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Bihar Politics: बिहार कैबिनेट विस्तार… आपका क्या होगा जनाबे आली….! विभागों के बंटवारे पर फंसा पेंच, स्पीकर पद पर भी JDU की नजर? फिर आप कहां जाएंगे…?

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बिहार कैबिनेट विस्तार: नई सरकार के गठन के बाद से ही विभागों के बंटवारे को लेकर सस्पेंस बरकरार है। देरी की ये सुई अब सिर्फ मंत्रालयों तक ही नहीं, बल्कि मंत्रियों की संख्या और विधानसभा अध्यक्ष पद तक पहुंच गई है। क्या है पूरा मामला और JDU की नई मांगें क्या हैं, आइए जानते हैं।

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मंत्रालयों के बंटवारे और बिहार कैबिनेट विस्तार पर नहीं बनी बात

बिहार में नई सरकार के गठन के बावजूद मंत्रालयों का बंटवारा अब तक अंतिम रूप नहीं ले पाया है। इस देरी के चलते सियासी हलकों में नई चर्चाएं तेज हो गई हैं। वर्तमान में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के पास 29 विभाग हैं, जबकि जनता दल (यूनाइटेड) के हिस्से में 18 विभाग बताए जा रहे हैं। शुरुआत में यह विचार किया गया था कि दोनों प्रमुख दल पुराने विभागों की अदला-बदली कर सकते हैं, यानी जो विभाग पहले एक दल के पास थे, वे दूसरे को दिए जाएंगे। हालांकि, इस प्रस्ताव पर कोई सहमति नहीं बन पाई और यह आगे नहीं बढ़ सका। इसके बाद जदयू की ओर से अब नई और मजबूत मांगें सामने आने लगी हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1।

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बिहार की सियासत में इन दिनों गहमागहमी तेज है। भारतीय जनता पार्टी के लिए नई सरकार में मंत्रियों की लिस्ट फाइनल करना किसी टेढ़ी खीर से कम नहीं लग रहा। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पदभार सौंपने के बाद से ही कयास लगाए जा रहे थे कि यह काम इतना आसान नहीं होगा। अब इस लिस्ट को अंतिम रूप देने के लिए बीजेपी रणनीतिकार दिन-रात एक कर रहे हैं।

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मंत्रियों की संख्या और स्पीकर पद पर भी रार!

20 अप्रैल को पटना में हुई जदयू विधायक दल की बैठक में यह मुद्दा खुलकर उठा, जिसमें पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार भी मौजूद थे। इस बैठक के बाद पूर्व मंत्री श्रवण कुमार ने साफ संकेत दिया कि इस बार जदयू कोटे से ज्यादा मंत्रियों को शामिल किया जाएगा। उन्होंने कहा कि पिछली सरकार की तुलना में इस बार मंत्रियों की संख्या बढ़ेगी। इस बयान के बाद अब चर्चा सिर्फ विभाग बंटवारा तक सीमित नहीं रही, बल्कि मंत्रियों की संख्या भी एक बड़ा मुद्दा बन गई है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के भीतर अब दो स्तर पर सवाल उठ रहे हैं: पहला, किस दल से कितने मंत्री होंगे? और दूसरा, कौन-कौन से अहम विभाग किसके पास जाएंगे?

शुरुआत में जब केवल मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने शपथ ली थी, तभी यह साफ हो गया था कि मंत्रियों की सूची बनाना आसान नहीं होगा। पार्टी के भीतर जातीय समीकरणों को साधने और कई अनुत्तरित सवालों के जवाब खोजने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। इस कार्य की जटिलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सूची को अंतिम रूप देने में अच्छा खासा समय लग रहा है। फिलहाल इसका बहाना पश्चिम बंगाल के चुनावों और एमएलसी के खाली पदों को भरने की कवायद को बताया जा रहा है। माना जा रहा है कि बीजेपी के रणनीतिकार पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले कभी भी मंत्रियों की सूची जारी कर सकते हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1।

पहला पेच: विजय कुमार सिन्हा का क्या होगा?

मंत्रियों की सूची तैयार करने में सबसे बड़ी बाधा राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा बन गए हैं। मुख्यमंत्री पद सम्राट चौधरी को सौंपे जाने के बाद, विजय कुमार सिन्हा को उनके कद के बराबर कोई भी मंत्री पद रास नहीं आएगा। जो भी विभाग उन्हें दिए जाएंगे, वे उनके डिमोशन के तौर पर ही देखे जाएंगे। ऐसे में विजय कुमार सिन्हा के कद के लिए दो ही पद उपयुक्त माने जा रहे हैं:

  • विजय कुमार सिन्हा को फिर से विधानसभा अध्यक्ष बनाया जाए।
  • बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व विजय कुमार सिन्हा को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाए।
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जदयू की नजर विधानसभा अध्यक्ष पद पर

इसी बीच, जदयू की नजर विधानसभा अध्यक्ष पद पर भी बताई जा रही है। यह पद फिलहाल बीजेपी के वरिष्ठ नेता प्रेम कुमार के पास है, जिन्हें इस जिम्मेदारी के लिए चुना गया था। वे अतिपिछड़ा वर्ग से आते हैं, ऐसे में यह पद जातीय संतुलन के लिहाज से भी काफी अहम माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि जदयू इस पद के जरिए अपनी स्थिति और मजबूत करना चाहती है, जबकि बीजेपी के लिए यह संतुलन बनाए रखना चुनौती बन सकता है। प्रेम कुमार पार्टी के अनुभवी और प्रतिष्ठित नेता माने जाते हैं।

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बिहार कैबिनेट विस्तार: अब क्या है आगे की राह?

नई सरकार में कुल संभावित मंत्रियों की संख्या 33 के आसपास बताई जा रही है। ऐसे में जदयू अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश में है और अपनी मांगों को लेकर अब ज्यादा सक्रिय नजर आ रही है। सत्ता गठन के दौरान जो सहमति बनी थी, वह अब नए दौर में कड़ी परीक्षा से गुजरती दिख रही है। खास बात यह है कि मुख्यमंत्री के चयन के समय नीतीश कुमार के फैसले को दोनों दलों के विधायकों का पूरा समर्थन मिला था। इस कारण अब उनके किसी भी नए सुझाव को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1। इस पूरे घटनाक्रम के बीच, बिहार कैबिनेट विस्तार अब सिर्फ विभागों के बंटवारे तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सरकार के भीतर शक्ति संतुलन का भी प्रतीक बन गया है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

भूमिहार और वैश्य वोट साधने की रणनीति

अगर मंत्री सूची से विजय कुमार सिन्हा का नाम हटता है और जातीय समीकरणों को ध्यान में रखकर सूची बनाई जाती है, तो तीन बड़े भूमिहार नेता मंत्री पद के दावेदार हो सकते हैं: जीवेश मिश्रा: इनका नाम सबसे पहले आता है। यह दो बार लगातार मंत्री रह चुके हैं। दरभंगा का जाले विधानसभा क्षेत्र राजनीतिक रूप से काफी जटिल माना जाता है, जहां बीजेपी के लिए जीत दर्ज करना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। लेकिन जीवेश मिश्रा ने लगातार तीसरी बार जीत दर्ज कर एक नया रिकॉर्ड कायम किया। रजनीश कुमार: तेघड़ा से भाजपा विधायक रजनीश कुमार भी इस दौड़ में शामिल हैं। वह संगठन के कई पदों पर रहे हैं और बिहार विधान परिषद में सचेतक भी रह चुके हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1।
बिहार मंत्रिपरिषद के विस्तार के बीच भाजपा रणनीतिकारों के लिए दलित और वैश्य समुदाय को भी साधना एक चुनौती है। पहले उम्मीद थी कि वैश्य समुदाय के 35 प्रतिशत वोटों को लक्ष्य कर बिहार के मुख्यमंत्री पद पर किसी को बिठाने की बात हो रही थी। लेकिन, भाजपा ने लव-कुश समीकरण को साधते हुए सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाया। पिछली सरकार में वैश्य समुदाय से दिलीप जायसवाल, नारायण प्रसाद और अरुण शंकर प्रसाद को मंत्री बनाया गया था। इस बार दो नए चेहरे सामने आए हैं, जिनमें दीघा के विधायक संजीव चौरसिया और एमएलसी राजेंद्र गुप्ता को भी मंत्री पद दिया जा सकता है।

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दलित प्रतिनिधित्व: बीजेपी का अगला दांव

दलित राजनीति भी मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल थी। तब यह माना जा रहा था कि बीजेपी शासित किसी भी राज्य में कोई दलित मुख्यमंत्री नहीं है। लेकिन, अब जब सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बन गए हैं, तो संभव है कि इस बार दलित समुदाय से अधिक मंत्रियों को शामिल किया जाए। बीजेपी अब दलित प्रतिनिधित्व पर विशेष ध्यान दे रही है, खासकर जब सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बन चुके हैं। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

कुल मिलाकर, यह बिहार मंत्रिमंडल विस्तार केवल पदों का बंटवारा नहीं, बल्कि आगामी चुनावों की रणनीति भी तय करेगा। बीजेपी के लिए यह जरूरी है कि वह अपने मजबूत नेताओं को उचित प्रतिनिधित्व दे, ताकि संगठन और सरकार के बीच तालमेल बना रहे और बिहार कैबिनेट विस्तार का लाभ उन्हें चुनावी रूप से मिल सके।

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