भारतीय सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन की मां और डॉ. हरिवंश राय बच्चन की पत्नी तेजी बच्चन का जीवन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था। 1941 की एक शाम, लाहौर में इलाहाबाद के एक युवा कवि हरिवंश राय बच्चन अपनी कविता “क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी…” का पाठ कर रहे थे और तभी श्रोताओं में बैठी एक खूबसूरत महिला की आंखों से आंसू छलक उठे। वह महिला कोई और नहीं बल्कि तेजी सूरी थीं, जिनके प्रेम और व्यक्तित्व ने भारतीय इतिहास के एक स्वर्णिम अध्याय की नींव रखी।
Teji Bachchan: कौन थीं अमिताभ बच्चन की मां तेजी बच्चन? जानें उनका अद्भुत जीवन!
Teji Bachchan का प्रेरक व्यक्तित्व: एक सशक्त महिला की कहानी
21 दिसंबर 2007 को जब 93 वर्ष की आयु में तेजी सूरी ने अंतिम सांस ली, तो भारतीय समाज ने एक ऐसी महिला को खो दिया जिसने न केवल एक परिवार को ‘संस्कार’ दिए, बल्कि आधुनिक भारत की सामाजिक चेतना को भी आकार दिया। उनकी अनुपस्थिति ने एक युग का अंत कर दिया, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवंत है।






डॉ. हरिवंश राय बच्चन ने अपनी पहली पत्नी श्यामा की असामयिक मृत्यु के बाद तेजी सूरी से विवाह किया था। यह केवल दो आत्माओं का मिलन नहीं था, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक इतिहास के उस अध्याय का आरंभ था, जिसने आगे चलकर देश को सबसे बड़ा ‘महानायक’ दिया, जिसे आज पूरी दुनिया बॉलीवुड का ‘बिग बी’ कहती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
तेजी बच्चन को अक्सर डॉ. बच्चन की पत्नी या अमिताभ बच्चन की मां के रूप में याद किया जाता है, लेकिन यह परिचय उनके विराट व्यक्तित्व के आगे अधूरा है। वह केवल एक गृहिणी नहीं थीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक, एक प्रखर अभिनेत्री, एक कुशल रणनीतिकार और स्वतंत्र भारत की सत्ता के गलियारों में एक मजबूत, मुखर आवाज थीं। उनका जीवन वास्तव में एक प्रेरक व्यक्तित्व का प्रतीक था।
जन्मभूमि से कर्मभूमि तक: तेजी बच्चन का सफर
12 अगस्त 1914 को तत्कालीन लायलपुर (जो अब पाकिस्तान में है) में जन्मीं तेजी सूरी एक कुलीन पंजाबी सिख परिवार से ताल्लुक रखती थीं। उनके पिता, खजान सिंह सूरी, उस दौर के एक जाने-माने बैरिस्टर थे। उस समय जब महिलाओं की शिक्षा को घर की चारदीवारी तक ही सीमित रखा जाता था, तेजी ने मनोविज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त की और लाहौर के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में अध्यापिका के रूप में पढ़ाना शुरू किया।
उनका व्यक्तित्व जितना बौद्धिक था, उतना ही कलात्मक और विद्रोही भी। यही कारण था कि जब उन्होंने एक कायस्थ कवि हरिवंश राय से विवाह करने का फैसला किया, तो यह उस रूढ़िवादी दौर के समाज के लिए एक क्रांतिकारी कदम था। विवाह के बाद तेजी और हरिवंश राय ने एक ऐसा साहसिक निर्णय लिया जो आज भी मिसाल है। उन्होंने अपने पूर्वजों के जातिसूचक उपनाम ‘श्रीवास्तव’ को त्याग दिया और डॉ. बच्चन के साहित्यिक उपनाम ‘बच्चन’ को ही अपने नाम के साथ जोड़ा। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। तेजी बच्चन का दृढ़ विश्वास था कि इंसान की पहचान उसके कर्मों से होनी चाहिए, उसकी जाति से नहीं। उनके दोनों बेटे, अमिताभ और अजिताभ, इसी वैचारिक स्वतंत्रता और प्रगतिशील सोच के साये में पले-बढ़े।
जब बच्चन परिवार दिल्ली आया, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के परिवार के साथ उनके संबंध बेहद निजी और गहरे हो गए। विशेष रूप से इंदिरा गांधी और तेजी बच्चन के बीच एक सहेली जैसा रिश्ता था, जिसमें राजनीतिक समीकरणों से ज्यादा आत्मीयता का भाव प्रबल था। यह रिश्ता इतना मजबूत था कि जब सोनिया गांधी पहली बार भारत आईं, तो हवाई अड्डे पर उनका स्वागत करने वाली तेजी बच्चन ही थीं। सोनिया गांधी के लिए तेजी एक ‘गॉडमदर’ के समान थीं। विवाह से पहले सोनिया गांधी कई दिनों तक बच्चन परिवार के दिल्ली आवास ’13 विलिंगडन क्रिसेंट’ में रुकी थीं, जहां तेजी ने उन्हें भारतीय रीति-रिवाजों और संस्कृति की गहराई से शिक्षा दी। मनोरंजन जगत की चटपटी खबरों के लिए यहां क्लिक करें। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
बहुमुखी प्रतिभा की धनी: अभिनेत्री से नीति-निर्माता तक
तेजी बच्चन के भीतर एक अद्भुत अभिनेत्री छिपी थी। जब डॉ. बच्चन ने शेक्सपियर के नाटकों का हिंदी अनुवाद किया, तो तेजी ने ‘लेडी मैकबेथ’ के किरदार को इतनी सजीवता से निभाया कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए। उनकी अभिनय क्षमता को देखकर उस दौर के दिग्गज थियेटर कलाकार भी दाँतों तले उंगली दबा लेते थे। बाद में, 1973 में, उन्होंने ‘फिल्म वित्त निगम’ (एफएफसी) के निदेशक के रूप में भारतीय सिनेमा की गुणवत्ता को सुधारने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आज अमिताभ बच्चन जो भी हैं, उनके पीछे उनकी मां तेजी बच्चन द्वारा दी गई अनुशासन की घुट्टी और मजबूत संस्कारों का हाथ है। अमिताभ अक्सर सार्वजनिक मंचों पर याद करते हैं कि उनकी मां संकट के समय किसी ‘कमांडर’ की तरह परिवार को एकजुट रखती थीं और हर चुनौती का सामना करने की प्रेरणा देती थीं। उनका जीवन संघर्ष, प्रेम और सशक्तिकरण की एक अद्भुत गाथा है।







