Darbhanga Sanskrit: संस्कृत सप्ताह समारोह के दौरान दरभंगा में एक भव्य शोभा यात्रा निकाली गई, जिसके बाद विश्वविद्यालय मुख्यालय की यज्ञशाला में चार घंटे तक विशेष ‘उपाकर्म’ क्रिया आयोजित की गई। इस पौराणिक अनुष्ठान में प्रभारी कुलपति प्रो. दिलीप कुमार झा मुख्य यजमान बने, जबकि वेद विभागाध्यक्ष डॉ. ध्रुव मिश्र ने प्रधान पुरोहित की भूमिका निभाई।

संस्कृत शोभा यात्रा से गूंजा दरभंगा, उमड़ा जनसैलाब
संस्कृत सप्ताह समारोह के चौथे दिन, 28 अगस्त को सुबह 6.30 बजे विश्वविद्यालय के छात्रावास परिसर से संस्कृत शोभायात्रा शुरू हुई। यह यात्रा श्यामा मंदिर, र०ल० सं०म०वि० समेत कई प्रमुख स्थानों से होकर गुजरी और पुनः परिसर में ही समाप्त हुई। यात्रा में शामिल संस्कृत प्रेमियों ने ‘जयतु संस्कृतम् – जयतु भारतम्’, ‘भारतस्य भाषा – संस्कृत भाषा’, ‘देवभाषा – संस्कृतभाषा’, ‘मम देशो भारतम् – मम भाषा संस्कृतम्’, ‘संस्कृतं पठतु- आधुनिकः भवतु’, ‘अस्माकं भाषा – संस्कृतभाषा’, और ‘पठतु संस्कृतम् – वदतु संस्कृतम्’ जैसे सूक्त वाक्यों के साथ पूरे शहर को गुंजायमान कर दिया।
क्या है उपाकर्म? जानिए इसका पौराणिक महत्व और विधान
शोभा यात्रा के समापन के बाद, विश्वविद्यालय परिसर की यज्ञशाला में पूजा-पाठ और हवनकुंड में हवन का दौर चला। इस अवसर पर ‘उपाकर्म’ की पौराणिक व्यवस्था को आज के संदर्भों में पूर्ण किया गया। पौराणिक शास्त्रों के अनुसार, सावन पूर्णिमा के दिन गुरु अपने शिष्यों को वेद पाठ और वेद शिक्षा देना शुरू करते थे।
इसके अतिरिक्त, इस विशेष तिथि पर शास्त्र शिक्षा की शुरुआत करने की भी परंपरा रही है। संक्षेप में कहें तो, शास्त्र शिक्षा को प्रारंभ करने के लिए किए जाने वाले कर्म ही ‘उपाकर्म’ कहलाते हैं। इसमें वेद पठन के आरंभ के साथ-साथ हवन-पूजन का विशेष प्रावधान है। उपाकर्म के दौरान गुरु और शिष्य मिलकर ऋषि पूजन, तर्पण और यज्ञोपवित दान का भी विधान पूरा करते हैं।
विश्वविद्यालय के गणमान्य लोगों की उपस्थिति में संपन्न हुए अनुष्ठान
इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में कई प्रमुख पदाधिकारी और विद्वान उपस्थित रहे। प्रभारी कुलपति प्रो. दिलीप कुमार झा के साथ, डीन प्रो. पुरेन्द्र वारिक, डॉ. श्याम सुंदर ठाकुर, डॉ. देवभूति कुमारी, डॉ. प्रमोद कुमार मिश्र, डॉ. रामनिहोरा राय, डॉ. छविलाल न्यौपाने, कुलानुशासक डॉ. कुणाल कुमार झा, डॉ. यदुवीर स्वरूप शास्त्री, डॉ. रामसेवक झा, डॉ. शम्भू शरण तिवारी, पंकज मोहन झा, एनएसएस पदाधिकारी डॉ. सुधीर कुमार और पवन सहनी भी मौजूद थे। यज्ञ के ब्रह्मा की भूमिका संकायाध्यक्ष प्रो. दयानाथ झा ने निभाई, जबकि पीआरओ डॉ. निशिकांत ने कार्यक्रम की जानकारी दी। यह आयोजन संस्कृत भाषा और भारतीय संस्कृति के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के प्रति विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।








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