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मार्च, 5, 2026
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Darbhanga News: जाले में FMD vaccine का महाभियान, हजारों पशुओं को खुरहा-मुंहपक्का से बचाने की कवायद तेज

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FMD vaccine: पशुओं के लिए संजीवनी बूटी साबित हो रहा खुरहा-मुंहपक्का का टीका, जाले में विशेष अभियान से पशुपालकों में जगी उम्मीद की किरण।

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Jale FMD vaccine News: जाले प्रखंड क्षेत्र की विभिन्न पंचायतों में पशुधन को जानलेवा खुरहा-मुंहपक्का (एफएमडी) रोग से बचाने के लिए स्वास्थ्य विभाग की ओर से एक बड़ा टीकाकरण अभियान चलाया जा रहा है। प्रखंड पशु चिकित्सक डॉ. शिवेन्द्र कुमार ने जानकारी देते हुए बताया कि जिला से मिले दिशा-निर्देशों के अनुसार, यह अभियान 19 फरवरी से ही शुरू कर दिया गया है, जिसका लक्ष्य हर पशु को सुरक्षित करना है।

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क्या है FMD vaccine अभियान का पूरा प्लान?

प्रथम चरण में इस अभियान को प्रखंड की एक दर्जन से अधिक पंचायतों में लागू किया गया है। इनमें कमतौल, राढ़ी उत्तरी, कछुआ, जाले, जोगियारा, सहसपुर, रेवढ़ा, दोघरा, मुरैठा, कतरौल-बसंत, रतनपुर और ब्रह्मपुर पंचायतें शामिल हैं। इन क्षेत्रों में घर-घर जाकर पशुओं को टीका लगाने के लिए एक दर्जन निजी टीका कर्मियों की टीम को तैनात किया गया है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह टीम सुनिश्चित कर रही है कि कोई भी पशु इस सुरक्षा कवच से वंचित न रह जाए।

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डॉ. कुमार ने बताया कि सरकारी प्रावधान के अनुसार, जिन पशुओं के कान में पहले से इयर टैग लगे हुए हैं, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर टीका लगाया जा रहा है। इस पशु टीकाकरण अभियान को सफल बनाने के लिए पशुपालकों से भी सहयोग की अपील की गई है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

बिना इयर टैग वाले पशुओं को भी मिल रहा सुरक्षा कवच

अभियान के दौरान यह बात सामने आई है कि कई पंचायतों में बड़ी संख्या में ऐसे पशु भी हैं, जिनके कान में इयर टैग नहीं लगा है। इसे देखते हुए अधिकारियों ने निर्देश दिया है कि ऐसे पशुओं को भी रोग से बचाव के लिए टीका लगाया जाए, ताकि समुदाय में बीमारी फैलने का कोई खतरा न रहे। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। जिले की ओर से इस पूरे प्रखंड के लिए लगभग 40 हजार वैक्सीन की डोज उपलब्ध कराई गई हैं, जो अभियान के सफल संचालन के लिए पर्याप्त हैं।

टीकाकरण की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए एक ऑनलाइन सिस्टम भी लागू किया गया है। टीका लगने के बाद संबंधित पशुपालक के मोबाइल पर एक ओटीपी आता है, जिसे उन्हें टीकाकर्मी को बताना होता है। यदि किसी कारणवश ओटीपी नहीं आ पाता है, तो टीकाकर्मी पशु की फोटो खींचकर उसे ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड करते हैं। इस प्रक्रिया में थोड़ा अधिक समय जरूर लगता है, लेकिन इससे रिकॉर्ड बनाए रखने में मदद मिलती है।

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