Sultanganj Kanwariya Path News: सुल्तानगंज से देवघर जाने वाले कांवरिया पथ पर एक बार फिर अतिक्रमण का साया मंडरा रहा है। शिवभक्तों के लिए बनाए गए इस पवित्र मार्ग को गिट्टी और बालू माफियाओं ने अपना अड्डा बना लिया है। प्रशासन की उदासीनता के कारण हर साल लाखों रुपये खर्च करने के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है।
कांवरिया पथ को विशेष रूप से इस उद्देश्य से तैयार किया गया था कि शिवभक्तों के पैरों में कंकर-पत्थर न चुभें। लगभग डेढ़ दशक पहले निर्मित यह 84.2 किलोमीटर लंबा कच्चा पथ सुल्तानगंज से देवघर तक फैला हुआ है। इसका 8.3 किलोमीटर हिस्सा सुल्तानगंज परिसीमन में, 24.6 किलोमीटर मुंगेर जिले में और शेष 51.3 किलोमीटर बांका जिले में पड़ता है।
दुर्भाग्यवश, सावन-भादो के दो पवित्र महीनों को छोड़कर, साल के बाकी 10 महीने यह पथ अतिक्रमण की चपेट में रहता है। मेला शुरू होने से पहले, प्रशासन को हर बार लाखों रुपये खर्च करके इस अतिक्रमण को हटाना पड़ता है। अब तक किसी भी अतिक्रमणकारी के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है, जिससे उनके हौसले बुलंद हैं।
इस वर्ष भी एके गोपालन कॉलेज से तेघरा फॉल तक के 13.5 किलोमीटर के दायरे में दर्जनों स्थानों पर अतिक्रमण देखा जा रहा है। कारोबारी खुलेआम पथ पर ही गिट्टी और बालू का ढेर लगाकर बेच रहे हैं। इससे श्रद्धालुओं के लिए रास्ता संकरा हो गया है और उन्हें भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।
पथ के किनारे और डिवाइडर पर भी लोगों ने उपले थापकर सुखाने शुरू कर दिए हैं। यह न केवल रास्ते को बाधित करता है, बल्कि स्वच्छता और पवित्रता को भी प्रभावित करता है। यह स्थिति हर साल देखने को मिलती है, जिससे सरकारी प्रयासों पर सवाल खड़े होते हैं।
कांवरिया पथ पर अतिक्रमण की भयावह तस्वीर
शिवभक्तों के बैठने के लिए पथ किनारे लगाए गए 270 कंक्रीट के बेंच और कांवर रखने के लिए बनाए गए 325 स्टैंड में से आधे से अधिक टूट-फूट गए हैं। जो बेंच अभी सही सलामत बचे हैं, उन्हें भी पथ से हटाकर कुछ दूरी पर रख दिया गया है। इन बेंचों का उपयोग भी उपले सुखाने के लिए किया जा रहा है।
कई बेंच तो आसपास के घरों के दरवाजे की शोभा बढ़ा रहे हैं, जो उनकी मूल जगह से गायब कर दिए गए हैं। यह दर्शाता है कि सरकारी संपत्ति की किस तरह से अनदेखी की जा रही है और उसका दुरुपयोग हो रहा है। श्रद्धालुओं के लिए बनाई गई सुविधाओं का यह हाल अत्यंत चिंताजनक है।
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कोरोना काल में वर्ष 2020 और 2021 में श्रावणी मेले का आयोजन नहीं हो सका था, जिसके कारण पथ किनारे से बड़ी संख्या में बेंच गायब हो गए थे। वर्ष 2022 में जब श्रावणी मेला फिर से शुरू हुआ, तो तत्कालीन जिलाधिकारी ने निरीक्षण के दौरान गायब बेंचों की खोजबीन करने का निर्देश स्थानीय अधिकारियों को दिया था।
हालांकि, लाख कोशिशों के बाद भी एक भी गायब बेंच नहीं मिल सका था। उसके बाद जिम्मेदार अधिकारियों ने टूटे-फूटे बेंचों और कांवर स्टैंडों की जैसे-तैसे मरम्मत कर उन्हें पथ किनारे फिर से स्थापित किया। यह एक अस्थायी समाधान था, जिसका परिणाम आज फिर से सामने है।
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सरकारी धन का दुरुपयोग और प्रशासन की अनदेखी
हर साल इस कांवरिया पथ के साथ-साथ सभी चीजों की नए सिरे से मरम्मत कराई जाती है। इस प्रक्रिया में सरकार के लाखों रुपये खर्च होते हैं, जो अतिक्रमण और लापरवाही के कारण व्यर्थ चले जाते हैं। यदि अतिक्रमण पर स्थायी रोक लगाई जाए और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई हो, तो इस धन का सदुपयोग हो सकता है।
दूसरी ओर, पथ किनारे बारिश के पानी से गहरे रेनकट बन गए हैं। इन जगहों पर अधिक मात्रा में सफेद बालू बिछाने की आवश्यकता है, ताकि श्रद्धालुओं को चलने में कोई दिक्कत न हो। यह मरम्मत कार्य भी हर साल के खर्च का एक बड़ा हिस्सा होता है।
यह स्थिति केवल इस कांवरिया पथ की नहीं, बल्कि बिहार के अन्य धार्मिक मार्गों की भी है। Bihar Religious Path News अक्सर ऐसे ही प्रशासनिक ढिलाई और अतिक्रमण की खबरों से भरी रहती है, जहाँ आस्था के नाम पर बने मार्गों की दुर्दशा होती है। जरूरत है एक स्थायी समाधान की, जिससे शिवभक्तों को हर साल परेशानी न उठानी पड़े।
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प्रशासन को चाहिए कि वह केवल मेला से पहले खानापूर्ति न करे, बल्कि पूरे साल कांवरिया पथ की निगरानी करे और अतिक्रमण करने वालों पर सख्त कानूनी कार्रवाई करे। तभी यह पवित्र मार्ग अपनी गरिमा बनाए रख पाएगा और शिवभक्त बिना किसी बाधा के अपनी यात्रा पूरी कर सकेंगे। स्थायी समाधान ही इस समस्या का एकमात्र हल है।







