
बिहार में राज्य निर्वाचन आयोग ने नगर निकाय चुनाव की घोषणा तो कर दी गई। मगर अभी चुनाव पर सुप्रीम कोर्ट की सुप्रीम तलवार ज्यों की त्यों लटक रही है। सुप्रीम कोर्ट ने अतिपिछड़ों की राजनीतिक पिछड़ेपन की पहचान तय करने के लिए अतिपिछड़ा आयोग के गठन को चुनौती देने वाली याचिका पर जो बड़ा फैसला दिया है और जो सख्त टिप्पणी की है। उससे राज्य सरकार भी सकते में है। कोर्ट ने उससे भी जवाब जो तलब कर लिया है।
इधर, पटना हाईकोर्ट ने राज्य में नगर निकाय के विघटन की अवधि छह महीनें बढ़ जाने और एडमिनिस्ट्रेटर की ओर से निकायों में कार्य संभाले जाने के मामले पर सुनवाई 16 दिसंबर को करेगी। जस्टिस ए अमानुल्लाह की खंडपीठ ने अंजू कुमारी व अन्य की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई की करते हुए यह जानकारी देते हुए कहा है। वहीं, एडवोकेट जनरल ललित किशोर ने कोर्ट को बताया है कि चुनाव आयोग ने राज्य में नगर निकायों के चुनाव तिथियों की घोषणा कर दी है। दो चरण में यह चुनाव होंगे। 18 दिसंबर और 28 दिसंबर 2022 चुनाव होंगे। 31 दिसंबर तक चुनाव प्रक्रिया पूरी हो जाएगी।
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इसके पहले राज्य निर्वाचन आयोग ने निकाय चुनाव की घोषणा करते हुए बताया कि दो चरणों में चुनाव कराए जाएंगे। वहीं शीर्ष अदालत ने अति पिछड़ा आयोग के गठन को चुनौती देने वाली विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई पूरी कर ली। कोर्ट के आदेश आदेश पर अति पिछड़ा वर्ग आयोग (सुप्रीम कोर्ट के आदेश में आर्थिक पिछड़ि वर्ग आयोग) को डेडिकेटेड कमीशन के रूप में अधिसूचित किये जाने के पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बिहार सरकार से चार सप्ताह के अंदर जवाब तलब किया है।
क्या कहती है अति पिछड़ा आयोग की रिपोर्ट
राज्य सरकार ने अति पिछड़ा आयोग को डेडिकेटेड कमिशन के रूप में अधिसूचित किया था। आयोग ने करीब 51 हजार सैंपल लेकर अति पिछड़ों की राजनीतिक, समाजिक व आर्थिक स्थिति को लेकर अपनी रिपोर्ट तैयार की। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सूर्यकांत व न्यायाधीश जेके महेश्वरी की खंडपीठ ने सुनील कुमार की विशेष अनुमति याचिका पर पर अब आदेश दिया है। कोर्ट ने अगली सुनवाई के लिए चार हफ्ते बाद राज्य सरकार को भी पक्ष रखने के लिए कहा है।
याचिकाकर्ता की वकील मीनाक्षी अरोड़ा का कहना है कि बिहार सरकार ने निकाय चुनाव में पिछड़ों को आरक्षण के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन ही नहीं किया। अति पिछड़ा वर्ग आयोग से यह रिपोर्ट तैयार करवाना ही गलत है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कर दिया कि बिहार में बनाये गये अति पिछड़ा वर्ग आयोग को डेडिकेटेड कमीशन नहीं माना जा सकता। शीर्ष अदालत ने इकोनॉमिकली बैकवर्ड क्लास कमीशन (आर्थिक पिछड़ा वर्ग आयोग ) को डेडिकेटेड कमीशन के रूप में मान्यता नहीं देने की बात कही है।
वहीं, पिछली कोर्ट ने उनसे जानना चाहा है कि क्यों नहीं प्रावधानों और कानूनों के उल्लंघन को मानते हुए एडमिनिस्ट्रेटर द्वारा किए जा रहे कार्यों पर कोर्ट की ओर से रोक लगा दिया जाए। कोर्ट को राज्य सरकार के अधिवक्ता किंकर कुमार ने बताया था कि डेडीकेटेड कमीशन का गठन हाई कोर्ट के निर्देशानुसार कर दिया गया है। उसका रिपोर्ट आते ही राज्य में नगर निकाय का चुनाव करा लिया जाएगा।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता एसबीके मंगलम ने कोर्ट को बताया कि संविधान के प्रावधानों के अनुसार 5 वर्ष की अवधि समाप्त होने के पहले नगर निकाय का चुनाव हर हाल में करा लेना है। लेकिन बिहार में बहुत ऐसे नगर निकाय हैं, जिनको विघटित हुए एक बरस से ज्यादा की अवधि हो गई है। इसके बावजूद इसके अभी भी उन नगर निकायों में एडमिनिस्ट्रेटर की ओर से कार्य कराया जा रहा है, जो कानूनी रूप से सही नहीं है।
कोर्ट को बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इस तरह के कार्यों को गैरकानूनी माना है।याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि जिस प्रकार पंचायत में परामर्श दात्री समिति का गठन किया गया है, उसी प्रकार नगर निकाय में भी परामर्श दात्री समिति का गठन किया जाए।
उन्होंने बताया कि इससे नगर निकाय का कार्य सुचारू रूप से चुनाव संपन्न होने तक हो सकेगा। चुनाव आयोग की ओर से अधिवक्ता संजीव निकेश ने कोर्ट को बताया था कि कोर्ट के निर्देशानुसार डेडिकेटेड कमीशन की रिपोर्ट आ जाने के बाद नगर निकाय का चुनाव सम्पन्न करा लिया जाएगा। इस मामले पर अगली सुनवाई 16 दिसंबर 2022 को की जाएगी।







