Bihar Heritage: मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बिहार के प्राचीन गौरव को पुनर्जीवित करने के लिए एक बड़ी पहल की है। उन्होंने राज्य के प्रमुख पुरातात्विक स्थलों के वैज्ञानिक सर्वेक्षण, उत्खनन, संरक्षण और एकीकृत विकास के लिए एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने का निर्देश दिया है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना का उद्देश्य बोधगया, सुल्तानगंज, मंदार और केसरिया स्तूप जैसे विरासत स्थलों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख पर्यटन केंद्रों के रूप में विकसित करना है।
कैमूर में मुंडेश्वरी मंदिर के आसपास होगा बड़ा बदलाव
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बोधगया, सुल्तानगंज, मंदार, विश्व प्रसिद्ध केसरिया स्तूप एवं मां मुंडेश्वरी मंदिर सहित राज्य के प्रमुख पुरातात्विक स्थलों के संरक्षण, वैज्ञानिक सर्वेक्षण, उत्खनन एवं समग्र विकास के लिए विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने का निर्देश दिया है। यह महत्वपूर्ण निर्णय मंगलवार को हुई एक बैठक के बाद लिया गया, जिसमें पुरातत्वविदों और विरासत विशेषज्ञों के एक प्रतिनिधिमंडल ने कैमूर जिले में स्थित मां मुंडेश्वरी मंदिर परिसर और उसके आसपास के क्षेत्रों के विस्तृत सर्वेक्षण के निष्कर्ष प्रस्तुत किए।







विशेषज्ञों के अनुसार, मंदिर परिसर में बिखरे हजारों प्राचीन अवशेषों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण, संरक्षण और जीर्णोद्धार करके इस क्षेत्र को भारत की पुरातात्विक विरासत का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनाया जा सकता है। मुख्यमंत्री ने विशेषज्ञ समिति द्वारा प्रस्तुत सिफारिशों के आधार पर चरणबद्ध कार्ययोजना तैयार करने का निर्देश दिया।
बैठक में कैमूर क्षेत्र में पुरातात्विक और पारिस्थितिक महत्व के दो स्थलों, तिलहर कुंड और करकटगढ़ के एकीकृत विकास के प्रस्तावों पर भी विचार किया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि वाराणसी-कोलकाता एक्सप्रेसवे से लगभग चार किलोमीटर दूर स्थित इन स्थलों में महत्वपूर्ण प्राकृतिक, प्रागैतिहासिक और पुरातात्विक मूल्य हैं। उनका सुझाव है कि वैज्ञानिक संरक्षण और सुनियोजित विकास के बाद यह क्षेत्र एक नए विरासत और इको-टूरिज्म सर्किट के रूप में उभर सकता है और यूनेस्को की विश्व धरोहर अस्थायी सूची में शामिल होने के योग्य हो सकता है।
बोधगया और केसरिया स्तूप पर विशेष ध्यान
मुख्यमंत्री ने बोधगया में महाबोधि मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों का लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग (LiDAR) और ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (GPR) जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग करके वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का भी निर्देश दिया। ये उन्नत तकनीकें पुरातत्वविदों को बिना खुदाई किए संभावित दबी हुई संरचनाओं और पुरातात्विक अवशेषों की पहचान करने में मदद करेंगी।
इसके साथ ही, सुल्तानगंज और मंदार में ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण स्थलों के संरक्षण और एकीकृत विकास की योजनाओं की भी समीक्षा की गई। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को केसरिया स्तूप के शेष हिस्सों का वैज्ञानिक उत्खनन करने का निर्देश दिया, जो दुनिया के सबसे बड़े बौद्ध स्तूपों में से एक है। इस स्मारक का अब तक केवल कुछ ही हिस्सा उत्खनित किया गया है। इस बैठक में पुरातत्वविद् डॉ. के.के. मुहम्मद भी उपस्थित थे, जिन्होंने इसके पहले के उत्खनन और संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा, “बिहार की धरती में अभी भी अनमोल पुरातात्विक खजाने दबे हुए हैं। इनकी वैज्ञानिक पहचान और संरक्षण से राज्य के इतिहास के नए अध्याय सामने आ सकते हैं। यह पहल न केवल बिहार की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करेगी, बल्कि विरासत पर्यटन, स्थानीय रोजगार और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा देगी।”
इस बैठक में पद्मश्री डॉ. के.के. मुहम्मद, प्रोफेसर रजत सान्याल, प्रोफेसर अनिल कुमार, डॉ. हरिओम शर्मा, विकास आयुक्त मिहिर कुमार सिंह, कला, संस्कृति एवं भवन निर्माण विभाग के सचिव प्रणव कुमार और अन्य वरिष्ठ अधिकारी एवं विरासत विशेषज्ञ उपस्थित थे।









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