Jale Farmer News: दरभंगा जिले के जाले प्रखंड में किसान इस उमस भरी गर्मी के बीच भी खरीफ फसल की तैयारी में पूरी लगन से जुटे हुए हैं। सुबह हुई हल्की बूंदाबांदी के बाद तेज धूप और बढ़ी हुई उमस से जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। लोग घरों से बाहर निकलने से परहेज कर रहे हैं, लेकिन किसान इस चुनौती भरे मौसम में भी अपने खेतों को धान की बुवाई के लिए तैयार करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। इस बार वे पारंपरिक तरीकों को अपनाते हुए बड़े पैमाने पर सड़े हुए गोबर खाद का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो मिट्टी की सेहत के लिए एक बेहतरीन उपाय माना जाता है।
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उमस भरी गर्मी में किसानों का अथक प्रयास
जाले क्षेत्र में पिछले कुछ दिनों से उमस और गर्मी का दौर जारी है, जिससे आम लोगों का हाल बेहाल है। सड़कों पर सन्नाटा पसरा है और बाजार भी देर से खुल रहे हैं। ऐसे में किसान ही हैं जो खेतों में पसीना बहा रहे हैं। उनका मुख्य लक्ष्य आने वाली खरीफ फसल, विशेषकर धान की खेती के लिए जमीन को तैयार करना है। यह उनकी आजीविका का सवाल है, जिसके लिए वे हर मुश्किल का सामना करने को तैयार हैं।
किसान अपने पशु शेड के आसपास जमा गोबर को बड़ी मेहनत से खेतों तक पहुंचा रहे हैं। यह एक श्रमसाध्य कार्य है, जिसमें काफी समय और ऊर्जा लगती है। इसके अलावा, कई किसान जिनके पास पर्याप्त पशुधन नहीं है, वे बाजार से गोबर खाद खरीद रहे हैं। स्थानीय स्तर पर एक ट्रेलर गोबर खाद की कीमत 800 से 900 रुपये तक है, जो किसानों के लिए एक अतिरिक्त खर्च है, लेकिन वे मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने के लिए यह निवेश करने को तैयार हैं।
रासायनिक खाद से परहेज, जैविक खेती की ओर झुकाव
कछुआ गांव के किसान सुधीर राय और रतनपुर के किसान देवेंद्र कुमार, राजा सहनी, कन्हैया झा और धर्मेंद्र कुमार ने बताया कि वे धान की खेती में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग लगभग बंद कर चुके हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि रासायनिक खाद के अत्यधिक प्रयोग से मिट्टी की प्राकृतिक संरचना और उर्वरा शक्ति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। वे केवल आवश्यकता पड़ने पर ही सीमित मात्रा में खरपतवारनाशक का प्रयोग करते हैं, ताकि अनावश्यक रसायनों से बचा जा सके।
इन किसानों का यह कदम जैविक खेती की ओर बढ़ते रुझान को दर्शाता है। उनका मुख्य ध्येय मिट्टी की जल धारण क्षमता और जैविक पदार्थों को बनाए रखना है, जिसके लिए सड़ा हुआ गोबर खाद सबसे प्रभावी माध्यम है। यह न केवल फसल की गुणवत्ता को बढ़ाता है, बल्कि पर्यावरण के लिए भी बेहतर है। यह Bihar Agriculture News के लिए एक सकारात्मक संकेत है, जहां किसान अब अधिक टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल खेती के तरीकों को अपना रहे हैं।
ढैंचा बीज की अनुपलब्धता से बढ़ी चिंता
इस वर्ष किसानों को एक बड़ी समस्या का सामना करना पड़ रहा है, जिससे उनकी चिंताएं बढ़ गई हैं। बाजार में ढैंचा बीज की अनुपलब्धता के कारण वे हरी खाद की खेती नहीं कर पा रहे हैं। ढैंचा एक महत्वपूर्ण फसल है जिसे खेत में उगाकर फिर मिट्टी में मिला दिया जाता है, जिससे मिट्टी को नाइट्रोजन और अन्य पोषक तत्व मिलते हैं। हरी खाद मिट्टी की सेहत के लिए अत्यंत लाभदायक होती है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करती है।
ढैंचा बीज न मिल पाने के कारण किसानों की गोबर खाद पर निर्भरता काफी बढ़ गई है। यह उनके लिए दोहरी चुनौती है, क्योंकि उन्हें अधिक गोबर का प्रबंध करना पड़ रहा है। किसानों ने बताया कि उनके पूर्वज भी खरीफ फसल से पहले खेतों की गहरी जुताई के बाद गोबर खाद डालते थे। यह एक सदियों पुरानी परंपरा है जो मिट्टी को स्वस्थ रखने में मदद करती है और अच्छी फसल का आधार बनती है। यह पारंपरिक ज्ञान आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
कृषि विभाग से किसानों की बड़ी मांग और भविष्य की राह
जाले के किसानों ने राज्य कृषि विभाग से रबी फसल के लिए रासायनिक उर्वरकों की पर्याप्त और समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करने की मांग की है। उनका कहना है कि खरीफ फसल में वे जैविक तरीकों को अपना रहे हैं, लेकिन रबी के लिए उन्हें कुछ हद तक रासायनिक उर्वरकों की भी आवश्यकता होती है। यदि समय पर खाद उपलब्ध नहीं होती है, तो उनकी फसलें प्रभावित हो सकती हैं, जिसका सीधा असर उनकी आय पर पड़ेगा।
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किसानों की यह मेहनत और पारंपरिक कृषि पद्धतियों को अपनाने की उनकी ललक सराहनीय है। यह दर्शाता है कि वे न केवल अपनी आजीविका के लिए बल्कि मिट्टी और पर्यावरण के स्वास्थ्य के प्रति भी सजग हैं। उम्मीद है कि कृषि विभाग उनकी मांगों पर ध्यान देगा और उन्हें आवश्यक सहायता प्रदान करेगा, जिससे जाले जैसे क्षेत्रों में कृषि और भी समृद्ध हो सके।
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