Bihar Politics: बिहार की राजनीति में जब भी चुनाव की चर्चा होती है तो सबसे पहले विधानसभा का जिक्र आता है। लेकिन इस बार असली सियासी हलचल विधान परिषद की आठ सीटों को लेकर है। वजह साफ है—ये सीटें आम चुनावी गणित से अलग हैं। यहां भीड़ नहीं, बल्कि शिक्षक और स्नातक जैसे जागरूक मतदाता फैसला करते हैं। इसलिए इस मुकाबले को सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों की संगठन क्षमता और शिक्षित वर्ग में उनकी पकड़ की परीक्षा माना जा रहा है।
हाल ही में विधान परिषद की 10 सीटों पर निर्विरोध चुनाव संपन्न हुआ था। उम्मीदवार जितने थे, सीटें भी उतनी ही थीं, इसलिए मुकाबले की नौबत नहीं आई। लेकिन अब जिन आठ सीटों पर चुनाव होना है, वहां तस्वीर पूरी तरह अलग है। यहां हर वोट की कीमत है और हर उम्मीदवार को व्यक्तिगत संपर्क, भरोसे और वर्षों की सक्रियता के दम पर मैदान जीतना होगा।
पटना से तिरहुत तक… कहां सबसे दिलचस्प लड़ाई?
सबसे ज्यादा नजरें पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र पर टिकी हैं। जदयू के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार एक बार फिर चुनावी अखाड़े में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। पिछली जीत उनके आत्मविश्वास को बढ़ाती है, लेकिन इस बार समीकरण बदल चुके हैं। पुराने प्रतिद्वंद्वी आजाद गांधी का भाजपा के साथ आना मुकाबले को नया मोड़ दे सकता है। वहीं स्थानीय असंतोष और संभावित बागी उम्मीदवार भी चुनाव को त्रिकोणीय बनाने की क्षमता रखते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पटना की यह सीट सिर्फ एक उम्मीदवार की जीत-हार नहीं तय करेगी, बल्कि इसका असर भाजपा और जदयू की राजनीतिक छवि पर भी दिखाई देगा।
उधर तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भी मुकाबला बेहद दिलचस्प बनने के संकेत हैं। करीब 1.35 लाख मतदाताओं वाले इस क्षेत्र में पिछला उपचुनाव जदयू के लिए झटका साबित हुआ था, जब निर्दलीय उम्मीदवार बंशीधर बृजवासी ने सत्ता पक्ष को शिकस्त दी थी। अब अभिषेक झा के सामने पार्टी की प्रतिष्ठा बचाने की चुनौती है, लेकिन राह आसान नहीं मानी जा रही।
Bihar Politics: शिक्षक सीटों पर भी बढ़ी सियासी गर्मी
शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में भी राजनीतिक दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंकनी शुरू कर दी है। पटना शिक्षक सीट पर नवल किशोर यादव लगातार शिक्षकों के बीच सक्रिय हैं, जबकि तिरहुत शिक्षक क्षेत्र से वामपंथी नेता संजय कुमार सिंह तीसरी बार मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। उनका दावा है कि शिक्षकों के मुद्दों पर लंबे संघर्ष का लाभ उन्हें मतदान में मिलेगा।
दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मदन मोहन झा फिर सक्रिय हो गए हैं। पिछली बार की जीत उनके लिए मजबूत आधार है, लेकिन इस बार मुकाबला और कठिन माना जा रहा है।
सारण शिक्षक सीट पर भी राजनीतिक हलचल तेज है। उपचुनाव विजेता आफाक अहमद अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे हैं। वहीं दिवंगत शिक्षक नेता केदार पांडे की विरासत और उनके पुत्र आनंद पुष्कर का जदयू से जुड़ना चुनावी समीकरणों को नया रंग दे रहा है।
सीमित वोटर, लेकिन रणनीति सबसे बड़ी
इन चुनावों की खास बात यह है कि यहां प्रचार से ज्यादा महत्व संगठन और नेटवर्क का होता है। चार स्नातक सीटों पर करीब 4.85 लाख मतदाता हैं, जबकि चार शिक्षक सीटों में लगभग 45 हजार वोटर ही हैं। ऐसे में उम्मीदवारों के लिए हर मतदाता तक व्यक्तिगत पहुंच बनाना सबसे बड़ी चुनौती होती है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यहां जीत उसी की होती है, जो अपने समर्थकों को सिर्फ वोटर नहीं बल्कि मतदान के दिन बूथ तक पहुंचने वाला सक्रिय कार्यकर्ता बना सके।
एनडीए बनाम महागठबंधन… किसकी होगी बढ़त?
75 सदस्यीय विधान परिषद में फिलहाल एनडीए मजबूत स्थिति में है। भाजपा और जदयू के पास स्पष्ट बढ़त है, जबकि राजद, कांग्रेस और वाम दलों का महागठबंधन अपना दायरा बढ़ाने की कोशिश में है। हाल के उपचुनावों में विपक्ष के बेहतर प्रदर्शन और भोजपुर-बक्सर स्थानीय निकाय सीट पर जदयू को मिले झटके ने मुकाबले को और रोचक बना दिया है।
एनडीए सभी आठ सीटों पर जीत का दावा कर रहा है। दूसरी तरफ महागठबंधन का कहना है कि शिक्षकों और स्नातकों के बीच सरकार को लेकर असंतोष है और उसका लाभ विपक्ष को मिलेगा।
नवंबर तक इन्हीं आठ सीटों पर टिकी रहेंगी निगाहें
यह चुनाव केवल विधान परिषद में आठ नए सदस्यों को भेजने का माध्यम नहीं है। इससे यह भी तय होगा कि बिहार के शिक्षित वर्ग और शिक्षक समुदाय में किस गठबंधन की स्वीकार्यता ज्यादा है और किसका संगठन जमीनी स्तर पर अधिक मजबूत है।
यही वजह है कि विधानसभा चुनाव से पहले होने वाला यह छोटा चुनाव भी बिहार की बड़ी राजनीतिक तस्वीर तय करने वाला संकेतक माना जा रहा है। आने वाले महीनों में इन आठ सीटों पर होने वाली हर हलचल सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुकी है।







