
मराठी भाषा अनिवार्यता: महाराष्ट्र सरकार के एक फैसले ने उत्तर प्रदेश और बिहार की सियासत में भूचाल ला दिया है। ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी बोलने, पढ़ने और लिखने की अनिवार्यता लागू करने का कदम अब भले ही 100 दिनों के लिए टाल दिया गया हो, लेकिन इस पर राजनीतिक घमासान जारी है। यह फैसला सिर्फ भाषा से जुड़ा नहीं, बल्कि लाखों प्रवासी मजदूरों की आजीविका और क्षेत्रीय पहचान की लड़ाई भी है।
महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के 1 मई से ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी बोलने, पढ़ने और लिखने को अनिवार्य करने के बयान के बाद से ही विवाद गरमा गया है। यूपी और बिहार के सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ने ही इस कदम की कड़ी आलोचना की है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1। भाजपा नेता गुरु प्रकाश पासवान ने कहा कि क्षेत्रीय पहचान का सम्मान आवश्यक है, लेकिन देश के हर नागरिक को कहीं भी समान अवसर मिलने चाहिए।
वहीं, बिहार की सहयोगी जेडीयू के प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने सुझाव दिया कि जो गैर-मराठी लोग वर्षों से महाराष्ट्र में रह रहे हैं, उन्हें भाषा सीखने के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए। निषाद पार्टी के संजय निषाद ने इसे सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने वाला बताया और कहा कि प्रतिबंध लगाने के बजाय सरकार को प्रशिक्षण की व्यवस्था करनी चाहिए।
सियासी प्रतिक्रियाएं और आरोप-प्रत्यारोप
आरजेडी के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज झा ने इस फैसले को ‘अजीबोगरीब तानाशाही आदेश’ करार देते हुए कहा कि भाषाएं आपस में नहीं लड़तीं, बल्कि उन पर राजनीति करने वाले लोग लड़ते हैं। यूपी विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और समाजवादी पार्टी नेता माता प्रसाद पांडेय ने चेतावनी दी कि उनके क्षेत्र इटवा के करीब एक लाख लोग महाराष्ट्र में काम करते हैं और कमजोर वर्ग पर भाषा थोपना उन्हें आर्थिक रूप से तोड़ देगा। कांग्रेस ने इस कदम को संघीय ढांचे और मौलिक अधिकारों के खिलाफ बताया है, उनका तर्क है कि ऐसे आदेश क्षेत्रीय भावनाओं को भड़काते हैं।
नया नियम और प्रवासी मजदूरों पर असर
महाराष्ट्र सरकार ने पहले घोषणा की थी कि जो चालक मराठी नहीं जान पाएंगे, उनका लाइसेंस रद्द किया जा सकता है। लेकिन यूनियनों के विरोध के बाद सरकार ने इसे काम के लिए जरूरी मराठी तक सीमित करने और 100 दिनों की मोहलत देने का निर्णय लिया है। सरकार का तर्क है कि यह स्थानीय यात्रियों की सुविधा के लिए है। हालांकि, इस मराठी भाषा अनिवार्यता का सबसे बड़ा असर प्रवासी मजदूर पर होगा।
आर्थिक सर्वेक्षण (2016-17) के अनुसार, भारत के कुल वर्कफोर्स का 37 प्रतिशत हिस्सा अकेले यूपी और बिहार से आता है। मुंबई और महाराष्ट्र के अन्य शहरों में ऑटो-टैक्सी चलाने वाले श्रमिकों का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं दो राज्यों से है। भाषा की अनिवार्यता सीधे तौर पर इन प्रवासी मजदूरों की आजीविका को प्रभावित करती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1। महाराष्ट्र में ‘भूमिपुत्र’ और मराठी भाषा का मुद्दा दशकों पुराना है। शिव सेना और मनसे (MNS) जैसी पार्टियां अक्सर प्रवासियों के खिलाफ भाषाई पहचान को चुनावी मुद्दा बनाती रही हैं। परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक का यह फैसला उसी राजनीतिक विचारधारा का विस्तार माना जा रहा है।
संविधान क्या कहता है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(g) देश के किसी भी नागरिक को भारत के किसी भी हिस्से में व्यापार या पेशा करने का अधिकार देता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि भाषा के आधार पर काम करने से रोकना इन मौलिक अधिकारों को चुनौती दे सकता है। मराठी भाषा अनिवार्यता के खिलाफ कानूनी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। कुल मिलाकर, महाराष्ट्र में मराठी भाषा अनिवार्यता का मुद्दा सिर्फ एक क्षेत्रीय नियम नहीं, बल्कि एक जटिल सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक बहस का विषय बन गया है, जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।







