Allahabad High Court: उत्तर प्रदेश की इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल के संस्थापक मौलाना तौकीर रजा को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने 2025 के बरेली हिंसा मामले में उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस आशुतोष श्रीवास्तव ने यह आदेश सुनाया, जिसके बाद मौलाना तौकीर रजा की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। वह 13 अक्टूबर 2025 से जेल में बंद हैं और अदालत ने उनके भड़काऊ नारों तथा हिंसा में भूमिका पर गंभीर टिप्पणी की है।
बरेली हिंसा और मौलाना तौकीर रजा पर आरोप
यह मामला सितंबर 2025 का है, जब बरेली में ‘आई लव मोहम्मद’ अभियान के समर्थन में एक रैली की अनुमति नहीं मिली थी। इसके बावजूद मौलाना तौकीर रजा ने शुक्रवार की नमाज के बाद इस्लामिया इंटर कॉलेज में लोगों से जमा होने की अपील की थी। धारा 163 के तहत रोक लगाए जाने के बावजूद बड़ी संख्या में भीड़ सड़कों पर उतर आई। पुलिस ने जब भीड़ को रोकने की कोशिश की तो झड़प हो गई, जिसमें पुलिसकर्मी घायल हुए और सरकारी संपत्ति को भी नुकसान पहुंचा।
अदालत ने कहा कि मौलाना तौकीर रजा ने बिना अनुमति के भीड़ इकट्ठा की। घटना के बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से भाषण देकर लोगों का धन्यवाद किया और उनकी तारीफ भी की। कोर्ट ने इस कृत्य पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की है।
‘सिर तन से जुदा’ नारा और कोर्ट की सख्त टिप्पणी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमानत खारिज करने का मुख्य आधार मौलाना तौकीर रजा के भाषण में लगाए गए नारे को बनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सिर तन से जुदा’ जैसा नारा कानून की सत्ता और देश की एकता-अखंडता को सीधे चुनौती देता है। अदालत ने इस नारे को देश की संप्रभुता के लिए गंभीर खतरा माना है।
‘गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सिर तन से जुदा’ नारा कानून की सत्ता और देश की एकता-अखंडता को चुनौती देने वाला है। अदालत ने इसे देश की संप्रभुता के लिए चुनौती माना है।
अदालत ने यह भी साफ किया कि इस भड़काऊ नारे को ‘अल्लाहु अकबर’, ‘सत श्री अकाल’, ‘जय श्री राम’ या ‘हर हर महादेव’ जैसे धार्मिक नारों के बराबर नहीं माना जा सकता। राष्ट्रवादी गुटों ने भी इस नारे को सिरे से खारिज किया है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे नारे समाज में विभाजन और हिंसा को बढ़ावा देते हैं।
आगे क्या? आरोप तय होना बाकी
मामले में चार्जशीट 21 दिसंबर 2025 को ही दाखिल हो चुकी है, लेकिन अभी तक आरोप तय नहीं हुए हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसी आधार पर इस समय मौलाना तौकीर रजा को जमानत देने से इनकार कर दिया। अब देखना होगा कि आरोप तय होने के बाद इस मामले में आगे क्या कानूनी कार्यवाही होती है और क्या मौलाना तौकीर रजा को अपनी बेगुनाही साबित करने का मौका मिलेगा। कोर्ट के इस फैसले से भविष्य में ऐसे भड़काऊ भाषणों और नारों पर न्यायिक सख्ती का संदेश गया है।







