत लीलाएं और उनका प्रभाव

कथा के दौरान आचार्य ने भगवान श्रीकृष्ण की अद्भुत लीलाओं का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि कैसे श्रीकृष्ण ने नंदबाबा की जान एक अजगर से बचाई। फिर ब्रज से चलकर मथुरा पहुंचे। श्रीकृष्ण के मथुरा जाने से ब्रजवासी, ब्रजगोप और सभी ब्रज के लोग अत्यधिक व्याकुल हो गए, उन्हें लगा जैसे उनके प्राण ही जा रहे हों। ऐसी व्याकुलता इसलिए आई क्योंकि प्रभु ही उनके प्राण थे। इस जीवन की सार्थकता तभी है जब ईश्वर का सानिध्य प्राप्त हो। मथुरा पहुंचकर श्रीकृष्ण ने धोबी आदि जीवों पर कृपा की और फिर कंस का वध कर उसका उद्धार किया। विद्या अध्ययन के बाद उन्होंने उद्धव की ब्रज यात्रा का वृत्तांत सुनाया। इसके उपरांत सत्रह बार जरासंध को पराजित किया और अठारहवीं बार रणछोड़कर भागे, जिससे वे रणछोड़ कहलाए। कथा के अंतिम भाग में रुक्मिणी-कृष्ण विवाहोत्सव की महत्ता बताई गई, जो साक्षात लक्ष्मी नारायण के मिलन का प्रतीक है। इस दौरान कलाकारों द्वारा भजन गायन भी किया गया, जिससे वातावरण और भी भक्तिमय हो गया। आगत अतिथियों के स्वागत में राम कुमार झा स्वयं सक्रिय रूप से जुटे थे।

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