
सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री: बिहार की राजनीति में इन दिनों एक नाम हर जुबान पर है – सम्राट चौधरी। कभी मुख्यमंत्री के धुर विरोधी रहे, फिर उनके डिप्टी सीएम बने और अब बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली है। यह अचानक नहीं हुआ, बल्कि दशकों के सियासी उतार-चढ़ाव और गहरे रिश्तों की कहानी है।
बिहार की राजनीति में सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना किसी फ़िल्मी कहानी से कम नहीं है। उनका राजनीतिक सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री का समर्थन एक अहम कड़ी माना जा रहा है। यह भरोसा रातों-रात नहीं बना, बल्कि कई सालों की राजनीति और व्यक्तिगत रिश्तों का नतीजा है। सम्राट चौधरी के पिता शकुनी चौधरी बिहार के पुराने और कद्दावर नेताओं में से एक रहे हैं। जब नीतीश कुमार ने समता पार्टी का गठन किया था, तब शकुनी चौधरी उनके बेहद करीबी साथियों में शुमार थे। दोनों नेताओं के बीच दशकों से राजनीतिक संबंध रहे हैं, और इसी पुराने रिश्ते ने सम्राट चौधरी के लिए यह रास्ता आसान किया।
एक समय था जब सम्राट चौधरी ने सार्वजनिक मंच से उनका खुलकर विरोध किया था। उन्होंने यह तक कह दिया था कि जब तक उन्हें सत्ता से हटा नहीं देंगे, तब तक ‘मुरेठा’ नहीं खोलेंगे। लेकिन राजनीति में सब कुछ संभव है। समय के साथ स्थितियाँ बदलीं और दोनों के बीच न सिर्फ दूरियाँ कम हुईं, बल्कि भरोसे की एक मजबूत नींव भी रखी गई। यह भरोसा 2024 में डिप्टी सीएम बनने के बाद नहीं, बल्कि 2014 में ही बनना शुरू हो गया था। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1।
सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री पद तक का राजनीतिक सफर: राजद से भाजपा तक
साल 2014 में बिहार की राजनीति में बड़ा उलटफेर हुआ था। जब मुख्यमंत्री भाजपा से अलग होकर अकेले पड़ गए थे, तब सम्राट चौधरी ने एक बड़ा राजनीतिक कदम उठाया। उन्होंने लालू यादव की पार्टी राजद में सेंध लगाई और कई विधायकों को अपने पाले में कर लिया। उस समय यह कदम मुख्यमंत्री के लिए संजीवनी साबित हुआ। इसी दौरान, सम्राट चौधरी, मुख्यमंत्री के साथ हेलिकॉप्टर से अपनी विधानसभा परबत्ता भी गए थे। 57 वर्षीय सम्राट चौधरी का राजनीतिक जीवन कई दलों से होकर गुजरा है। उन्होंने अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत राजद से की थी। राबड़ी देवी की सरकार में वे मंत्री भी बने, लेकिन उम्र विवाद के कारण उन्हें पद छोड़ना पड़ा। बाद में वे दो बार राजद के टिकट पर विधायक चुने गए।
2014 में उन्होंने राजद छोड़ दी और अपने पिता के साथ जदयू में शामिल हो गए। फिर 2015 में जब मुख्यमंत्री और लालू फिर साथ आए, तो सम्राट जीतनराम मांझी की पार्टी हम (HAM) में चले गए। वहाँ उन्हें चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। कुछ समय बाद उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। दिलचस्प बात यह रही कि कभी उनके विरोधी रहे सुशील मोदी ही उन्हें भाजपा में लेकर आए थे।
नेतृत्व क्षमता और भाजपा आलाकमान का भरोसा
2017 में भाजपा में शामिल होने के बाद सम्राट चौधरी की राजनीति ने तेजी पकड़ी। पार्टी ने उन्हें एक मजबूत ओबीसी चेहरे के रूप में आगे बढ़ाया। पहले उन्हें प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया, फिर वे विधान परिषद सदस्य बने और बाद में पंचायती राज मंत्री का महत्वपूर्ण पद संभाला। 2022 में भाजपा ने उन्हें विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी दी। उनके आक्रामक और प्रभावी अंदाज ने पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को काफी प्रभावित किया। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1।
इसी के परिणामस्वरूप, उन्हें बिहार भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया। 2024 में जब मुख्यमंत्री एक बार फिर एनडीए में लौटे, तो सम्राट चौधरी को उपमुख्यमंत्री (डिप्टी सीएम) बनाया गया। अब, लगभग दो साल के भीतर सम्राट चौधरी ने डिप्टी सीएम से सीधे मुख्यमंत्री तक का लंबा सफर तय कर लिया है। उनकी यह सफलता राजनीतिक धैर्य, सटीक रणनीति और सही समय पर लिए गए फैसलों का परिणाम मानी जा रही है। बिहार की राजनीति में इसे एक नए और महत्वपूर्ण दौर की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है। सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री के रूप में अपनी नई भूमिका में क्या कमाल दिखाते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा। उनकी और नीतीश कुमार की बदलती केमिस्ट्री ने भी इस यात्रा में अहम भूमिका निभाई है।
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