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Bhagalpur News: बांस की बांसुरिया ‘ कृष्ण ‘ ही नहीं, तिलका भी बजाएगा…रिझाना-गुलेल से निशाना…इसे आता है! | Deshaj Times Special Ep. 15 | कब मिलेगी बाबा तिलका मांझी की आत्मा को शांति?

जब तक रूह में करुणा ना हो, तब तक हाथ में तीर नहीं सजता, बग़ावत की पहली शर्त है कि दिल में अपनों का दर्द होना चाहिए। तुम जिसे 'बाग़ी' कहते हो, उसने पहले जंगल का साज़ बजाया था, मगर जब माटी रोने लगी, तो सुर को भी हथियार होना पड़ा।यह दास्तां सिर्फ़ एक बाग़ी के हौसले की नहीं, बल्कि सुल्तानगंज के तिलकपुर गांव की उस आबो-हवा की है जहाँ एक बच्चे की गुलेल और बांसुरी ने आज़ादी का पहला पाठ पढ़ा था। इतिहास की किताबें भले ही तिलका मांझी को 1784 के पहले सशस्त्र विद्रोह के नायक के रूप में दर्ज करती हैं, मगर राजमहल की चौपालें जानती हैं कि तीर थामने से पहले उस 'तिलका' की उंगलियां बांसुरी पर ज़िंदगी का राज़ बुनती थीं।

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तिलका की गुलेल का निशाना सिर्फ़ महुआ के पके फलों पर नहीं, बल्कि गांव के भूखे बच्चों की ज़रूरतों पर लगता था। शाम ढलते ही जब वह नदी किनारे बांस की झाड़ी में बैठकर सुर छेड़ता, तो इंसानों के साथ-साथ पूरा जंगल ठहर जाता था। मगर सन् 1770 के उस ख़ौफ़नाक अकाल ने सब कुछ बदल दिया। जब कंपनी के टैक्स और जमींदारों के अत्याचार ने महुआ के पेड़ काट डाले और भूखे बच्चों की चीखें हवाओं में तैरने लगीं, तो तिलका ने बांसुरी को ज़मीन पर रख दिया। क्योंकि जब जंगल रो रहा हो, तब सुर झूठे लगने लगते हैं।

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Bhagalpur News: It isn't just 'Krishna' who plays the bamboo flute—Tilka will play it too...The Tilka Manjhi Story
Bhagalpur News: It isn’t just ‘Krishna’ who plays the bamboo flute—Tilka will play it too…The Tilka Manjhi Story

साल के जंगलों में ‘धनुर गुरु’ की पाठशाला ने तिलका को सिर्फ़ निशाना लगाना नहीं सिखाया, बल्कि बहते पानी से सब्र और ताड़ के पेड़ों से दूरंदेशी सिखाई। गुरु ने कहा था—”तीर सिर्फ़ शिकार के लिए नहीं, अन्याय के ख़िलाफ़ भी उठेगा।” और जब वक़्त आया, तो ताड़ के पेड़ पर बैठे उसी तिलका का एक तीर अंग्रेज़ कलेक्टर क्लीवलैंड के घमंड को चूर कर गया।

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महाश्वेता देवी के उपन्यास ‘शालगिरह की पुकार पर’ से लेकर राकेश कुमार सिंह के ‘हूल पहाड़िया’ तक, बाबा तिलका की यह गाथा सिर्फ़ सरकारी फाइलों के भरोसे नहीं, बल्कि आदिवासियों के उन लोकगीतों में ज़िंदा है जो कहते हैं कि कोड़ों की बरसात और घोड़े से घसीटे जाने के बाद भी तिलका को मारा नहीं जा सका। आइए, देशज टाइम्स की इस विशेष प्रस्तुति के ज़रिए उस महानायक के बचपन और बग़ावत के अनछुए पन्नों को टटोलते हैं, जिसका सुर आज भी राजमहल की हवाओं में बह रहा है।

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गुलेल और बांसुरी — तिलका का पहला युद्ध और पहला गीत…तिलकपुर के बुजुर्ग आज भी कहते हैं कि तिलका के हाथ में सबसे पहले धनुष नहीं, गुलेल और बांसुरी आई थी। और यही दो चीजें उसके बचपन की पहचान बन गईं।

गुलेल: निशाने का पहला पाठ

सुबह-सुबह जब बाकी बच्चे नदी किनारे खेलते, तिलका महुआ और आम के पेड़ों के नीचे मंडराता। उसकी कमर में बंधी रहती थी एक छोटी-सी गुलेल। कहते हैं, तिलका गुलेल का ऐसा उस्ताद था कि पेड़ की सबसे ऊंची डाली पर लटका पका आम भी एक झटके में नीचे आ गिरता।

Bhagalpur News: It isn't just 'Krishna' who plays the bamboo flute—Tilka will play it too...The Tilka Manjhi Story
Bhagalpur News: It isn’t just ‘Krishna’ who plays the bamboo flute—Tilka will play it too…The Tilka Manjhi Story

पर तिलका उन फलों को खुद नहीं खाता था। वो गांव के छोटे-छोटे बच्चों को बुलाता, उनकी धोती-फरिया में फल भर देता। जो बच्चा बीमार होता, उसके घर तक फल पहुंचा आता। गांव वाले कहते, “तिलका का निशाना सिर्फ फल पर नहीं, जरूरत पर लगता था।”

बांसुरी: जंगल की आवाज

शाम होते ही तिलका नदी किनारे बांस की झाड़ी में बैठ जाता। बांस काटकर खुद बांसुरी बनाता। उसकी उंगलियां जब बांसुरी पर चलतीं, तो जंगल जैसे थम जाता।

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बुजुर्ग बताते हैं,

“तिलका की बांसुरी ऐसी थी कि गायें चरना छोड़कर सुनने लगतीं। गांव की औरतें कहतीं, ‘ये लड़का बांसुरी नहीं, जंगल का मन बजाता है।’”

रात में जब संथाल गांव में साल के पत्तों पर खाना परोसा जाता, तिलका बांसुरी बजाकर गीत सुनाता। गीत आदिवासी पुरखों के, जंगल के, और आजादी के। बच्चे सो जाते, पर बूढ़े कहते,

“इस लड़के की बांसुरी में कोई आग है।”

जब बांसुरी बदली धनुष में

1770 का अकाल पड़ा। अंग्रेजों और जमींदारों ने जंगल काटकर खेती योग्य जमीन हड़प ली। महुआ के पेड़ कटने लगे, बांस की झाड़ी उजड़ने लगी। नदी का पानी सूखने लगा, बच्चे भूख से बिलखने लगे।

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उसी दिन तिलका ने आखिरी बार बांसुरी बजाई। नदी किनारे बैठा, देर तक बजाता रहा। फिर बांसुरी को जमीन पर रख दिया। उठा, महुआ के पेड़ से एक सूखी लकड़ी तोड़ी, बांस का तीर बनाया।

गांव वालों ने पूछा,

“तिलका, बांसुरी क्यों छोड़ दी?”

तिलका बोला,

“जब जंगल रो रहा हो, तब बांसुरी का सुर झूठ लगता है। अब मेरा सुर तीर बनेगा।”

उसी दिन से गुलेल की जगह धनुष ने ले ली। और वो तिलका, जो बच्चों को फल बांटता था, अब आदिवासियों को हक बांटने निकला।

लोकमानस में गुलेल और बांसुरी

आज भी तिलकपुर में दादी-नानी बच्चों को सुनाती हैं:

“तिलका की गुलेल ने फल गिराया, पर तिलका के तीर ने अंग्रेजों का घमंड गिराया।”

गुलेल और बांसुरी तिलका के बचपन के दो प्रतीक बन गए। एक ने सिखाया निशाना साधना, दूसरे ने सिखाया करुणा रखना। और जब दोनों मिले, तो बना तिलका मांझी—वो योद्धा जिसने तीर भी चलाया और गीत भी गाया।

“वो तीर जो अन्याय के खिलाफ उठा”

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Bhagalpur News: It isn’t just ‘Krishna’ who plays the bamboo flute—Tilka will play it too…The Tilka Manjhi Story

इतिहास की किताबें तिलका मांझी को 1784 के पहले आदिवासी विद्रोह का नायक बताती हैं। पर भागलपुर के सुल्तानगंज स्थित तिलकपुर गांव में आज भी चौपालों पर शाम ढलते ही एक दूसरी कहानी गूंजती है। कहानी है तिलका के “बचपन के तीर” से “क्रांतिकारी के तीर” बनने की। कहानी है जंगल, हवा और लोकगुरु से धनुष सीखने की।

“धनुर गुरु” और जंगल की पाठशाला

बुजुर्ग बताते हैं कि 8-9 साल का तिलका गिल्ली-डंडे से ज्यादा नदी के उस पार साल के जंगल में खोया रहता था। एक सुबह उसने महुआ के पेड़ के नीचे एक बूढ़े संथाल बाबा को देखा। चेहरे पर झुर्रियां, पर आंखें ऐसी जैसे दूर पहाड़ तक देख लें। गांव वाले उसे “धनुर गुरु” कहते थे। कहा जाता था कि उसने अपने बाप-दादा से वो विद्या सीखी थी जो पीढ़ियों से संथाल जंगल में चलती आ रही थी।

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तिलका छिपकर देखने लगा। गुरु ने सूखी लकड़ी उठाई, उस पर बांस का तीर रखा। बिना निशाना देखे, आंख मूंदकर तीर छोड़ा। “सन…” की आवाज आई और दूर लगे करौंदे के फल में तीर जा चुभा।

तिलका दौड़कर गिर पड़ा गुरु के पैरों पर,

“बाबा, मुझे भी सिखाओ!”

गुरु हंसा, “तीर चलाना सीखना है तो पहले जंगल को समझना होगा। राम जी ने विश्वामित्र से विद्या ली थी, पर जंगल ने खुद सिखाया। तू भी सीखेगा, अगर जंगल तुझे अपना ले।”

उस दिन से तिलका की दिनचर्या बदल गई:

  • सुबह: नदी के किनारे खड़े होकर बहते पानी की आवाज सुनना। गुरु कहते, “जब तक तेरा मन पानी जितना स्थिर नहीं होगा, तीर निशाने पर नहीं लगेगा।”

  • दोपहर: पेड़ों पर लटके सूखे पत्तों को देखकर हवा का रुख समझना। “हवा बताएगी तीर कहां भटकेगा।”

  • शाम: ताड़ के पेड़ पर चढ़कर कौवे का घोंसला देखना।

“जितनी दूर कौवा देखता है, उतनी दूर तुझे सोचना होगा।”

एक दिन गुरु ने तिलका के हाथ में कमान थमाई। सामने रखा था महुआ का फल। तिलका ने पहली बार तीर चलाया… और तीर जमीन में जा गड़ा। गुरु बोला,

“गुस्सा मत कर। प्रभु राम जी ने भी एक दिन में धनुर्विद्या नहीं सीखी थी। जंगल तुझे हर गिरने पर उठना सिखाएगा।”

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महीने बीत गए। तिलका अब निशाना चूकता नहीं था। आखिरी दिन गुरु ने उसे बुलाया और कहा,

“अब तू तैयार है। पर याद रख, तीर सिर्फ शिकार के लिए नहीं, अन्याय के लिए भी उठेगा। जब जंगल पर कोई वार करेगा, तब तेरा तीर चुप नहीं बैठेगा।”

कई साल बाद, जब अंग्रेज अफसर अगस्टस क्लीवलैंड जंगल से घोड़े पर गुजरा, तब ताड़ के पेड़ पर बैठा वही तिलका था। उसने वही तीर चलाया जो जंगल के गुरु ने सिखाया था।

गांव वाले आज भी कहते हैं –

“तिलका को तीर जंगल ने सिखाया, हवा ने सिखाया, और अपने लोगों के आंसू ने सिखाया।”

लोककथाओं में Tilka Manjhi का बचपन

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तिलका मांझी का जन्म 11 फरवरी 1750 को भागलपुर के सुल्तानगंज स्थित तिलकपुर गांव में हुआ था। पिता का नाम सुंदरा मुर्मू था। लोककथाओं में उनके बचपन की ये झलकियां मिलती हैं:

  • ताड़ और जानवर वाली कथा: 9-10 साल के तिलका को एक दिन गांव वाले ढूंढते-ढूंढते थक गए। आखिरकार वो ताड़ के पेड़ पर चढ़े मिले। माझी बाबा ने पूछा, “डर नहीं लगा कि जंगली जानवर उठा ले जाएगा?” तिलका ने शान से कहा, “जानवर हमको नहीं उठा सकता, दादू! जानवर को हम ही उठाकर ले आएंगे।” तब गांव के माझी ने कहा था,

“यह लड़का एक दिन सबका नाम ऊंचा करेगा।”

  • अन्याय का पहला पाठ: लोककथाएं कहती हैं कि बचपन में ही तिलका ने जमींदारों और अंग्रेजों द्वारा आदिवासियों पर हो रहे अत्याचार देखे। 1770 के अकाल में उसने अंग्रेजों का खजाना लूटकर गरीबों में बांट दिया था। यही अन्याय बाद में उनके विद्रोह की चिंगारी बना।

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लोकगीतों में गूंजता तिलका

झारखंड और संथाल परगना में आज भी एक लोकगीत गाया जाता है:

“छोटका तिलका ताड़ चढ़ेला, आंख में सूरज समाना रे… गुरु कहेलन, तीर चलइबे, जब जुल्मी राज हिलाना रे…”

इस गीत में तिलका के साहस और भविष्य के विद्रोह का संकेत साफ मिलता है। झारखंड के आदिवासी एक और गीत से तिलका को याद करते हैं:

“तुम पर कोड़ों की बरसात हुई, तुम घोड़ों में बांधकर घसीटे गए, फिर भी तुम्हें मारा नहीं जा सका… मर कर भी तुम मारे नहीं जा सके।”

साहित्यिक रचनाएं – लोकल और ब्रिटिश दस्तावेज

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तिलका मांझी पर कोई “विदेशी लेखक” की किताब नहीं मिली है। ज्यादातर लेखन भारतीय लेखकों ने किया है:

  • लोकल/भारतीय लेखक:

    • महाश्वेता देवी: प्रसिद्ध बांग्ला लेखिका ने तिलका मांझी के जीवन और विद्रोह पर उपन्यास ‘शालगिरह की पुकार पर’ (Shaal Girah Ki Pukar Par) लिखा है।

    • राकेश कुमार सिंह: हिंदी उपन्यासकार ने ‘हूल पहाड़िया’ उपन्यास में तिलका मांझी के संघर्ष को विस्तार से बताया है।

    • झारखंड की लोककथाएं: “बाबा तिलका माझी: झारखण्ड की लोक-कथा” जैसे लोककथा संग्रहों में उनके बचपन की चंचलता, तीर-धनुष चलाना, गुलेल चलाना, बांसुरी बजाना आदि का जिक्र है।

एक नज़र में

Bhagalpur News: It isn't just 'Krishna' who plays the bamboo flute—Tilka will play it too...The Tilka Manjhi Story
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  • बचपन: जंगल, शिकार, तीर-धनुष, ताड़ पर चढ़ना, गुलेल, बांसुरी, निर्भयता।

  • गुरु: कोई राजमहल का गुरु नहीं, बल्कि जंगल, हवा, नदी और लोकगुरु।

  • किसने लिखा: महाश्वेता देवी, राकेश कुमार सिंह, और झारखंड की लोककथाएं।

  • विदेशी लेखक: अभी तक कोई प्रमुख विदेशी लेखक की रचना उपलब्ध नहीं है। अधिकांश जानकारी मौखिक लोकपरंपरा और भारतीय लेखकों पर निर्भर है।

तिलका मांझी की कहानी सिर्फ इतिहास नहीं, लोकविश्वास है। ये बताती है कि सच्ची शिक्षा किताबों से नहीं, धरती और संघर्ष से मिलती है। तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय भी आज उसी शौर्य का प्रतीक है।

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