
मुख्य बातें
रेडिएंस क्लासेस के डायरेक्टर कैप्टन एके झा की महत्वपूर्ण टिप्स
– अपनी पढ़ने की आदत को थमने ना दे आज के युवा
– परीक्षा के बाद जारी रखें लगातार पढ़ने की आदत को
– कैरियर के चूनाव को दें अपना खाली समय
संजय कुमार राय, दरभंगा देशज टाइम्स। दसवीं और बारहवीं की परीक्षा छात्र जीवन का एक अहम पड़ाव है। यहां से कैरियर की दशा और दिशा तय होती है। यही कारण है कि बोर्ड की परीक्षाओं को लेकर छात्रों में डर देखने को मिलता है। लेकिन, डर का असली कारण आत्मविश्वास में कमी होना होता है। अच्छे और मेधावी छात्र भी अपनी क्षमता को पहचानने में भूल कर देते (Director of Darbhanga Radiance Classes Capt. AK Jha said) हैं।
यह बातें दरभंगा रेडिएंस क्लासेस के डायरेक्टर कैप्टन एके झा (Director of Darbhanga Radiance Classes Capt. AK Jha) ने कही। कहा कि अभी-अभी बिहार बार्ड के बच्चों की बारहवीं की परीक्षा समाप्त हुई है। और, दसवीं के छात्रों की परीक्षा चल रही है। जो कि कुछ हीं दिनों में समाप्त होने को है। ऐसे में, बच्चों को एक पड़ाव पूरा करने का सुखद अनुभव तो होता हीं है, लेकिन आगे के जीवन को लेकर इधेड़बुन भी शुरू हो जाती है।
ज्यादा सोचनें और ज्यादा से ज्यादा सूचनाओं को इकठ्ठा करने के चक्कर में बच्चे खुद को पढ़ाई से दूर कर लेते हैं, जो कि आज के छात्रों की सबसे बड़ी गलती होती है। इसकी वजह से वो ना केवल पढ़ाई से दूर होते हैं, बल्कि सूचनाओं की तलाश में अनावश्यक रूप से वो मोबाईल और इंटरनेट का इस्तेमाल शुरू कर देते हैं।
फिर इससे जूडी जिज्ञासाओं को वह अपने दोस्तों के साथ शेयर करना शुरी कर देते हैं। नतीजा यह होता है कि पढ़ाई के बारे में अब सोचना एक कठिन काम बन जाता है। इसकी वजह से आगे पढ़ने को लेकर वह गतल निर्णय लेना शुरू करते हैं।
दरभंगा रेडिएंस क्लासेस के डायरेक्टर कैप्टन एके झा (Director of Darbhanga Radiance Classes Capt. AK Jha) ने कहा कि बच्चों को लगता है कि ऐसा ही आजाद जीवन आगे भी चलता रहे। ऐसे में, घर उन्हें पाबंदी की तरह लगने तगता है। इन पाबंदियों से बचने के लिए बच्चे अपने बेहतर पढ़ाई के लिए बाहर जाने को सबसे बेहतर बिकल्प बनाकर अपने अभिभावक को दिखाते है।
परिवार में यह सब एक ऐसा दौर लेकर आते हैं। इसमें पढ़ाई से ज्यादा इन बातों की चर्चा शुरू हो जाती है कि और कौन कौन कहां जा रहा है। फिर बच्चे की पढ़ाई परिवार के प्रतिष्ठा और सामाजिक रूतबे का विषय बन जाता है। अब परिवार इसलिए बच्चे को बाहर भेजता है क्योंकि बाहर नहीं भेजने में यह परिवार का नुकसान जैसा मालूम पड़ने लगता है।
लेकिन, इसका खामियाजा परिवार बहुत बाद में पाता है। जब अगर बच्चा कुछ बड़ा हासिल नहीं कर सका तो वह चाहकर भी उसे वापस घर नहीं बुला सकते। क्योंकि, यह हार स्वीकार करने जैसी बात बन जाएगी। और ऐसी परिस्थितियों में संपन्न परिवार तो खुद को संभाल लेते हैं. लेकिन बेचारे एक-एक पाई जोड़कर बच्चों पर भरोषा करने वाले परिवार बुरे दौर में चले जाते है।
इतनी जद्दोजहद के बाद हासिल कुछ नहीं होता। अगर शुरूआत में पढ़ाई की आदत को रूकने ना दिया जाए तो ना सिर्फ एक छात्र का भविष्य सवंरता है, बल्कि एक परिवार को बलिदान देने की दरूरत नहीं पड़ती। हमारे आसपास ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जाएंगे। और यहीं कारण है कि मेडिकल व अंजिनियरिंग की तैयारी के लिए कोटा गये ज्यादातर छात्रों का सेलेक्शन नहीं होता। अब तो कोटा से आत्महत्या तक की खबरें भी आने लग गयी है।
यह बातें रेडिएंस क्लासेज के डायरेक्टर कैप्टन ए के झा ने कही। कहा कि वह रेडिएंस क्लासेज की स्थापना से जुड़े अपने विजन को बता रहे थे। उन्होंने कहा कि अगर व्यवसाय करने की इच्छा होती तो कोटा में खोल सकते थे संस्थान।मिथिलांचल से लगाव ने बुलाया दरभंगा।






