
इतिहास अक्सर विजेताओं की स्याही से लिखा जाता है, लेकिन सत्य उस मिट्टी की महक में जीवित रहता है जिसे लहू से सींचा गया हो। संताल परगना की शिराओं में बहने वाला रक्त आज भी एक सवाल बनकर गोड्डा की पहाड़ियों में गूंजता है।
संताल परगना का वह अंचल, जहाँ आज भी हवाएँ ढोल-मांदर की थाप पर थिरकती हैं, एक ऐसे विद्रोह का साक्षी रहा है जिसे इतिहास की मुख्यधारा ने हाशिए पर धकेल दिया। सुंदर पहाड़ी की कंदराओं से उठा वह स्वर, जिसे ग्रामीण लाड और सम्मान से ‘जबरा’ पुकारते थे, आज भी सत्ता के गलियारों से एक तीखा प्रश्न पूछ रहा है।
विसंगतियों का कोहरा और ऐतिहासिक सत्य

इतिहास के पन्ने एक विरोधाभास की धूल से अंटे पड़े हैं। औपनिवेशिक काल के दस्तावेज ढिठाई से दावा करते हैं कि 1818 से पूर्व संताल समुदाय का कोई व्यवस्थित अस्तित्व ही नहीं था। किंतु सुंदर पहाड़ी का कण-कण इस झूठ को धिक्कारता है। यदि संताल अज्ञात थे, तो:
सन 1784 में अगस्तस क्लीवलैंड की छाती को चीरता हुआ वह तीर किसका था?
हवेली खड़गपुर के शाही अस्तबलों से उन 5000 मवेशियों को किसने मुक्त कराया, जो लगान के नाम पर गरीबों की थाली से छीने गए थे?
वह कौन सा ‘महामानव’ था, जिसे चार घोड़ों से बांधकर मिलों तक घसीटा गया, फिर भी जिसकी रीढ़ नहीं झुकी?
जवाब एक ही है—सुंदर पहाड़ी का अमर पुत्र, तिलका मांझी।
सखुआ के पत्तों का गुप्त साम्राज्य: भारत का पहला ‘नेटवर्किंग’ युद्ध
तिलका का विद्रोह केवल आवेश नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म सामरिक रणनीति थी। जब संचार के आधुनिक साधन शून्य थे, तब तिलका ने ‘सखुआ के पत्तों’ को अपना पत्र बनाया। इन पत्तों के जरिए गाँव-गाँव संदेश भेजा जाता था— “सजुआ संताल, लड़ो भाई लड़ो!” यह भारत का पहला ‘नेटवर्किंग’ युद्ध था। पहाड़ियों की कंदराओं से रात के अंधेरे में जब तीर-कमान लिए हज़ारों संताल निकलते थे, तो अंग्रेज़ों के लिए यह समझना नामुमकिन था कि दुश्मन कहाँ से प्रहार कर रहा है।
डकैती बनाम प्रतिशोध: एक वैचारिक विमर्श
अंग्रेजी हुकूमत की फाइलों में तिलका को “कुख्यात डकैत” (Notorious Dacoit) के रूप में दर्ज किया गया। यह शब्द उन शोषकों की कुंठा का प्रतीक था। हकीकत यह थी कि तिलका ने कभी किसी दीन-हीन की कुटिया नहीं उजाड़ी। उन्होंने केवल वही वापस लिया जो हमारा था।
“जब शोषण को कानून बना दिया जाए, तो विद्रोह ही परम धर्म बन जाता है।”
तिलका का विद्रोह ‘आँख के बदले आँख’ का दर्शन नहीं था, बल्कि वह ‘न्याय के बदले न्याय’ की स्थापना थी। वह अंग्रेजी हुकूमत की उस जड़ पर पहला प्रहार था, जिसने भारत की आत्मा को जकड़ना शुरू किया था।
‘सभ्यता’ का दोहरा मुखौटा: वह भीषण प्रहार
भागलपुर के कलेक्टर अगस्तस क्लीवलैंड को इतिहास ने एक ‘सुधारक’ के रूप में चित्रित किया—जिसने स्कूल बनवाए और बस्तियां बसाईं। परंतु उसी क्लीवलैंड के दूसरे हाथ में वह चाबुक था जिसने आदिवासियों के जिस्म को लहू-लुहान किया।
13 जनवरी 1784 की वह शाम साक्षी है, जब तिलका ने ताड़ के पेड़ पर चढ़कर अपने एक विषैले तीर से क्लीवलैंड को घोड़े से नीचे गिरा दिया। यह प्रहार केवल एक अधिकारी पर नहीं, बल्कि उस पाखंड पर था जो विकास की आड़ में स्वाधीनता का गला घोंट रहा था। एक ओर स्लेट-पेंसिल का छलावा और दूसरी ओर फांसी का फंदा—यही था उस दौर की “सभ्यता” का असली चेहरा।
स्मृति का बरगद और वर्तमान की रिक्तता
जब विश्वासघात के कारण तिलका पकड़े गए, तो उन्हें चार घोड़ों से बांधकर भागलपुर की सड़कों पर घसीटा गया। उनका शरीर क्षत-विक्षत था, पर उनकी आँखों में जलती ज्वाला बुझी नहीं थी। 1785 में भागलपुर के एक विशाल बरगद पर उन्हें फांसी दे दी गई।

आज भागलपुर विश्वविद्यालय (TMBU) का नाम उनके नाम पर है, लेकिन विडंबना देखिए कि डिग्रियों पर उनका नाम छापने वाले पाठ्यक्रम, उनकी शौर्य गाथा को वह स्थान नहीं दे पाए जिसके वे हकदार थे।
इतिहास की चुप्पी पर खड़े तीन अनुत्तरित प्रश्न
इतिहासकारों से: तुमने लिखा “1818 तक संतालों को कोई नहीं जानता था”, तो 1785 में क्लीवलैंड की मृत्यु को तुम किस चमत्कार की श्रेणी में रखोगे? क्या वह तीर हवा में स्वयं जन्मा था?
शासकों से: तुमने नाम दिया “तिलकामाँझी विश्वविद्यालय”, तो नई पीढ़ी के सिलेबस में तिलका का संघर्ष और उनकी सांगठनिक शक्ति विस्तार से क्यों नहीं?
हमसे: तुमने उनका जन्मस्थान छीना, इतिहास धुंधला किया, गर्व को दबाया। पर क्या सुंदर पहाड़ी की उस गंध को छीन पाए जो आज भी हवा में मौजूद है?
मिट्टी कभी नहीं मरती। नाम मिटाए जा सकते हैं, शिलालेख तोड़े जा सकते हैं, लेकिन जब तक सुंदर पहाड़ी की गंध हवाओं में घुली है, तिलका जीवित रहेगा। वह याद बनकर भागलपुर के बरगद की जड़ों में है, वह ऊर्जा बनकर आदिवासी गीतों में है।

जब तक शोषण के विरुद्ध कोई भी हाथ उठेगा, तब तक सुंदर पहाड़ी का वह बेटा जीवित रहेगा। तिलका एक व्यक्ति नहीं, वह दमन के विरुद्ध आदिम चेतना का पहला शंखनाद है।








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