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मुजफ्फरपुर SKMCH में डॉक्टरों का ‘महा संकट’, 10 दिन में बंद हो सकते हैं कई विभाग!

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Muzaffarpur Health News: बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित उत्तर बिहार के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (SKMCH) में डॉक्टरों की गंभीर कमी के कारण स्वास्थ्य व्यवस्था चरमराने की कगार पर है। अस्पताल प्रशासन ने चेतावनी दी है कि यदि अगले दस दिनों के भीतर सीनियर रेजिडेंट चिकित्सकों की नई नियुक्तियां नहीं हुईं, तो कई महत्वपूर्ण विभागों की सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हो सकती हैं। इसका सीधा असर रोजाना इलाज के लिए आने वाले पांच हजार से अधिक मरीजों पर पड़ने की आशंका है।

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वर्तमान में, SKMCH में सीनियर रेजिडेंट डॉक्टरों के 205 स्वीकृत पद हैं, लेकिन आने वाले समय में केवल 56 सीनियर रेजिडेंट ही कार्यरत रह जाएंगे। यह स्थिति अधिकांश विभागों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के गंभीर अभाव को जन्म देगी। अस्पताल प्रशासन ने स्वास्थ्य मुख्यालय को इस गंभीर स्थिति से अवगत करा दिया है।

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संकट में SKMCH की स्वास्थ्य सेवाएं

SKMCH को उत्तर बिहार के लाखों लोगों के लिए सबसे बड़ा सरकारी रेफरल अस्पताल माना जाता है। यहां केवल मुजफ्फरपुर से ही नहीं, बल्कि सीतामढ़ी, शिवहर, पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, वैशाली, समस्तीपुर, दरभंगा और आसपास के जिलों से भी बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए आते हैं। ऐसे में डॉक्टरों की यह भारी कमी सिर्फ एक अस्पताल तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरे क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। समय पर नई नियुक्तियां न होने पर कई विभागों में नियमित चिकित्सा सेवाएं संचालित करना मुश्किल हो जाएगा।

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इन विभागों पर मंडरा रहा बंदी का खतरा

सबसे अधिक चिंता दंत रोग, टीबी एवं चेस्ट तथा प्लास्टिक सर्जरी विभागों को लेकर है। इन विभागों में सीनियर रेजिडेंट डॉक्टरों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद कोई भी चिकित्सक उपलब्ध नहीं रहेगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि मरीजों को इलाज के लिए दूसरे अस्पतालों का रुख करना पड़ेगा। मेडिसिन विभाग की स्थिति भी बेहद चिंताजनक है, जो अस्पताल का सबसे व्यस्त विभाग माना जाता है। यहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में मरीज भर्ती होते हैं। इस विभाग में 16 स्वीकृत पदों के मुकाबले आने वाले समय में केवल दो सीनियर रेजिडेंट ही शेष रहेंगे, जिससे मरीजों की जांच, वार्ड प्रबंधन और आपातकालीन सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव बढ़ेगा।

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हड्डी रोग विभाग में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है, जहां 12 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल दो चिकित्सकों के भरोसे पूरी व्यवस्था चलाने की नौबत आ रही है। दुर्घटना और ट्रॉमा के मरीजों की अधिक संख्या के कारण इस विभाग पर पहले से ही कार्यभार अधिक रहता है। सर्जरी सेवाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले एनेस्थीसिया विभाग में भी संकट गहरा है। 25 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल तीन चिकित्सक ही ड्यूटी पर बचेंगे। यदि यह स्थिति बनी रहती है, तो निर्धारित ऑपरेशन और आपातकालीन सर्जरी दोनों ही बुरी तरह प्रभावित हो सकती हैं, क्योंकि किसी भी बड़े अस्पताल में एनेस्थीसिया विशेषज्ञों की उपलब्धता ऑपरेशन व्यवस्था की आधारशिला होती है।

अन्य पदों पर भी डॉक्टरों की भारी कमी

यह संकट केवल सीनियर रेजिडेंट डॉक्टरों तक ही सीमित नहीं है। मेडिकल ऑफिसर और जूनियर रेजिडेंट के पद भी बड़ी संख्या में खाली पड़े हैं। शिशु रोग विभाग में मेडिकल ऑफिसर के 20 स्वीकृत पदों में से 11 पद लंबे समय से रिक्त हैं। वहीं, आंख विभाग में दो स्वीकृत पद होने के बावजूद वर्तमान में एक भी चिकित्सक तैनात नहीं है।

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अस्पताल में जूनियर रेजिडेंट के कुल 214 पद स्वीकृत हैं, लेकिन केवल 109 चिकित्सक ही कार्यरत हैं। एनेस्थीसिया विभाग में मेडिकल ऑफिसर के 10 पदों में से एक पद खाली है, जबकि जनरल मेडिकल ऑफिसर के 34 पदों में से भी एक पद रिक्त बताया गया है। इन रिक्तियों के कारण ओपीडी, वार्ड और इमरजेंसी सेवाओं पर लगातार अतिरिक्त दबाव बना हुआ है।

अधीक्षक डॉ. महेश प्रसाद ने बताया कि चिकित्सकों की कमी को लेकर स्वास्थ्य मुख्यालय को लगातार पत्र भेजे गए हैं और शीघ्र नियुक्ति का अनुरोध किया गया है। उनका कहना है कि समय पर नई तैनाती नहीं होने पर कई विभागों में सेवाएं प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

अस्पताल प्रशासन का कहना है कि कई विभागों में कार्यरत सीनियर रेजिडेंट का कार्यकाल अगले सप्ताह समाप्त हो रहा है, जिससे स्थिति और भी गंभीर हो सकती है। ऐसे में, यदि स्वास्थ्य मुख्यालय से जल्द ही नई नियुक्तियों की पहल नहीं की गई, तो उत्तर बिहार की सबसे बड़ी स्वास्थ्य सुविधा मरीजों की सेवा करने में अक्षम हो जाएगी, जिसका खामियाजा हजारों मरीजों को भुगतना पड़ेगा।

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