Bihar Sugar Price: देशभर में चीनी की औसत खुदरा कीमत लगातार बढ़ रही है, जो 18 अगस्त को 52.3 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई। पिछले एक साल के मुकाबले यह करीब 13 फीसदी ज्यादा है। कई शहरों में तो चीनी 60 से 65 रुपये प्रति किलो बिक रही है, लेकिन बिहार और झारखंड के प्रमुख बाजारों में स्थिति और गंभीर है, जहां दाम 75 रुपये तक पहुंच गए हैं। इस बढ़ती महंगाई के बीच केंद्र सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री आयात को मंजूरी दी है, ताकि कीमतों पर लगाम लगाई जा सके।
सवाल यह है कि चीनी इतनी महंगी क्यों हो रही है? क्या एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने का इस्तेमाल, कमजोर मौसम, घटता स्टॉक या त्योहारी सीजन में बढ़ती मांग इसके पीछे की असली वजह है? और सबसे अहम, सरकार के इस फैसले के बाद आम लोगों को कब और कितनी राहत मिलेगी?
बिहार-झारखंड में चीनी के दाम, कहां कितनी मिठास हुई महंगी?
उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 18 अगस्त को देश की औसत खुदरा चीनी कीमत 52.3 रुपये प्रति किलो थी। हालांकि, झारखंड और बिहार के कई प्रमुख शहरों में खुदरा बाजारों में चीनी की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है। राजधानी पटना में चीनी का खुदरा भाव 75 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है, जबकि रांची में यह 65 से 70 रुपये प्रति किलो बिक रही है।
यहां देखें प्रमुख शहरों में चीनी के मौजूदा दाम:
| शहर | राज्य | कीमत (रुपये/किलो) |
|---|---|---|
| पटना | बिहार | 70-75 |
| दरभंगा | बिहार | 70-72 |
| मुजफ्फरपुर | बिहार | 62-70 |
| सासाराम/चेनारी | बिहार | 70 |
| पूर्णिया | बिहार | 65-68 |
| समस्तीपुर | बिहार | 65-68 |
| बेगूसराय | बिहार | 67-68 |
| रांची | झारखंड | 65-70 |
| धनबाद | झारखंड | 65-68 |
| जमशेदपुर | झारखंड | 64-68 |
| बोकारो | झारखंड | 65-67 |
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि त्योहारी सीजन से ठीक पहले, जब मिठाइयों और पेय पदार्थों की मांग चरम पर होती है, चीनी की कीमतें आम उपभोक्ता की पहुंच से दूर होती जा रही हैं।
क्यों चढ़ रहे चीनी के भाव? एथेनॉल, मौसम या कुछ और कारण
चीनी की मौजूदा कीमतों में तेजी के पीछे कई वजहें हैं, जिन्हें सिर्फ एक कारण से जोड़कर देखना सही नहीं होगा।
- घटता स्टॉक: बाजार में उपलब्ध पुराना स्टॉक सामान्य वर्षों की तुलना में काफी कम है। 1 अक्टूबर से शुरू होने वाले नए सीजन के लिए चीनी का शुरुआती स्टॉक करीब 35-40 लाख टन रहने का अनुमान है, जो बाजार की आरामदायक बफर जरूरत से कम है। मिलों और कारोबारियों के पास पहले जैसी स्टॉक गुंजाइश नहीं बची है।
- त्योहारी मांग: रक्षाबंधन, गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे बड़े त्योहार सामने हैं। इन त्योहारों के दौरान मिठाइयों, पेय पदार्थों और अन्य खाद्य उत्पादों में चीनी की मांग स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। आपूर्ति की चिंता के बीच भविष्य की मांग का अनुमान भी मौजूदा कीमतों को ऊपर ले जा रहा है।
- एथेनॉल का असर: भारत ने पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को पाने के लिए गन्ने से एथेनॉल उत्पादन बढ़ाया गया है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा सीजन में करीब 30 लाख टन चीनी के बराबर उत्पादन एथेनॉल की ओर डायवर्ट हुआ है। हालांकि, सरकार अगले सीजन में गन्ने के जूस और बी-हेवी मोलासिस से एथेनॉल बनाने पर अंकुश लगाने पर विचार कर रही है, और इसकी बजाय मक्का व चावल जैसे दूसरे फीडस्टॉक से एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने की संभावना तलाश रही है।
- मौसम की मार: महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में कम बारिश ने अगली फसल को लेकर चिंता बढ़ा दी है। गन्ना एक पानी पर निर्भर फसल है, और मौसम में गड़बड़ी का असर आने वाले सीजन के उत्पादन पर पड़ सकता है।
सरकार की कार्रवाई: क्या कीमतों पर लगेगी लगाम?
बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार कई कदम उठा रही है।
सरकार ने पहले ही चीनी डीलरों पर स्टॉक रखने की सीमा लागू की थी, जो 1 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक प्रभावी है। इसका उद्देश्य जमाखोरी और सट्टेबाजी पर रोक लगाना है। सरकार का मानना है कि कुछ कारोबारियों की जमाखोरी और वास्तविक माल की आवाजाही के बिना होने वाले सौदों ने बाजार में कृत्रिम कमी की धारणा बनाई।
अब सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री आयात को भी मंजूरी दे दी है, जिसे 31 अक्टूबर तक आयात किया जा सकता है। इसके अलावा, पोर्ट आधारित रिफाइनरियों से घरेलू बाजार में करीब 3 लाख टन रिफाइंड चीनी उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी की जा रही है। बड़े थोक उपभोक्ताओं के लिए भी स्टॉक सीमा को कड़ा किया गया है; सितंबर से नवंबर के बीच, जो खरीदार महीने में 10 टन से ज्यादा चीनी इस्तेमाल करते हैं, वे 15 दिन से अधिक का स्टॉक नहीं रख सकेंगे।
वहीं रोहिणी आचार्य ने लिखा है और पोस्टर जारी किया है। देखिए और पढ़िए
जनता की जेब लूटने वाली मोदी सरकार की एक और कारस्तानी आम आदमी के घरेलू बजट पर महंगी चीनी की कड़वी परेशानी।
पहले चाय में चीनी कम होने पर स्वाद बिगड़ता था, अब चाय में , किसी भी व्यंजन में चीनी डालने पर बजट बिगड़ जा रहा है, मोदी सरकार के सौजन्य से ये महंगाई का कड़वाहट से परिपूर्ण नया स्वाद है , जिससे आम जनता के रोजमर्रा के बजट का दिवाला पिट रहा है l
महंगाई की इस कड़वाहट में मोदी सरकार के मीठे वादों की असलियत छिपी है , जुमलेबाजी वाले भाषणों के माध्यम से परोसी गयी अच्छे दिनों की मिठास अब इतनी कड़वी हो चुकी है कि आम आदमी की जेब में अब बस महंगाई का दंश देने वाली चीटियों की घुसपैठ है।
फिलहाल, चीनी की कीमतों पर दबाव बना रह सकता है, खासकर यदि त्योहारी मांग बढ़ती है और नई फसल की आपूर्ति अपेक्षा से कमजोर रहती है। हालांकि, सरकार का ड्यूटी-फ्री आयात का फैसला बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति लाएगा और कीमतों की तेजी पर कुछ हद तक ब्रेक लगा सकता है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि चीनी की कीमतें लगातार बढ़ती ही रहेंगी, लेकिन सरकारी हस्तक्षेप से उपभोक्ताओं को थोड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।








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