Darbhanga News: कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय में शोध कार्य को लेकर एक बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। अब विश्वविद्यालय में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की 2022 की विनियमावली के तहत ही शोधकार्य किए जाएंगे। यह नया नियम सत्र 2022-23 से प्रभावी माना जाएगा। इस निर्णय के साथ ही, विश्वविद्यालय में वर्षों से चली आ रही 2016 की पुरानी नियमावली को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया गया है।
यह अहम फैसला कुलपति प्रो. लक्ष्मीनिवास पांडेय की अध्यक्षता में आयोजित स्नातकोत्तर शोध परिषद (PGRC) की बैठक में सर्वसम्मति से लिया गया। इस बैठक में प्रदेश के साथ-साथ अन्य राज्यों से आए विषय विशेषज्ञों ने शोध संबंधी कई व्यवहारिक और सैद्धांतिक सुझाव दिए, जिन्होंने इस नई दिशा को तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।






नई नियमावली से शोधार्थियों को क्या मिलेगा लाभ?
यूजीसी 2022 विनियमावली को लागू करने का मुख्य उद्देश्य शोध कार्य की गुणवत्ता को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप लाना है। इससे शोधार्थियों को आधुनिक पद्धतियों और नवीनतम दिशानिर्देशों के तहत शोध करने का अवसर मिलेगा। पीआरओ डॉ. निशिकांत ने बताया कि इस बदलाव से शोध की प्रक्रिया और भी पारदर्शी तथा प्रभावी बनेगी, जिससे विश्वविद्यालय के अकादमिक स्तर में सुधार आएगा।
पीआरओ डॉ. निशिकांत ने जानकारी देते हुए बताया, ‘बैठक में मूल रूप से छह प्रस्ताव लाये गए थे जिसमें 12 फरवरी को आयोजित गत बैठक को सम्पुष्ट करते हुए इसी बैठक में लिए गए निर्णयों के कार्यान्वयन पर भी सहमति बनी। वहीं, करीब दर्जन भर गवेषकों को अवधि विस्तार दिया गया और शोधबीज व प्रारूप में संशोधन के साथ उसे हरी झंडी दी गयी। शेष गवेषकों के शोधबीज पर यथावत स्थिति में परिषद की सहमति रही। पर्यवेक्षकों के चयन पर भी विचार किया गया।’
बैठक में हुए अन्य महत्वपूर्ण निर्णय
स्नातकोत्तर शोध परिषद की इस बैठक में केवल नियमावली बदलने पर ही नहीं, बल्कि कई अन्य महत्वपूर्ण बिंदुओं पर भी विचार-विमर्श हुआ। लगभग दर्जन भर शोधार्थियों को शोध कार्य की अवधि विस्तार प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त, कुछ शोधबीज और प्रारूपों में संशोधन के बाद उन्हें आगे बढ़ाने की अनुमति दी गई, जबकि शेष शोधबीज पर परिषद की सहमति यथावत बनी रही। शोध पर्यवेक्षकों के चयन को लेकर भी गहन विचार किया गया।
देश भर से जुटे विशेषज्ञ, दिए अहम सुझाव
इस महत्वपूर्ण बैठक के मुख्यातिथि सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, गुजरात के पूर्व कुलपति प्रो. अर्कनाथ चौधरी थे, जिन्होंने शोध संबंधी कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। शोध प्रभारी सह धर्मशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. दिलीप कुमार झा ने स्वागत भाषण दिया और बैठक का संचालन किया। परिषद के कुल 32 सदस्यों में से 31 ने इसमें भाग लिया। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, उत्तराखण्ड और दिल्ली सहित विभिन्न राज्यों से आए वाह्य विषय विशेषज्ञों ने भी अपने अनुभव साझा किए।
बैठक में सभी संकाय अध्यक्षों, विभागाध्यक्षों, प्राचार्यों के साथ-साथ विशेष आमंत्रित सदस्यों में प्रो. राजीव रंजनसिंह, प्रो. शिवाकांत झा, प्रो. व्यास मिश्र, प्रो. शंकर कुमार मिश्र, प्रो. उपेन्द्र कुमार त्रिपाठी, प्रो. उपेन्द्र झा, प्रो. रामपूजन पाण्डेय, प्रो. महेश झा, प्रो. चन्द्रशेखर पाण्डेय, डॉ. राजेश्वर दुबे, प्रो. शत्रुघ्न त्रिपाठी, प्रो. पुरेन्द्र वारिक, प्रो. दयानाथ झा, प्रो. प्रियव्रत मिश्र, प्रो. उमेश शर्मा, डॉ. सीता चरण झा, डॉ. ध्रुव कुमार मिश्र, डॉ. धीरज कुमार पांडेय, डॉ. सुधीर कुमार, डॉ. रामनिहोरा राय, डॉ. शंभुशरण तिवारी, डॉ. शिवलोचन झा, कुलसचिव डॉ. दिनेश कुमार झा और ओएसडी डॉ. रामसेवक झा भी उपस्थित थे। सत्र 2022-23 के लिए कुल 75 शोधार्थियों के शोध प्रारूप और शोध बीज प्रस्तुत किए गए, जिनमें विद्या वाचस्पति के 8 और विद्यावारिधि के 67 शोधार्थी शामिल थे।
कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय का यह निर्णय शोध के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत का संकेत देता है, जिससे आने वाले समय में विश्वविद्यालय के शोध कार्य की गुणवत्ता और प्रासंगिकता में उल्लेखनीय वृद्धि होने की उम्मीद है।








