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Nitish Archive: 20 साल पुराना वह इंटरव्यू, जिसमें पत्नी मंजू और बेटे निशांत ने बताई थी सादगी भरी जिंदगी की कहानी… आपने पढ़ा क्या?

मुख्यमंत्री बनते ही नीतीश कुमार के परिवार का वह चौंकाने वाला इंटरव्यू, जिसने सत्ता के बजाय सादगी को चुना। पत्नी मंजू सिन्हा और बेटे निशांत कुमार ने कहा था कि उन्हें साधारण जीवन ही पसंद है, जिसने बिहार की राजनीति में एक अनोखा उदाहरण पेश किया।

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Nitish Archive: साल 2005 में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही बिहार में एक नए युग की शुरुआत हुई थी। उस ऐतिहासिक दिन एक अख़बार में छपे उनके परिवार के एक इंटरव्यू ने सबको हैरान कर दिया था। यह बातचीत दिखाती है कि कैसे सत्ता के शिखर पर पहुंचने के बावजूद, उनका परिवार सादगी को ही अपनाता रहा।

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बिहार की राजनीति में वर्ष 2005 सिर्फ सत्ता परिवर्तन का साल नहीं था, बल्कि एक ऐसे दौर की शुरुआत थी जिसने राज्य की दिशा को लेकर नई उम्मीदें जगाईं। नवंबर 2005 में जब गांधी मैदान में नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तब पूरा राजनीतिक विमर्श नई सरकार के इर्द-गिर्द घूम रहा था। लेकिन उसी दिन एक अखबार में प्रकाशित एक इंटरव्यू ने लोगों का ध्यान राजनीति से हटाकर उस परिवार की ओर खींच लिया, जो अचानक सत्ता के सबसे बड़े केंद्र से जुड़ गया था। यह इंटरव्यू नीतीश कुमार की पत्नी मंजू सिन्हा और पुत्र निशांत कुमार का था। शीर्षक था—”क्या छापिएगा, हमें साधारण ही रहने दीजिए”। यह शीर्षक अपने आप में उस परिवार के स्वभाव और सोच का परिचय देता था, जिसने राजनीति की चकाचौंध से हमेशा दूरी बनाए रखी।

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Nitish Archive: सत्ता का वैभव, सादगी का स्वभाव; यही है नीतीश परिवार

भारतीय राजनीति में अक्सर देखा जाता है कि जैसे ही कोई नेता सत्ता के शीर्ष पर पहुंचता है, उसका परिवार भी सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बन जाता है। मीडिया की सुर्खियां, राजनीतिक मंच और सामाजिक कार्यक्रम परिवार के सदस्यों को भी चर्चा में ले आते हैं। लेकिन नीतीश कुमार के परिवार की कहानी इससे बिल्कुल अलग रही। उस इंटरव्यू में झलकता है कि परिवार ने खुद को सत्ता के वैभव से अलग रखा। बातचीत के दौरान मंजू सिन्हा ने बार-बार यही संकेत दिया कि वे सामान्य जीवन को ही महत्व देती हैं। उन्हें प्रचार, तस्वीरें और राजनीतिक चर्चाओं का हिस्सा बनने में कोई विशेष रुचि नहीं थी। यही कारण था कि मुख्यमंत्री बनने जैसे बड़े अवसर पर भी परिवार की प्राथमिकता चर्चा का विषय बनना नहीं, बल्कि अपनी सादगी को बनाए रखना था।

मंजू सिन्हा और निशांत: सुर्खियों से दूर एक आम जिंदगी

मंजू सिन्हा का नाम बिहार की राजनीति में हमेशा एक रहस्य की तरह रहा। वे शायद ही कभी सार्वजनिक मंचों पर दिखाई दीं। राजनीतिक कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति अत्यंत सीमित रही और मीडिया को भी उनसे बातचीत के अवसर बहुत कम मिले। इसी वजह से 2005 का यह इंटरव्यू विशेष महत्व रखता है। इसमें एक ऐसी महिला की झलक मिलती है, जिसने अपने पति को राजनीति के लंबे संघर्ष से गुजरते देखा, लेकिन स्वयं राजनीतिक पहचान बनाने की कभी कोशिश नहीं की। बातचीत में उनके व्यक्तित्व का जो पक्ष उभरकर सामने आता है, वह सादगी, आत्मसंयम और निजी जीवन के प्रति सम्मान का है। वे यह स्पष्ट करती नजर आती हैं कि परिवार को सामान्य जीवन पसंद है और अनावश्यक प्रसिद्धि से दूर रहना ही बेहतर है।

इंटरव्यू का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष था निशांत कुमार की उपस्थिति। उस समय वे युवा थे और अचानक मुख्यमंत्री के बेटे के रूप में लोगों की नजरों में आ गए थे। लेकिन बातचीत में कहीं भी सत्ता का आकर्षण दिखाई नहीं देता। इसके बजाय एक ऐसे युवा की तस्वीर सामने आती है जो सामान्य जीवन, पढ़ाई और निजी दायरे को महत्व देता है। यही कारण है कि बाद के वर्षों में भी निशांत कुमार ने सक्रिय राजनीति से दूरी बनाए रखी और सार्वजनिक जीवन में उनकी मौजूदगी बेहद सीमित रही। 2005 के इस इंटरव्यू को आज पढ़ने पर महसूस होता है कि उस समय जो छवि सामने आई थी, वह आने वाले वर्षों में भी लगभग वैसी ही बनी रही।

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2005 का वह दुर्लभ इंटरव्यू: “क्या छापिएगा, हमें साधारण ही रहने दीजिए”

(सौजन्य: वरिष्ठ पत्रकार महेन्द्र झा | स्रोत: Nitish Archive)

टना के कंकड़बाग स्थित पीपुल्स कॉपरेटिव कॉलोनी के रजनी पथ पर स्थित जी-39 आवास में नवंबर 2005 का वह ऐतिहासिक दिन भी किसी आम दिन की तरह ही बीत रहा था। बिहार में नई सरकार के गठन और गांधी मैदान में मुख्यमंत्री पद के शपथ ग्रहण समारोह की गूंज पूरे राज्य में थी, लेकिन मुख्यमंत्री बनने जा रहे नीतीश कुमार के ससुराल में सादगी का वही पुराना माहौल कायम था।

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वरिष्ठ पत्रकार महेन्द्र झा द्वारा लिए गए इस दुर्लभ इंटरव्यू में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पत्नी मंजू कुमारी सिन्हा और पुत्र निशांत कुमार की सहजता और सादगी साफ झलकती है। जब उनसे बातचीत की गई तो मंजू सिन्हा का पहला जवाब था— “क्या छापिएगा, हम तो साधारण व्यक्ति हैं। हमें साधारण ही रहने दीजिए।”

उस समय मंजू सिन्हा यारपुर स्थित कमला नेहरू बालिका उच्च विद्यालय में शिक्षिका थीं। तीन भाइयों और दो बहनों में सबसे बड़ी मंजू ने स्पष्ट कहा कि उन्हें प्रचार-प्रसार से कोई लगाव नहीं है। मुख्यमंत्री की पत्नी बनने के बावजूद उनके व्यवहार में कहीं भी सत्ता का प्रदर्शन या विशेष उत्साह दिखाई नहीं देता।

इंटरव्यू में मौजूद नीतीश कुमार के इकलौते पुत्र निशांत कुमार, जो उस समय बीआईटी मेसरा (रांची) में कम्प्यूटर साइंस के तृतीय वर्ष के छात्र थे, ने भी बेहद सामान्य ढंग से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि परिवार को विश्वास था कि नीतीश कुमार सफल होंगे, लेकिन इतनी बड़ी जीत की उम्मीद नहीं थी।

पापा को दाल-भात और सब्जी सबसे ज्यादा पसंद है।

बातचीत के दौरान जब उनसे पूछा गया कि मुख्यमंत्री बनने के बाद भी नीतीश कुमार की पसंद क्या है, तो निशांत ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया— “पापा को दाल-भात और सब्जी सबसे ज्यादा पसंद है। कभी-कभार अंडा लेते हैं, लेकिन वे पूरी तरह सादा भोजन पसंद करते हैं।”

निशांत ने यह भी बताया कि उनके पिता देर रात तक काम करते हैं, सुबह योग और आसन करते हैं तथा दिन की शुरुआत अखबार पढ़कर करते हैं। राजनीति में उनकी कोई विशेष रुचि नहीं थी, लेकिन बिहार की स्थिति को लेकर वे चिंतित जरूर दिखाई दिए। उन्होंने विश्वास जताया था कि उनके पिता बिहार के लोगों के चेहरे पर फिर से खुशी लौटाने का प्रयास करेंगे।

यह इंटरव्यू सिर्फ एक राजनीतिक परिवार की बातचीत नहीं था, बल्कि उस सोच की झलक था जिसमें सत्ता से अधिक महत्व सादगी, निजी जीवन और सामान्य जीवनशैली को दिया गया। लगभग दो दशक बाद भी यह बातचीत इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि इसमें सत्ता के शिखर पर पहुंचने वाले एक परिवार की विनम्रता और आत्मसंयम दर्ज है।

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आज जब राजनीति में परिवारों की सार्वजनिक मौजूदगी और प्रचार आम बात हो चुकी है, तब 2005 का यह इंटरव्यू एक अलग मिसाल पेश करता है। शायद यही वजह है कि उस दिन कही गई एक पंक्ति आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है—

“क्या छापिएगा, हमें साधारण ही रहने दीजिए।”

(सौजन्य: महेन्द्र झा | स्रोत एवं अभिलेख: Nitish Archive)

इतिहास के पन्नों में दर्ज यह दुर्लभ बातचीत

उस दौर में बिहार की राजनीति उथल-पुथल से भरी हुई थी। चुनाव, गठबंधन, सरकार गठन और राजनीतिक समीकरण लगातार बदल रहे थे। लेकिन इस इंटरव्यू ने उस राजनीतिक शोर के बीच एक ऐसे घर की तस्वीर दिखाई, जहां चर्चा सत्ता से ज्यादा परिवार, दिनचर्या और साधारण जीवन की थी। रिपोर्ट में परिवार के रहन-सहन, खानपान और जीवनशैली की झलक मिलती है। यह तस्वीर उस आम भारतीय मध्यमवर्गीय परिवार से बहुत अलग नहीं लगती, जो अपने काम, रिश्तों और जिम्मेदारियों में व्यस्त रहता है।

आज, जब राजनीति में निजी जीवन और सार्वजनिक छवि के बीच की दूरी लगातार कम होती जा रही है, तब 2005 का यह इंटरव्यू एक अलग कहानी सुनाता है। यह कहानी है सादगी की, निजीपन की और उस सोच की जिसमें प्रसिद्धि से अधिक महत्व सामान्य जीवन को दिया गया। मुख्यमंत्री पद की शपथ वाले दिन प्रकाशित यह बातचीत केवल एक इंटरव्यू नहीं थी, बल्कि उस परिवार का परिचय थी जो बिहार की सबसे बड़ी राजनीतिक कुर्सी से जुड़ा होने के बावजूद खुद को आम लोगों जैसा ही देखना चाहता था।

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भारतीय राजनीति में ऐसे उदाहरण कम मिलते हैं जहां किसी बड़े नेता का परिवार लगातार सार्वजनिक जीवन से दूरी बनाए रखे। नीतीश कुमार के परिवार को लेकर हमेशा यही बात कही जाती रही कि उन्होंने राजनीतिक प्रभाव का प्रदर्शन करने के बजाय निजी जीवन को प्राथमिकता दी। 2005 का यह इंटरव्यू उसी धारणा को मजबूत करता है। इसमें न सत्ता का उत्साह दिखाई देता है, न राजनीतिक महत्वाकांक्षा का प्रदर्शन। और शायद इसी वजह से, लगभग दो दशक बाद भी यह शीर्षक लोगों के मन में गूंजता है— “क्या छापिएगा, हमें साधारण ही रहने दीजिए।”

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