दरभंगा, देशज टाइम्स। विश्वविद्यालय संगीत व नाट्य विभाग में सर्टिफिकेट कोर्स के तहत शनिवार को शास्त्रीय नृत्य कार्यशाला का आयोजन किया गया। इसमें बतौर वाह्य विशेषज्ञ शास्त्रीय नर्तकी विदुषी नीलम चौधरी की मौजूद थीं। नीलम पद्मविभूषण बिरजू महाराज की वरीय शिष्या हैं। आईसीसीआर की संबंद्ध कलाकार व अनेक पुरस्कारों से सम्मानित नीलम ने देश ही नहीं, विदेशों में भी कार्यक्रम प्रस्तुत किया है। कार्यक्रम में उड़ीसा से पधारे विद्वान ओडिसी नर्तक शचिकांत प्रधान विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे। कार्यशाला का आरंभ सभी आगत अतिथियों ने दीप प्रज्वलन से किया।
उसके बाद विभाग के छात्र-छात्राओं ने कुलगीत की प्रस्तुति से सबका मनमोह लिया। विभागाध्यक्षा प्रो.लावण्य कीर्ति सिंह काव्या ने आगत अतिथियों का परम्परागत ढंग से पाग, चादर व पुष्पगुच्छ देकर सम्मानित किया। धन्यवाद ज्ञापन पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. पुष्पम नारायण ने किया। कार्यशाला के प्रथम सत्र में नीलम चौधरी ने कहा कि ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय की ओर से शास्त्रीय नृत्य की शिक्षा आरम्भ किया जाना अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसके लिए उन्होंने साधुवाद किया।
उपस्थित छात्र – छात्राओं को नृत्योन्मुख बनाने के लिए अत्यन्त प्रेरणादायी सम्भाषण किया। विषय विशेषज्ञा ने अनेक उदाहरणों से बताया कि हमारा भारतीय संगीत व नृत्य किस प्रकार सर्वोपरि है। विशिष्ट अतिथि शचिकान्त प्रधान ने भी नृत्य के इस शिक्षण को लाभदायी बताते हुए निरन्तर ऐसे आयोजनों की भूरि-भूरि प्रशंसा की।आज की कार्यशाला में सबसे पहले कथक नृत्य में भूमि प्रणाम सिखाया गया। तत्पश्चात तत्कार व उत्पत्ति से छात्र छात्राओं को अवगत कराया गया। कथक के प्रशिक्षुओं के बीच रंजकता व रोचकता बनी रहे इसलिए कथक शैली में तराना नृत्य का प्रशिक्षण प्रारंभ किया गया। तराना नृत्य मुख्य रूप से मुगल काल में दरबारी नृत्य के रूप में प्रचलित हुआ। आज के तराना नृत्य की संरचना पंडित बिरजू महाराज की थी जो राग जनसम्मोहिनी व ताल तीनताल में निबद्ध था।
देशज टाइम्स के पाठकों के लिए एक जिज्ञासा : कल यानी दिनांक सात अप्रैल को प्रातः 10.30 बजे से कार्यशाला आरंभ होगा। आप सादर आमंत्रित हैं।








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