Plastic Waste Fuel: देश में अब पेट्रोलियम उत्पादों के आयात से पड़ने वाले भारी-भरकम बोझ को कम करने के लिए नए-नए विकल्प तलाशे जा रहे हैं। इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के बाद अब एक बिल्कुल नए तरीके का पेट्रोल-डीजल विकसित किया गया है, जो बेहद सस्ता होगा और साथ ही पर्यावरण की एक बड़ी समस्या का भी समाधान करेगा। वडोदरा स्थित गति शक्ति विश्वविद्यालय (जीएसवी) के वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक कचरे को सफलतापूर्वक पेट्रोल-डीजल जैसे ईंधन में बदल दिया है। यह सिर्फ लैब तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रमुख दोपहिया निर्माता कंपनी की मोटरसाइकिलों पर इसका सफल परीक्षण भी किया जा चुका है।
₹32 में मिलेगा प्लास्टिक वाला पेट्रोल, माइलेज भी शानदार
वैज्ञानिकों द्वारा विकसित यह ईंधन न सिर्फ सस्ता है, बल्कि इसका माइलेज भी सामान्य पेट्रोल के लगभग बराबर है। परीक्षण के दौरान, 100 सीसी की एक बाइक ने सामान्य पेट्रोल से 62 किलोमीटर प्रति लीटर का एवरेज दिया, जबकि प्लास्टिक से बने एक लीटर पेट्रोल से वह 60 किलोमीटर दौड़ी। यह नई तकनीक प्रदूषण मानकों पर भी खरी उतरी है। प्लास्टिक वाले पेट्रोल से चलने वाली मोटरसाइकिलों को पलूशन अंडर कंट्रोल (PUC) सर्टिफिकेट भी मिला है, जो इसकी पर्यावरणीय सुरक्षा को प्रमाणित करता है।






वैज्ञानिकों का कहना है कि 100 किलोग्राम प्लास्टिक कचरे को प्रोसेस करके करीब 50 किलोग्राम ईंधन निकाला जा सकता है। कच्चा तेल जहां 24 रुपये प्रति लीटर की कीमत पर उत्पादित किया जा सकता है, वहीं अपग्रेड करने के बाद इसकी कीमत 32 रुपये प्रति लीटर होगी। वैज्ञानिकों ने बताया कि इस टेक्नॉलजी से उत्पादित तेल 90 फीसदी तक सामान्य पेट्रोल-डीजल जैसा ही है।
100 किलो कचरे से 50 किलो ईंधन, विमान भी उड़ेंगे?
प्लास्टिक कचरे से ईंधन बनाने की यह तकनीक देश की ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण दोनों के लिए गेमचेंजर साबित हो सकती है। इस ‘पेस्ट्रो पेट्रोल’ की संभावनाओं को देखते हुए, एविएशन कंपनी एयरबस भी गति शक्ति विश्वविद्यालय के साथ मिलकर काम कर रही है। उनका लक्ष्य प्लास्टिक कचरे से विमान उड़ाने वाले ईंधन को भी विकसित करना है। यह बताता है कि इस तकनीक में कितनी व्यापक क्षमता है।
इन दुर्गम इलाकों में पहले होगी शुरुआत, मंत्रालयों में चर्चा
इस प्लास्टिक वेस्ट फ्यूल की शुरुआत उन जगहों पर प्राथमिकता से की जा सकती है, जहां प्लास्टिक कचरा एक बड़ी समस्या है और ईंधन की पहुंच मुश्किल है। इसे लेकर कई मंत्रालयों में गहन विचार-विमर्श चल रहा है। शुरुआती चरण में इन स्थानों पर यूनिट लगाने पर विचार किया जा रहा है:
- लेह
- लद्दाख
- केदारनाथ
- बद्रीनाथ
- झांसी के रेलवे लोकोमोटिव शेड
- कोलकाता की छावनी
यह पहल न केवल दुर्गम क्षेत्रों में ईंधन की आपूर्ति सुनिश्चित करेगी, बल्कि वहां जमा हो रहे प्लास्टिक कचरे को भी उपयोगी संसाधन में बदल देगी। यह तकनीक देश के लिए एक स्थायी और किफायती ऊर्जा स्रोत का मार्ग प्रशस्त करती है, जिससे आयात पर निर्भरता कम होगी और पर्यावरण को भी लाभ मिलेगा।







