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Deshaj Times Special: रसीदें गायब, नक्शा गायब, जवाबदार बहाल, 9 साल, 1100 दुकानदार, फाइलों में दफन वसूली का ‘ रेटकार्ड ‘

नक्शा गायब, रसीदें नदारद, फिर भी हुक्काम बहाल हैं, यहाँ गवाह मुकरते नहीं, सीधे बहीखाते ही बदल दिए जाते हैं। नौ साल से जो रेंग रही है सरकारी दफ़्तर की चौखट पर, उस बेबस अवाम के हक़ को मलाई की तरह बांट दिए जाते हैं।यह दास्तान महज़ कुछ सरकारी बाबुओं की रिश्वतख़ोरी का ब्योरा नहीं है, बल्कि भागलपुर की बागबाड़ी बाज़ार समिति की उन दीवारों की गवाही है जिनके पीछे ग्यारह सौ दुकानदारों के भरोसे का क़त्ल किया गया। साल 2017 में जब सदर अनुमंडल के दंडाधिकारी ने बबरगंज थाने में एफआईआर (FIR) दर्ज कराई, तो लगा था कि भारतीय दंड संहिता की धाराओं का जाल इन भ्रष्टाचारियों को सलाखों के पीछे ले जाएगा। मगर साल 2026 की हक़ीक़त यह है कि क़ानून की तमाम दफ़ाएँ और तीन सौ पन्नों की केस डायरी अफ़सरशाही की सुस्ती के आगे दम तोड़ चुकी हैं।

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स घोटाले की लिखावट इतनी शातिर है कि सरकारी खजाने में जहाँ पाँच हज़ार रसीदें जमा होने का ढोल पीटा गया, वहाँ जाँच की मेज़ पर सिर्फ़ 979 रसीदें ही बरामद हुईं। बाक़ी की चार हज़ार से ज़्यादा रसीदें और उनका लाखों रुपया आख़िर किसकी जेब की नज़र हो गया, इसका जवाब आज भी फाइलों के सन्नाटे में बंद है। हद तो यह है कि सरकारी ज़मीन की असली हद को छुपाने के लिए दफ़्तर की दीवार से बाज़ार समिति का मूल नक्शा ही साज़िशन ग़ायब कर दिया गया, ताकि अतिक्रमण को आवंटन का नाम देकर मनचाही क़ीमत पर बेचा जा सके।

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Bhagalpur’s Baghbari Scam: 4000 Missing Receipts, 1100 Families Still Waiting
Bhagalpur’s Baghbari Scam: 4000 Missing Receipts, 1100 Families Still Waiting

‘पिंटू’ जैसे दलालों और मसनद पर बैठे अफ़सरों की इस साठगांठ ने उन ग्यारह सौ परिवारों को अधर में लटका दिया है जिन्होंने अपनी दुकान और गोदाम के लिए गाढ़े पसीने की कमाई सौंप दी थी। आज वे अपने ही आशियाने में ‘कब्ज़ाधारी’ कहलाने के ख़ौफ़ से घिरे हैं, जबकि आरोपी बाबू कोर्ट की राहत को अपनी ‘क्लीन चिट’ बताकर दोबारा उसी मलाईदार कुर्सी पर सज चुके हैं।

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जब ख़ुद प्रशासनिक अमला यह तस्लीम कर चुका हो कि “पूरा प्रशासन बराबर का दोषी है”, तो फिर नौ साल का यह सन्नाटा साफ़ इशारा करता है कि बड़ी मछलियों को बचाने के लिए फाइलें जानबूझकर ठंडे बस्ते में डाली जा रही हैं। आइए, देशज टाइम्स की इस बेबाक खोजी पड़ताल के ज़रिए बागबाड़ी के उस स्याह खेल की परतें उधेड़ते हैं, जहाँ आज का मज़लूम दुकानदार बाबा तिलका के सुर में अपनी आख़िरी मांग दोहरा रहा है—“रसीद-हिसाब-दुकान हमारा हो”।

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बागबाड़ी बाजार समिति घोटाला: 9 साल, 1100 दुकानदार, और फाइलों में दफन इंसाफ…2017 से 2026 तक—रसीदें गायब, नक्शा गायब, जवाबदार बहाल…भागलपुर से देशज टाइम्स की विशेष पड़ताल

घोटाले की इबारत — जब रसीद से बड़ा हो गया ‘बिना रसीद’ का कारोबार

Bhagalpur’s Baghbari Scam: 4000 Missing Receipts, 1100 Families Still Waiting
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भागलपुर की सरकारी बाजार समिति, जिसे ‘बागबाड़ी बाजार समिति’ कहते हैं, 2017 में एक ऐसे घोटाले का केंद्र बनी जिसने सरकारी सिस्टम की कलई खोल दी।

सदर अनुमंडल के तत्कालीन कार्यपालक दंडाधिकारी राजेश्वरी कुमार पोद्दार ने बबरगंज थाना में FIR दर्ज कराई। FIR संख्या 123/2017। आरोप सीधा और संगीन था—दुकान व गोदाम आवंटन में सरकारी नियमों की धज्जियां उड़ाई गईं। दुकान/गोदाम देने के बदले मोटी रकम वसूली गई, पर सरकारी खजाने में हिसाब नहीं पहुंचा।

रसीद का गणित देखिए:

  • बाजार समिति का दावा—5000 से ज्यादा रसीदें काटी गईं।

  • जांच में मिलीं—सिर्फ 979 रसीदें

  • 4000+ रसीदें कहां हैं? फाइल खामोश है।

वसूली का रेटकार्ड:

Bhagalpur’s Baghbari Scam: 4000 Missing Receipts, 1100 Families Still Waiting
Bhagalpur’s Baghbari Scam: 4000 Missing Receipts, 1100 Families Still Waiting
  • दुकान: 3500 रुपये लेकर 1500 रुपये की रसीद थमा दी गई।

  • गोदाम: 60,000 से 1,00,000 रुपये तक वसूले गए। कई को रसीद मिली ही नहीं।

  • ब्याज पर पैसा: सूर्यलोक कॉलोनी की अनीता से 50,000 रुपये 6% ब्याज पर लिए गए। न रसीद, न वापसी।

पंकज पोद्दार मोदीनगर, पवन यादव सुल्तानगंज, मनोज साह अलीगंज—ऐसे सैकड़ों नाम हैं। सबने अपने भविष्य के लिए पैसे दिए। हिंमांशु राय के नाम पर दिए। कुछ को आधी-अधूरी रसीद मिली, अधिकांश के हाथ खाली रहे।

आज 1100+ दुकानदार असमंजस में हैं—उनकी दुकान वैध है या अवैध? वो मालिक हैं या अतिक्रमणकारी?

नक्शा गायब, अतिक्रमण का खेल शुरू

Bhagalpur’s Baghbari Scam: 4000 Missing Receipts, 1100 Families Still Waiting
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घोटाले की सबसे बड़ी साजिश थी—बाजार समिति दफ्तर में टंगा बागबाड़ी का पुराना नक्शा गायब कर देना।

नक्शा क्यों गायब हुआ? ताकि किसी को पता न चले कि सरकारी जमीन की असली हद क्या है। ताकि अतिक्रमण को ‘आवंटन’ बताकर बेचा जा सके। ताकि 979 रसीदों के पीछे 4000 रसीदों का खेल दब जाए।

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Bhagalpur’s Baghbari Scam: 4000 Missing Receipts, 1100 Families Still Waiting
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जांच में सामने आया—बिना विभागीय निर्देश के पक्की दुकानें तोड़ी गईं। कागज में कुछ लिखा गया, मौके पर कुछ और किया गया। सरकारी जमीन को निजी बही-खाते में बदल दिया गया।

FIR में पांच नाम, धाराएं एक दर्जन

Bhagalpur’s Baghbari Scam: 4000 Missing Receipts, 1100 Families Still Waiting
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बबरगंज थाना में दर्ज FIR में कानून की पूरी फेहरिस्त उतार दी गई—IPC की धारा 406, 409, 417, 418, 420, 423, 431, 464, 465, 468, 477A के साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धाराएं।

नामजद आरोपी:

  • अनुज कुमार—तत्कालीन विशेष पदाधिकारी, बाजार समिति।

  • मुकेश कुमार सिन्हा—लिपिक, सदर अनुमंडल कार्यालय, गोपनीय शाखा।

  • राजेश जायसवाल—लिपिक, बाजार समिति में तैनात।

  • नारायण दास—परिचारी, बाजार समिति।

  • विवेक चौधरी उर्फ पिंटू चौधरी—निजी व्यक्ति/बिचौलिया।

दुकानदारों के बयान में बार-बार एक नाम आया—“पिंटू”। पैसा लेन-देन का बिचौलिया। सिस्टम और जनता के बीच का दलाल। पर सरकारी फाइल में वो सिर्फ ‘निजी व्यक्ति’ दर्ज है।

कार्रवाई का नाटक: सस्पेंड हुए, बहाल भी हो गए

Bhagalpur’s Baghbari Scam: 4000 Missing Receipts, 1100 Families Still Waiting
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2017 में DM आदेश तितरमारे ने कार्रवाई की। लिपिक मुकेश कुमार सिन्हा and राजेश जायसवाल को सस्पेंड कर दिया गया। सस्पेंशन अवधि में मुकेश को सन्हौला प्रखंड और राजेश को नारायणपुर प्रखंड में हाजिरी देने का आदेश हुआ। परिचारी नारायण दास पर कार्रवाई ‘शेष’ रह गई। वो ‘शेष’ 2026 तक शेष ही है।

डीएम की सिफारिश पर मामला निगरानी ब्यूरो को सौंपा गया। निगरानी विभाग ने 300 पेज की केस डायरी कोर्ट में सौंपी। पटना से कुमार अनुज को पूछताछ के लिए नोटिस जारी हुआ।

Bhagalpur’s Baghbari Scam: 4000 Missing Receipts, 1100 Families Still Waiting
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फिर खेल पलट गया। हाईकोर्ट से कुमार अनुज सहित अन्य आरोपितों को राहत मिल गई। राहत मिलते ही मुकेश सिन्हा व राजेश जायसवाल का निलंबन वापस ले लिया गया। दोनों को दोबारा पदस्थापित कर दिया गया। जिन पर वसूली का आरोप था, वो फिर उसी कुर्सी पर बैठ गए।

प्रशासक का कबूलनामा — “पूरा प्रशासन बराबर का दोषी”

बाजार समिति के तत्कालीन प्रशासक हिंमांशु कुमार राय का बयान रिकॉर्ड पर है

“बागबाड़ी बसाने में कुमार अनुज जिम्मेवार हैं ही, साथ ही अवैध बाजार रोकने में भी नाकाम। पूरा प्रशासन बराबर का दोषी है।”

2017 में प्रशासनिक खेमे से दहाड़ सुनाई दी थी—

“सभी दोषियों पर FIR होगा, किसी को बख्शा नहीं जाएगा।”

9 साल बाद सच्चाई ये है—FIR हुई, सस्पेंशन हुआ, बहाली भी हो गई। बख्शा किसे नहीं गया? जवाब फाइल में नहीं है।

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2024-2026: ठंडे बस्ते में जाती फाइल, अधर में लटके दुकानदार

चार्जशीट दाखिल होनी थी। नहीं हुई। निगरानी की 300 पेज की डायरी किस टेबल के नीचे दबी है, किसी को नहीं पता।

Bhagalpur’s Baghbari Scam: 4000 Missing Receipts, 1100 Families Still Waiting
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नया अपडेट 2024 से 2026 तक: शून्य। न जांच आगे बढ़ी, न कार्रवाई हुई। मामला ठंडे बस्ते में जाता दिख रहा है।

और 1100+ दुकानदार? वो आज भी कागज का टुकड़ा लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। उनकी दुकान का भविष्य अधर में है। बैंक लोन नहीं दे रहा, क्योंकि कागज पक्का नहीं। वो पूछते हैं—हमारा 3500, 60,000, 1,00,000 कहां गया? हम वैध हैं या कब्जाधारी?

देशज टाइम्स का सवाल:

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  • 5000 रसीद का दावा था, 979 मिलीं। बाकी 4000+ रसीदें और उनका पैसा कहां है?

  • बागबाड़ी का सरकारी नक्शा किसके आदेश पर गायब किया गया? जिम्मेदार कौन?

  • हाईकोर्ट से राहत मिलने का मतलब ‘क्लीन चिट’ है क्या? अगर हां, तो 1100 दुकानदारों के पैसे का हिसाब कौन देगा?

  • “पूरा प्रशासन बराबर का दोषी है”—यह कहने वाले प्रशासक पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

  • 9 साल बाद भी चार्जशीट क्यों नहीं? क्या फाइलें जानबूझकर दबाई जा रही हैं?

“खाम खुंटी काना हो”—तिलका मांझी का नारा था जल-जंगल-जमीन के लिए। आज बागबाड़ी के दुकानदारों के लिए नारा है—“रसीद-हिसाब-दुकान हमारा हो”।

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जब तक 1100 दुकानदारों को इंसाफ नहीं मिलता, जब तक एक-एक रुपये का हिसाब नहीं मिलता, तब तक ये फाइल बंद नहीं होनी चाहिए।

क्योंकि घोटाला सिर्फ पैसे का नहीं होता। भरोसे का घोटाला सबसे बड़ा घोटाला होता है। और भागलपुर की बागबाड़ी में 2017 से भरोसा ही लूटा जा रहा है।

—देशज टाइम्स खोजी डेस्क, भागलपुर

अपील: अगर आप बागबाड़ी बाजार समिति घोटाले के पीड़ित हैं, आपके पास रसीद, भुगतान का सबूत या कोई जानकारी है, तो देशज टाइम्स से संपर्क करें। नाम गोपनीय रखा जाएगा। क्योंकि सवाल पूछना बंद हुआ, तो घोटाले जिंदा रहेंगे।

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