
सोचिए, नाथनगर और ख़लीफ़ा बाग़ की भीड़ में न बाग़ बचा है न ख़लीफ़ा, मगर नाम आज भी ई-रिक्शा के शोर में गूँजता है। ‘नया बाज़ार’ इस शहर का सबसे पुराना कोना है, और ‘कचौड़ी गली’ में कचौड़ी ढूँढने जाओ तो सिर्फ़ पराठे की ख़ुशबू और बंद पड़े तवों की यादें मिलती हैं। ‘दौलतपुर’ की टूटी खपड़ैल छतें आंसुओं से कहती हैं कि दौलत शायद कभी इतिहास के पन्नों में रही होगी, अब तो सिर्फ़ नाम ही दौलत है।
यह अजीबोगरीब दास्तां सिर्फ़ भागलपुर की नहीं है। गंगा की लहरों ने जहाँ-जहाँ पैर पसारे, वहाँ-वहाँ ऐसे नामों की बस्तियां बसा दीं। बनारस की ‘लंका’ में रावण का पता नहीं मिलता, और दिल्ली के ‘चाँदनी चौक’ पर चाँद की चाँदनी ढूँढना बेमानी है। पटना का ‘खाजपुरा’ दवाइयों की महक में खो गया और इलाहबाद का ‘बघाड़ा’ शेरों के बदले ऑटो-साइकिल की खनक से आबाद है।

भाषाविद कहते हैं कि ये नाम अपभ्रंश हैं, इतिहासकार इन्हें गुज़रे ज़माने की बहीखाता मानते हैं, मगर देशज टाइम्स मानता है कि ये नाम हमारे पुरखों की वो आख़िरी निशानियां हैं जो हक़ीक़त के बदल जाने के बाद भी हमारी स्मृतियों को सीधा रखती हैं। आइए, हिंमांशु शेखर की इस विशेष रिपोर्ट के ज़रिए इन उल्टे नामों और सीधी यादों के उस अनूठे सफ़र पर चलते हैं, जो साबित करता है कि हिंदुस्तान नाम से बड़ा और निशान से कहीं ज़्यादा गहरा है।
नाम उल्टे, याद सीधी — गलियों की वो जुबान जो वक्त से हार नहीं मानती…अगर आप भागलपुर के हैं तो पता ही होगा, और अगर इलाहाबाद या बनारस के हैं तो मेरी बात को कान लगाकर सुनिए। यहाँ शहर नामों का एक बड़ा-सा मजाक है। एक ऐसा मजाक जो सदियों से हंसता भी है और रुलाता भी।
भागलपुर में “कचौडी गली” है। पर अब वहाँ कचौडी नहीं, याद है। 90 के दशक तक दो पराठे की दुकानें थीं—एक में आलू-गोभी की गर्मी, दूसरी में पनीर की खुशबू। आज दुकानें बंद हैं, तवे ठंडे हैं। पर गली का नाम “कचौडी गली” ही है। नाम ऐसा चिपका कि जैसे किसी ने गोंद से चिपका दिया हो। बुजुर्ग कहते हैं, “शायद कभी कचौडी बनी भी हो, पर हमें तो पराठा ही याद है।”

भागलपुर में “कोयला डिपो” है। जहाँ कभी बैलगाड़ी पर कोयले के टुकड़े लदते थे, वहाँ अब प्राइवेट बसों के धुएँ लदते हैं। कोयला चला गया, डिपो का नाम रह गया। लोग कहते हैं, “अब यहाँ कोयला नहीं मिलता, मंजिल मिलती है।”
“आदमपुर” नाम है। सुनकर लगता है जैसे आदम के जमाने का कोई पुराना मंदिर होगा। पर यहाँ 100 साल पुराना भी कोई मंदिर नहीं। सिर्फ इंसान हैं, और उनकी कहानियां। मोहल्ले वाले हंसकर कहते हैं, “आदमपुर में आदम नहीं, सिर्फ आदमी बसते हैं।”

“दौलतपुर” गांव है भागलपुर के पास। नाम सुनकर लगता है हवेलियां होंगी, घोड़े होंगे, खजाने होंगे। पर वहाँ खपड़ैल के घर हैं, कच्ची दीवारें हैं, और छत से टपकता पानी। चाय की दुकान वाला कहता है, “दौलत तो अंग्रेजों के जमाने में होगी बाबू, अब तो नाम ही दौलत है।”
“नया बाजार” भागलपुर का सबसे पुराना बाजार है। 200 साल की दुकानें, पुरानी तिजोरियां, और पीढ़ियों का हिसाब। नया कुछ नहीं, पर नाम “नया” ही है। शायद अंग्रेजों ने दिया होगा, क्योंकि पुराना बाजार स्टेशन के पास था।
“खलीफा बाग चौक” पर न खलीफा है, न बाग। ई-रिक्शा की घंटी, चाट की खट्टी-मीठी खुशबू और दुकानों का शोर। 80 साल के चाचा कहते हैं, “हमने बाग नहीं देखा, पर खलीफा का नाम सुनते-सुनते बूढ़े हो गए।”
और “सुलतानगंज”। गंगा के किनारे बसा तीर्थ। श्रावणी मेले में लाखों कांवड़िए। पर न सुल्तान है, न महल। नाम कैसे पड़ा? कोई कहता है तुर्क सुल्तान ने बसाया, कोई कहता है “सुलगनगंज” से बना—जहाँ गंगा किनारे चिताएं सुलगती थीं। नाम रह गया, सुल्तान इतिहास में खो गया।
गंगा किनारे बसे शहरों की जुबान
भागलपुर अकेला नहीं है। गंगा ने सिर्फ जल नहीं बहाया, नाम भी बहाए। और हर शहर ने उन नामों को अपने हिसाब से ढाल लिया।

वाराणसी/बनारस
“कबीर चौरा”—कबीर का नाम है, पर न उनका घर है, न मठ। अब यहाँ कपड़े और बर्तनों का थोक बाजार है।
“लंका”—बीएचयू (BHU) के पास बसा मोहल्ला। न रावण है, न पुल। छात्रों ने मजाक में नाम रख दिया क्योंकि यहाँ से गंगा दूसरी ओर दिखती है।
“चौक”—कभी सोने-चांदी का केंद्र, आज पान और चाट की भीड़।
प्रयागराज/इलाहाबाद
“कटरा”—मतलब बाजार। पर अब कटरे से ज्यादा रेस्टोरेंट और कोचिंग सेंटर हैं।
“दारागंज”—नाम सुनकर लगे दारोगा का गंज, पर यहाँ किताबों की धूल और पुराने बर्तनों की खनक है।
“बघाड़ा”—नाम से लगे शेर का अड्डा, पर यहाँ साइकिल और ऑटो की दुकानें हैं।
पटना

“खाजपुरा”—नाम सुनकर लगे खाजा-मिठाई की दुकानें होंगी। पर अब यहाँ मेडिकल कॉलेज और हॉस्टलों की चहल-पहल है।
“गोलघर”—गोल है, पर अनाज का नहीं, पर्यटकों का।
“दानापुर”—दाने का भंडार लगता था, पर अब सेना की छावनी है।
दिल्ली
“चांदनी चौक”—न चांद है, न चांदनी। बस भीड़ है, शोर है, और समय से लड़ती दुकानें।
“लोधी गार्डन”—बाग है, पर लोधी नहीं।
“कश्मीरी गेट”—न कश्मीर है, न गेट। अब तो बस इंटरस्टेट बसों का शोर है।
नाम क्यों हो गए उल्टे?
भाषाविद कहते हैं, नाम समय के साथ अपभ्रंश हो जाते हैं। “सुलगनगंज” से “सुलतानगंज” बन गया। “कचौडी गली” में कभी कचौडी बनी होगी, पर बंद हो गई।
इतिहासकार कहते हैं, इतिहास बदलता है, नाम नहीं। “कोयला डिपो” था, कोयला चला गया, बसें आ गईं। पर नाम अपनी जगह अड़ा रहा।

लोककथाकार कहते हैं, कई नाम मजाक में पड़ गए। बीएचयू के छात्रों ने “लंका” कह दिया, और सरकारी नक्शे में भी वही चढ़ गया।
स्थानीय पत्रकार कहते हैं, “नाम एक तरह की स्मृति है। भले हकीकत बदल जाए, नाम हमें पुराने समय से जोड़कर रखता है।”
देशज टाइम्स की पड़ताल
हमने भागलपुर के 10 बुजुर्गों से पूछा—क्या इन नामों को बदल देना चाहिए?

9 ने कहा, “नहीं। नाम में मजा है। कचौडी गली में पराठा खाकर ही बचपन बीता। अब भले दुकान बंद हो, नाम तो याद दिलाता है।”

देशज टाइम्स मानता है कि ये नाम सिर्फ पता नहीं, पुरखों की कहानी हैं। भले खलीफा बाग में बाग न हो, पर नाम सुनकर कोई बच्चा पूछेगा—”दादा, खलीफा कौन था?” और कहानी फिर से जिंदा हो जाएगी।

नाम उल्टा सही, पर याद सीधी रहती है।
और शायद यही भारत है—नाम से बड़ा, निशान से गहरा।








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