Jharkhand Election 2024 के इस सियासी रण में कई ऐसे कद्दावर चेहरे एक बार फिर किस्मत आजमाने उतरे हैं, जो अपने राजनीतिक सफर के दौरान बार-बार दल बदलने के लिए चर्चा में रहे हैं। Bihar से सटे इस पड़ोसी राज्य में कुछ पूर्व मंत्री और विधायक इस बार अपनी पुरानी या फिर नई पार्टियों के टिकट पर चुनावी समर में हैं, जिनकी राजनीतिक साख दांव पर लगी हुई है।
राधाकृष्ण किशोर से लेकर जलेश्वर महतो तक का सियासी सफर
छत्तरपुर विधानसभा सीट से पांच बार विधायक रह चुके राधाकृष्ण किशोर का राजनीतिक सफर काफी लंबा रहा है। वे सबसे पहले कांग्रेस में थे और तीन बार विधायक चुने गए। इसके बाद जदयू में शामिल होकर वर्ष 2005 में जीते और कुछ समय के लिए मंत्री भी बने। वर्ष 2009 में हार के बाद वे वर्ष 2014 में भाजपा में आए और मोदी लहर में जीते, लेकिन 2019 में टिकट कटने पर आजसू चले गए। आजसू से टिकट मिलने के बावजूद वे हार गए और अक्टूबर 2020 में राजद का दामन थाम लिया। अब छत्तरपुर सीट से वे एक बार फिर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं।
वहीं, राज्य में दो-दो बार मंत्री रह चुके जलेश्वर महतो की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। जदयू के दिग्गज नेता रहे महतो वर्ष 2009 और 2014 में हार के बाद 2019 लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस में शामिल हो गए थे। कांग्रेस ने उन्हें बाघमारा सीट से टिकट दिया था, जहां वे भाजपा प्रत्याशी ढुल्लू महतो से बेहद कम अंतर से हार गए थे। इस बार कांग्रेस ने उन पर फिर भरोसा जताते हुए बाघमारा से मैदान में उतारा है, जहां उनका मुकाबला भाजपा प्रत्याशी और ढुल्लू महतो के भाई शत्रुघ्न महतो से है।
राजा पीटर और सालखन मुर्मू का राजनीतिक उतार-चढ़ाव
कभी झारखंड पार्टी के टिकट पर तमाड़ उपचुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिबू सोरेन को हराकर चौंकाने वाले गोपाल कृष्ण पातर उर्फ राजा पीटर ने भी कई दल बदले हैं। जदयू के टिकट पर 2009 में जीतकर मंत्री बनने वाले पीटर ने 2014 चुनाव से पहले भाजपा का रुख किया था। टिकट न मिलने पर वे निर्दलीय लड़े और हार गए। पूर्व मंत्री रमेश सिंह मुंडा की हत्या के मामले में जेल में रहने के दौरान कोर्ट की अनुमति से उन्होंने 2019 में एनसीपी के टिकट पर तमाड़ से चुनाव लड़ा और चौथे स्थान पर रहे। अब जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने जदयू में वापसी की है और इसी दल से चुनाव लड़ रहे हैं।
दूसरी ओर, पूर्व सांसद सालखन मुर्मू भी कई पार्टियों का सफर तय कर चुके हैं। वर्ष 1977 में आल इंडिया झारखंड पार्टी के अध्यक्ष रहे सालखन मुर्मू 1996 में भाजपा में आए और ओडिशा के मयूरभंज से 1998 व 1999 में लोकसभा सांसद चुने गए। वर्ष 2002 में अपनी पार्टी झारखंड दिशोम पार्टी बनाने के बाद वे बसपा और जेडीपी में भी रहे। वर्ष 2019 के चुनाव से पहले जदयू के प्रदेश अध्यक्ष बने सालखन मुर्मू ने मझिआंव और शिकारीपाड़ा दो सीटों से चुनाव लड़ा था और दोनों जगहों पर उन्हें करारी शिकस्त मिली थी। हालांकि इस बार वे चुनाव मैदान में सक्रिय नजर नहीं आ रहे हैं।
राज्य के कई बड़े नेता टिकट पाने और जीत की आस में लगातार दल बदलते रहे हैं, जिससे इस बार के चुनाव में उनकी व्यक्तिगत सियासी प्रतिष्ठा का कड़ा इम्तहान होना तय माना जा रहा है।
इन तमाम नेताओं का राजनीतिक इतिहास यह साबित करता है कि चुनाव के वक्त समीकरण साधने के लिए पाला बदलना कितना आम हो चुका है। अब देखना यह होगा कि मतदाताओं का रुख इन अनुभवी चेहरों के पक्ष में जाता है या फिर उन्हें एक बार फिर निराशा हाथ लगती है।







