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दरभंगा के महाराजाधिराज Sir Dr. Kameshwar Singh की यश और कृति आज भी अमर, कल भी रहेगा जीवंत…116वीं जयंती पर संस्कृत विवि में दानवीर के बहाने आत्म चिंतन

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मुख्य बातें
महाराजा की आकांक्षाओं की पूर्ति ही सच्ची श्रद्धांजलि : कुलपति डॉ. शशिनाथ झा
विश्वविद्यालय हित मे आत्म चिंतन जरूरी : प्रतिकुलपति
कामेश्वर सिंह की 116वीं जयंती पर संस्कृत विश्वविद्यालय में कार्यक्रम

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दरभंगा, देशज टाइम्स। प्राच्य विद्या के संरक्षण व विकास के लिए विश्व में चर्चित दानवीर महाराजाधिराज सर डॉ. कामेश्वर सिंह की 116वी जयंती पर संस्कृत विश्वविद्यालय के दरबार हॉल में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए बुधवार को कुलपति डॉ. शशिनाथ झा ने कहा कि उनकी यश व कृति अमर है। जिस ऐतिहासिक भवन लक्ष्मेश्वर विलास पैलेस में महाराजा का जन्म हुआ, उपनयन हुआ उसे उन्होंने प्राच्य विद्या के लिए दान दे दिया। ऐसा विरले ही सुना गया है।

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वीसी ने कहा कि संस्कृत समेत अन्य प्राच्य विषय जीवित रहे और इससे समाज लाभान्वित होता रहे ऐसा महाराजा हमेशा सोचते रहते थे। उनकी दिली आकांक्षा थी कि मिथिला न्याय व दर्शन में अग्रणी भूमिका निभाता रहे।हमसभी को यह हमेशा याद रखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि चीन भारत युद्ध के समय महाराजा ने देश हित मे करीब 12 मन सोना दान में दिया था।

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वहीं विशिष्ट अतिथि पूर्व साहित्य विभागाध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीनाथ झा ने महाराजा के जीवन की संक्षिप्त चर्चा करते कहा कि उनका जन्म 28 नवम्बर 1907 को हुआ था।महज 55 साल की उम्र में ही 01 अक्टूबर 1962 को उनका निधन हो गया। 30 मार्च 1960 को उन्होंने विलास पैलेस समेत अन्य बहुमूल्य सामान व जमीन प्राच्य विषयों के लिए दान कर दिया।इसके बाद ही 26 जनवरी 1961 में संस्कृत विश्वविद्यालय अस्तित्व में आ सका। इसके अलावा उन्होंने बताया कि हिन्दू महासभा समेत कई संस्थाओं के वे अध्यक्ष रहे।विधान परिषद, राज्य सभा के भी वे सदस्य रहे थे।

 

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प्रोवीसी डॉ. सिद्धार्थ शंकर सिंह ने कहा कि आज हमें इस पर आत्म मंथन व चिंतन की जरुरत है की हमलोगों ने विश्वविद्यालय को क्या दिया। उन्होंने दक्षिण भारत के एक कार्यक्रम के ऑडियो को भी सुनाया जिसमें संस्कृत की संगीतमय प्रस्तुति की गई थी। इसके जरिये उन्होंने स्पष्ट किया कि संस्कृत विश्वविद्यालय को भी अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए जो नहीं हो पा रहा है। प्रोवीसी ने कहा कि विश्वविद्यालय से एकमात्र पञ्चाङ्ग का प्रकाशन हो रहा है, जिसे हम इस श्रेणी में रख सकते हैं।

 

यह जानकारी देते हुए पीआरओ निशिकांत ने बताया कि इस अवसर पर कुलसचिव डॉ सत्येंद्र नारायण सिंह ने कहा कि आज एक कट्ठा जमीन के लिए भाई भाई में खून खराबा हो जा रहा है लेकिन महाराजा ने अमूल्य धरोहर व सम्पत्ति खुशी से दान कर दिया।वे प्रातः स्मरणीय व पूजनीय हैं। उनकी भावनाओं को हमेशा सँजो कर रखने की जरुरत है।

 

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डॉ यदुवीर स्वरूप शास्त्री के मंच संचालन में आयोजित कार्यक्रम को डीएसडब्ल्यू डॉ सुरेश्वर झा,एफए कैलाश राम, बजट पदाधिकारी डॉ. पवन कुमार झा, रविन्द्र मिश्र, अमरनाथ शर्मा, अंकिता कुमारी समेत अन्य वक्ताओं ने सम्बोधित किया। इसके पूर्व महाराजा की प्रतिमा पर भी माल्यार्पण किया गया।पूजा व अर्चना ने कुलगीत प्रस्तुत किया। स्वागत भाषण डॉ. दयानाथ झा ने दिया।

 

वहीं प्रातः मधवेश्वर परिसर में महाराजा के समाधि स्थल पर पूजा व हवन भी किया गया। राष्ट्र गान के बाद कार्यक्रम की समाप्ति की गई। कार्यक्रम के अवसर पर सभी पदाधिकारी व कर्मी मौजूद थे।

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