Darbhanga Sanskrit University: राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप, दरभंगा स्थित कामेश्वरसिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय (KSDSU) में दो वर्षीय आचार्य पाठ्यक्रम का नया स्वरूप अंतिम चरण में पहुँच गया है। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. लक्ष्मी निवास पाण्डेय की अध्यक्षता में गठित समिति ने प्रथम और द्वितीय सेमेस्टर के लिए संशोधित पाठ्यक्रम का निर्माण पूरा कर लिया है। इस महत्वपूर्ण बदलाव के साथ छात्रों को शुल्क में बड़ी राहत देने की भी सिफारिश की गई है।
छात्रों को बड़ी राहत: फीस में होगी भारी कटौती!
लोकभवन पटना द्वारा जारी पीजी गाइडलाइंस के आलोक में, स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए प्रति सेमेस्टर 4800 रुपये निर्धारित किए गए हैं। हालांकि, संस्कृत शिक्षा के निःशुल्क होने, छात्रों की आर्थिक स्थिति और प्राचीन शास्त्रों के संरक्षण-संवर्धन को ध्यान में रखते हुए, पाठ्यक्रम निर्माण समिति के सदस्यों ने इस शुल्क को कम करके एक तिहाई तक करने की जोरदार अनुशंसा की है। यह प्रस्ताव विश्वविद्यालय के विद्वत परिषद और अन्य प्राधिकारों की सहमति के बाद बिहार राज्य उच्चतर शिक्षा परिषद, पटना को भेजा जाएगा।






विश्वविद्यालय के पीआरओ डॉ. निशिकांत ने बताया कि यह संशोधित पाठ्यक्रम 14 जुलाई को प्रस्तावित विद्वत परिषद की बैठक में सहमति के लिए प्रस्तुत किया जाएगा। परिषद की हरी झंडी मिलते ही इसे अनुमोदन के लिए बिहार राज्य उच्चतर शिक्षा परिषद, पटना भेजा जाएगा। वहां से अनुमोदन प्राप्त होने के बाद लोकभवन, पटना और फिर माननीय कुलाधिपति की स्वीकृति के बाद यह नवनिर्मित आचार्य पाठ्यक्रम संस्कृत विश्वविद्यालय में लागू हो जाएगा।
पीआरओ डॉ. निशिकांत ने बताया, ‘द्विवर्षीय आचार्य के प्रथम एवं द्वितीय सेमेस्टर का पाठ्यक्रम जून माह में ही तैयार कर दिया गया था लेकिन लोकभवन पटना के संशोधन सम्बन्धी हालिया निर्देश के मुताबिक अब इसे फिर से प्रक्रिया में लाया गया है।’
नई शिक्षा नीति के तहत बहुविकल्पी और कौशल-आधारित शिक्षा
विशेष कार्य पदाधिकारी (शैक्षणिक) डा. रामसेवक झा के अनुसार, नई स्नातकोत्तर व्यवस्था के अंतर्गत चार-वर्षीय स्नातक कार्यक्रम पूरा करने वाले विद्यार्थियों के लिए एक-वर्षीय तथा तीन-वर्षीय स्नातक कार्यक्रम पूरा करने वालों के लिए द्वि-वर्षीय स्नातकोत्तर कार्यक्रम उपलब्ध होंगे। विद्यार्थियों को प्रथम वर्ष के बाद स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त कर कार्यक्रम से बाहर निकलने का विकल्प भी मिलेगा। इसके अतिरिक्त, छात्रों के पास केवल पाठ्यक्रम, पाठ्यक्रम सहित शोध और केवल शोध जैसे कई विकल्प मौजूद रहेंगे।
नई व्यवस्था में अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट, अनुमोदित मैसिव ओपन ऑनलाइन कोर्स (Moocs) के माध्यम से 40 प्रतिशत तक क्रेडिट अंतरण, भारतीय ज्ञान परंपरा, बहुविषयक एवं कौशल-आधारित शिक्षा तथा सतत् मूल्यांकन व्यवस्था को भी शामिल किया गया है। 2018 से लागू सीबीसीएस आधारित आचार्य पाठ्यक्रम के प्रवेश अध्यादेश और परीक्षा विनियमावली में भी पीजी गाइडलाइंस के आलोक में संशोधन किया जा रहा है, जिससे प्रवेश के मानकों में बदलाव देखने को मिलेगा।
ऐसा होगा दो वर्षीय आचार्य पाठ्यक्रम का नया स्वरूप
पीआरओ डॉ. निशिकांत ने पाठ्यक्रम के नए स्वरूप की जानकारी देते हुए बताया कि प्रथम एवं द्वितीय सेमेस्टर में 6-6 पत्र होंगे, जिनमें प्रत्येक में 22-22 क्रेडिट होंगे। दोनों सेमेस्टर में 4-4 पत्र कोर कोर्स के रहेंगे। पांचवां पत्र GEC (सामान्य वैकल्पिक पाठ्यक्रम) के रूप में ‘भारतीय प्राच्य विज्ञान’ निर्धारित किया गया है। इसके अंतर्गत चार विषय – योगविज्ञानम्, कृषिविज्ञानम्, वास्तुविज्ञानम् एवं आयुर्विज्ञानम् होंगे। छात्रों को प्रथम सेमेस्टर में इनमें से एक और द्वितीय सेमेस्टर में शेष तीन में से किसी एक विषय का चयन करना होगा।
प्रथम सेमेस्टर के छठे पत्र VAC (मूल्य संवर्धित पाठ्यक्रम) के अंतर्गत ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ को रखा गया है। वहीं, द्वितीय सेमेस्टर के छठे पत्र के रूप में VAC-2, AEC (क्षमता वृद्धि पाठ्यक्रम) एवं SEC (कौशल वृद्धि पाठ्यक्रम) में से किसी एक का चयन छात्र करेंगे। द्वितीय सेमेस्टर के षष्ठ पत्र में VAC-2 के तहत नैतिक शिक्षा जिसमें ‘ईशावास्योपनिषद्’ और ‘विदुरनीति’ शामिल हैं। AEC-2 में संस्कृत भाषा दक्षता के लिए ‘प्रौढ-रचनानुवादकौमुदी’ पाठ्यग्रन्थ है, जबकि SEC में कम्प्यूटर शिक्षा को जगह दी गई है।
प्रवेश के लिए नए नियम: आचार्य में प्रवेश के लिए स्नातक (शास्त्री) में पढ़े गए मुख्य विषय (मेजर), गौण विषय (माइनर) या एलाइड विषय में गृहीत विषय के छात्र पात्र होंगे। यदि कोई छात्र मुख्य विषय का चयन करता है, तो उन्हें प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करना अनिवार्य होगा।
इस पाठ्यक्रम निर्माण समिति में कुलपति प्रो. लक्ष्मी निवास पाण्डेय (अध्यक्ष) के साथ प्रो० पुरेन्द्र वारिक, प्रो० दिलीप कुमार झा, प्रो० दयानाथ झा, डॉ० शिवलोचन झा, डॉ० शम्भुशरण तिवारी, प्रो० सुरेश्वर झा, प्रो० निरंजन मिश्र, डॉ० कृष्ण कान्त झा, डॉ० राजेन्द्र झा, प्रो० उपेन्द्र झा और प्रो० बौआनन्द झा जैसे विद्वान शामिल हैं। विशेष कार्य पदाधिकारी (शैक्षणिक) डॉ० रामसेवक झा और डॉ० छबिलाल न्यौपाने व गोपाल उपाध्याय ने तकनीकी व कार्यालयीय सहयोग प्रदान किया। विभागीय प्रतिनिधियों में डॉ० वरुण कुमार झा (ज्योतिष), डॉ० यदुवीर स्वरूप शास्त्री (व्याकरण), डॉ० श्याम सुन्दर ठाकुर (वेद), डॉ० सन्तोष कुमार तिवारी (धर्मशास्त्र), डॉ० प्रमोद मिश्र और डॉ० गोपाल कुमार झा (साहित्य) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यह पहल बिहार संस्कृत शिक्षा के आधुनिकीकरण और छात्रों को भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।








