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Sheetala Ashtami 2026: शीतला अष्टमी का महत्व और भोग परंपराएँ

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Sheetala Ashtami 2026: चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाए जाने वाले शीतला अष्टमी, जिसे बसोड़ा पर्व भी कहा जाता है, का भारतीय संस्कृति में अत्यधिक महत्व है। यह पर्व शीतला माता को समर्पित है, जिनकी पूजा से आरोग्य और शीतलता की प्राप्ति होती है।

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Sheetala Ashtami 2026: शीतला अष्टमी 2026 का महत्व और भोग परंपराएँ

Sheetala Ashtami 2026 के पावन अवसर पर, भक्तजन रोग-दोषों से मुक्ति और परिवार की सुख-शांति के लिए मां शीतला की आराधना करते हैं। इस दिन बासी भोजन करने की परंपरा है, जिसे बसोड़ा के नाम से जाना जाता है। वर्ष 2026 में, शीतला अष्टमी का पावन पर्व बुधवार, 18 मार्च को मनाया जाएगा। अष्टमी तिथि 17 मार्च 2026 को रात 09:30 बजे से प्रारंभ होकर 18 मार्च 2026 को रात 08:00 बजे समाप्त होगी। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह पर्व विशेष रूप से उत्तर भारत में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, जहाँ माता शीतला को प्रसन्न करने के लिए विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं।

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Sheetala Ashtami 2026: मां शीतला को अर्पित किए जाने वाले भोग

शीतला अष्टमी के दिन, माता शीतला को विशेष रूप से बासी और ठंडे पकवानों का भोग लगाया जाता है। यह परंपरा इस पर्व के मुख्य आकर्षणों में से एक है। भोग के लिए एक दिन पहले यानी सप्तमी तिथि को ही विभिन्न व्यंजन तैयार कर लिए जाते हैं। इन पकवानों को ठंडा करके अष्टमी के दिन मां को अर्पित किया जाता है और फिर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

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**पूजा विधि:**
शीतला अष्टमी के दिन भक्तगण सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और साफ वस्त्र धारण करते हैं। इसके बाद माता शीतला की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर उनकी पूजा अर्चना की जाती है। इस दिन कुछ विशेष परंपराएं निभाई जाती हैं:

* माता शीतला की पूजा में रोली, चावल, वस्त्र, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है।
* पूजा के लिए जल से भरा कलश रखा जाता है और दीपक जलाया जाता है (हालांकि, कुछ स्थानों पर दीपक नहीं जलाया जाता है, क्योंकि यह शीतलता का पर्व है)।
* विशेष रूप से नीम के पत्तों का प्रयोग किया जाता है, जिन्हें माता शीतला को प्रिय माना जाता है।
* पूजा के बाद शीतला माता की कथा सुनी जाती है।
* भोग में चढ़ाया गया ठंडा भोजन परिवार के सभी सदस्य ग्रहण करते हैं।

**मां शीतला को प्रिय भोग:**
मां शीतला को प्रसन्न करने के लिए कई प्रकार के स्वादिष्ट और पारंपरिक पकवान तैयार किए जाते हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। इनमें से कुछ प्रमुख भोग निम्नलिखित हैं:

* **दही-भात:** दही और चावल का मिश्रण, जो शीतलता प्रदान करता है।
* **राबड़ी:** दूध और बाजरे से बनी एक पौष्टिक और ठंडी डिश।
* **केसरिया भात:** मीठे पीले चावल, जिन्हें अक्सर शुभ अवसरों पर बनाया जाता है।
* **पुड़ी और हलवा:** ये पकवान सप्तमी की रात को बनाकर ठंडा कर लिया जाता है।
* **गुड़-चने:** पोषक तत्वों से भरपूर और पारंपरिक भोग।
* **बाजरे की रोटी:** यह ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत लोकप्रिय है और ठंडी खाई जाती है।
* **कड़ी चावल:** दही से बनी कड़ी और चावल भी भोग में शामिल किए जाते हैं।

यह सभी व्यंजन एक दिन पहले बनाकर ठंडे किए जाते हैं और अष्टमी के दिन बिना अग्नि के उपयोग के माता को अर्पित किए जाते हैं। यह परंपरा संदेश देती है कि हमें प्रकृति के संतुलन और ऋतुओं के अनुसार जीवनशैली अपनानी चाहिए।

वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम्।
मार्जनी-कलशोपेतं शूर्पालंकृत-मस्तकाम्।।

माता शीतला की यह पूजा न केवल रोगों से मुक्ति दिलाती है, बल्कि परिवार में सुख-समृद्धि और आरोग्य भी लाती है। इस पवित्र दिन पर किया गया दान-पुण्य भी विशेष फलदायी होता है। शीतला अष्टमी का बसोड़ा पर्व हमें सिखाता है कि हमें संयम और स्वच्छता का पालन करते हुए प्राकृतिक जीवनशैली अपनानी चाहिए। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

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