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बनती, संभलती और फिर बिगड़ती विरासत दरभंगा को खूब भाता है…सच मानो तो Manoranjan Thakur के साथ

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च मानो तो, मनोरंजन ठाकुर के साथ। मैं यहां कोई नई बात आपसे नहीं कहने जा रहा। बस एक छुअन है। कुरेदती सांसें हैं। बहकता मन है। उद्धेलित करता तन है। थोड़ी चिंता है। कई फलसफा हैं। इससे होकर कई किस्से बाहर निकल रहे हैं। निकल सकते हैं। बस, थोड़ी पुरानी बातों, उसके अहसासों के पर्दे में थोड़ा वक्त गुजारने की गुजारिश भर आपसे है।

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दरभंगा में धरोहरें कितनी हैं, किस अवस्था में हैं। कैसा उसे रहना चाहिए, किस तरीके पड़ा है। यह सब बातें बड़ी लंबी बहस की ओर हमें ले जाएंगीं। मैं तो बस, एक छोटी सी याद में उस धरोहर को टटोलने की कोशिश भर कर रहा, जिसकी यादें गुलामी से आजादी तक की दास्तान संजोए हुए है। ब्रिटेन से इसके शरीर जुड़े हैं। आत्मा, दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह की भावनाओं में आकंठ है। मधुबनी का संपूर्ण समर्पण भी इसमें समाहित है। पूर्ण दरभंगा तो है ही।

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इसमें, लोहट शुगर मिल की यादें भी बाबस्त हैं तो, बिहार गन्ना उद्योग की इसमें मिठास भी है। छोटी लाइन, 253 नंबर, साउंड सिस्टम और लालटेन वाली लाइट इन अहसासों में बंधे हैं जहां, वास्तव में स्टीम इंजन चलने की छुक-छुकी दिलों को गुदगुदाने के लिए काफी है। एक तस्वीर दिखी। सहसा मन जाग उठा। लगा, हम फिर पीछे हो चले। हमारी आकांक्षा को बेड़ियों में कोई फिर से बांध रहा। कहीं, यह फिर से दरभंगा की मर्यादा पर एक कलंक तो कल होकर ना चस्पा कर देगा। कारण, खबर यही है, हमारी आशा, हमारा विश्वास, हमारी परंपरा, हमारी पहचान, बनती, संभलती और फिर बिगड़ती क्यों चली जाती है। क्या यही दरभंगा को खूब भाता है…सच मानो तो मनोरंजन ठाकुर (Manoranjan Thakur) के साथ

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याद कीजिए शनिवार, 25 अगस्त 2018 का वो स्वर्णिम दिन। दरभंगा जंक्शन के सर्कुलेशन एरिया में स्थापित हेरिटेज इंजन को रेल प्रशासन नया लुक देने में जुटा था। इस इंजन को मधुबनी जिले की लोहट चीनी मिल से 22 जुलाई को दरभंगा लाकर जर्जर हो चुके इसके बदन को दुरुस्त करने की कवायद हो रही थी। इसे इस तरह विभिन्न रंगों से यूं सजाया गया था, देखने वालों की नजरें ठहर जाती।

मौके पर मौजूद स्टेशन डायरेक्टर चंद्रशेखर प्रसाद ने कहा, रेल प्रशासन लोगों को स्टीम इंजन चलने का अहसास कराने की तैयारी में जुटा है। इंजन से पहले जिस तरह धुआं निकलता था। आर्म सिग्नल होता था, उस सब की व्यवस्था की जा रही है। इसके अलावाे उस समय के साउंड सिस्टम और लालटेन वाली लाइट की भी व्यवस्था की जा रही है। कुल मिलाकर ऐसी तैयारी की जा रही है, लोगों को लगे कि वास्तव में स्टीम इंजन चल रहा है।

आइए थोड़ा इंजन का इतिहास भी इसी बहाने टटोल लें
इस वाष्प इंजन (नंबर 235) का निर्माण वर्ष 1885 में इंग्लैंड में शुरू हुआ था। वर्ष1914 में पहली बार इस इंजन को बोगियों में जोड़कर दरभंगा से सवारी गाड़ी के रूप में चलाया गया। बाद में इसे लोहट चीनी मिल में पार्ट टाइम में चलायाबनती, संभलती और फिर बिगड़ती विरासत दरभंगा को खूब भाता है...सच मानो तो Manoranjan Thakur के साथ जाने लगा। वर्ष 1975 में इस इंजन को पूर्ण रूप से लोहट चीनी मिल को दे दिया गया। चीनी मिल में 16 मार्च, 1996 तक इस इंजन की सेवा ली गई। लेकिन, मिल में उत्पादन बंद होने के बाद यह इंजन भी हमेशा के लिए ठंडा हो गया।

मगर, कहा यह गया, सोचा यह जा रहा है, बताया यह जा रहा है, प्रचारित यही है, यह इंजन मिथिला की धरोहर है। इसे लोहट चीनी मिल प्रबंधन के सहयोग से यहां लाया गया है। इसे संरक्षित करने का हर संभव प्रयास किया जाएगा।बनती, संभलती और फिर बिगड़ती विरासत दरभंगा को खूब भाता है...सच मानो तो Manoranjan Thakur के साथ

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ब्रिटिश काल में दरभंगा महाराज के कारखाने में बनाए जाने वाले नील से लेकर चीनी को देश के कोने-कोने में पहुंचाने के साथ ही गुलामी से आजादी तक की दास्तान संजोए 105 साल से अधिक पुराने वाष्प इंजन को बिहार में पूर्व मध्य रेलवे के दरभंगा स्टेशन परिसर में प्रतीक के रूप में स्थापित किया गया था।

ब्रिटेन में 21 मार्च 1913 में निर्मित इस वाष्प इंजन को तत्कालीन दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह ने अपने निजी कार्यों के लिए मंगाया था, जो मधुबनी के लोहट गांव वाले लोहट चीनी मिल से लाकर दरभंगा स्टेशन परिसर में धरोहर के रूप में स्थापित किया गया। छोटी लाइन पर चलने वाला इंजन लोहाट शुगर मिल पर जीर्ण-शीर्ण स्थिति में पड़ा हुआ था। इसका स्वामित्व बिहार गन्ना उद्योग विभाग के पास था। 253 नंबर वाले इस इंजन को दरभंगा स्टेशन परिसर में लाकर लगा था, मानो एक इतिहास फिर से जिंदा होकर साक्षात सामने है।

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फिर बड़े ताम-झाम से इसका शुभारंभ हुआ। लगा, हमनें एक जंग जीत ली है। मगर, आज हेरिटेज इंजन किस हाल में है। वहां कैसी व्यवस्था है। जो सपने देखे गए उसकी जमीनी हकीकत क्या है तो साफ हो जाएगा। फिलहाल यह हैरिटेज इंजन फिर उसी पुराने हाल पर पहुंच चुका है जहां से इसे लाया गया था।

रेल प्रबंधन की ओर से दरभंगा स्टेशन भवन के सामने घने झाड़ियों की ओट में कुछ-कुछ रेलवे इंजन जैसा दिख भर रहा है। ऐसे में सवाल कई हैं। लोग पूछ भी रहे, कहीं ये वही#हेरिटेज इंजन तो नहीं जो सौंदर्यीकरण के लिए लगाया गया था। जिसके इतिहास से दरभंगा का इतिहास एकबारगी स्वर्णिम हो चला था। जी हां, हकीकत आज यही है यहां अब बड़े पौधों की कटाई-छटाई भी रेलवे प्रशासन करवा दे तो बड़ी बात। कारण, इन पेड़-पौधों की ओट में ये हैरिटेज इंजन कहां छुप गया है पता नहीं। थोड़ी सफाई हो जाए ताकी इंजन को निहारा जा सके।

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