Bihar Glacier Flood: तिब्बत में ग्लेशियर पिघलने के बाद नेपाल में बाढ़ की गंभीर स्थिति बनी हुई है। इसका सीधा असर अब उत्तर बिहार की नदियों पर पड़ सकता है। झील से भारी मात्रा में निकला पानी तेजी से नेपाल की नदियों के रास्ते भारत की ओर बढ़ रहा है। इस खतरे को देखते हुए बिहार में गंडक और कोसी नदी के आसपास के क्षेत्रों में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है। सीमावर्ती जिलों में प्रशासन को चौबीसों घंटे निगरानी रखने के सख्त निर्देश दिए गए हैं। खास तौर पर पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सारण, वैशाली और मुजफ्फरपुर पर विशेष नजर रखी जा रही है।
ग्लेशियर कहां फटा और बिहार तक कैसे पहुंचेगा पानी?
छोचेन खोला और पुरेपु त्सांगपो नदी के संगम के पास ग्लेशियर टूटने की घटना हुई है। इसके बाद लगभग 30 लाख क्यूसेक पानी तेजी से निचले इलाकों की ओर बढ़ रहा है। यह जलप्रवाह नेपाल की भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों से होकर आगे बढ़ेगा, जो बाद में भारत-नेपाल सीमा के पास गंडक नदी के प्रवाह को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, बिहार के लिए फिलहाल राहत की बात यह है कि ग्लेशियर टूटने का मुख्य केंद्र वाल्मीकिनगर गंडक बराज से करीब 250 से 300 किलोमीटर दूर है। इतनी लंबी दूरी तय करने के दौरान पानी के वेग और प्रभाव में कमी आने की संभावना है।
गंडक बराज के सभी 36 गेट खोले गए
संभावित दबाव को देखते हुए वाल्मीकिनगर गंडक बराज पर निगरानी कई गुना बढ़ा दी गई है। बराज के सभी 36 गेट खोल दिए गए हैं, ताकि पानी को नियंत्रित तरीके से निकाला जा सके। शुक्रवार शाम 5 बजे यहां से करीब 1,02,100 क्यूसेक पानी छोड़ा गया। गंडक का जलस्तर भी लगातार बढ़ रहा है। डुमरिया घाट में नदी खतरे के निशान 62.22 मीटर से लगभग 44 सेंटीमीटर ऊपर बह रही है। प्रशासन का मुख्य ध्यान पानी को सुरक्षित तरीके से निकालने और नदी के तटबंधों को सुरक्षित रखने पर केंद्रित है।
मलबा बढ़ा तो तटबंधों पर बढ़ सकता है दबाव
ग्लेशियर टूटने के बाद केवल पानी ही चिंता का कारण नहीं है, बल्कि पानी के साथ बड़ी मात्रा में मलबा आने की भी आशंका है। यह मलबा नदी के प्रवाह को बाधित कर सकता है और इससे तटबंधों, नदी किनारे बने स्पर व अन्य संरचनाओं पर दबाव बढ़ सकता है। इसी वजह से जल संसाधन विभाग ने सारण तटबंध समेत सभी महत्वपूर्ण तटबंधों की 24 घंटे निगरानी का आदेश जारी किया है। मुख्यालय स्तर से भी गंडक नदी के डिस्चार्ज की जानकारी हर आधे घंटे पर ली जा रही है। इंजीनियरों की टीमें लगातार मौके पर रहकर काम कर रही हैं।
NDRF और SDRF टीमें भी तैयार
संभावित बाढ़ की स्थिति से निपटने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF), राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF) और स्थानीय बचाव दल को पूरी तरह तैयार रखा गया है। संबंधित जिलों के डीएम को भी अपने-अपने क्षेत्र के तटबंधों की लगातार निगरानी करने को कहा गया है। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को भी अलर्ट मोड पर रहने के निर्देश दिए गए हैं। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अगर किसी भी इलाके में अचानक पानी बढ़ता है, तो राहत और बचाव का काम बिना किसी देरी के तुरंत शुरू किया जा सके।
कोसी बराज पर भी बढ़ी सतर्कता
नेपाल में बाढ़ के बाद सिर्फ गंडक ही नहीं, कोसी नदी को लेकर भी सतर्कता बढ़ाई गई है। वीरपुर स्थित कोसी बराज के कुल 56 फाटकों में से 17 फाटक खोल दिए गए हैं। जल संसाधन विभाग के अनुसार, कोसी के पूर्वी और पश्चिमी दोनों तटबंध सुरक्षित हैं। स्पर, स्टड और अन्य संरचनाओं की स्थिति भी सामान्य बताई गई है। शुक्रवार सुबह 8 बजे कोसी बराज से लगभग 1,42,360 क्यूसेक पानी डिस्चार्ज हुआ, जबकि बराह क्षेत्र में यह 90,800 क्यूसेक था। दोपहर 12 बजे कोसी बराज का डिस्चार्ज घटकर 1,34,225 क्यूसेक हो गया, वहीं बराह क्षेत्र में यह बढ़कर 99,500 क्यूसेक पहुंच गया। शाम 6 बजे कोसी बराज का डिस्चार्ज फिर बढ़कर 1,44,775 क्यूसेक हो गया और बराह क्षेत्र में यह 99,500 क्यूसेक रहा। नेपाल की भोटेकोशी नदी से लगभग 10 हजार क्यूसेक अतिरिक्त पानी आने की संभावना है, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल इससे कोसी के प्रवाह पर बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है।
उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने कहा कि नेपाल में ग्लेशियर झील टूटने के कारण बाढ़ की गंभीर स्थिति बनी है। लेकिन बिहार के लिए सबसे बड़ी राहत दूरी है। उनके मुताबिक वाल्मीकिनगर बराज और नेपाल में पानी के मुख्य केंद्र के बीच करीब 250 से 300 किलोमीटर की दूरी है। इस वजह से पानी बिहार तक पहुंचते-पहुंचते उसका प्रभाव काफी कम हो गया है। उन्होंने यह भी बताया कि गंडक में पहले से ही सामान्य से कम पानी था, और नदी खतरे के निशान के आसपास थी। ऐसे में नेपाल से आया पानी फिलहाल किसी बेहद भयावह स्थिति में तब्दील नहीं हुआ है। शुक्रवार को वाल्मीकिनगर के पास गंडक में करीब एक लाख क्यूसेक पानी का डिस्चार्ज बना रहा।
उत्तर बिहार की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि नेपाल की पहाड़ियों में होने वाली बड़ी प्राकृतिक घटनाओं का असर यहां तक पहुंच सकता है। गंडक समेत नेपाल से आने वाली दो दर्जन से अधिक पहाड़ी नदियां पश्चिम चंपारण और उत्तर बिहार के लिए महत्वपूर्ण हैं। पहाड़ी इलाकों में अचानक बाढ़ या झील टूटने जैसी घटना होने पर इन नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है। नेपाल की नारायणी नदी को भारत में गंडक के नाम से जाना जाता है, जिसमें कई दूसरी नदियां आकर मिलती हैं। देवघाट के पास त्रिशूली नदी भी नारायणी में मिलती है। यही वजह है कि त्रिशूली और भोटेकोशी में आने वाले अचानक उफान पर बिहार की नजर बनी हुई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, त्रिशूली नदी तिब्बत के क्यिरोंग जिले की पेखु कांगरी पर्वतमाला से निकलती है। ऊंचे पहाड़ी इलाकों से आने के कारण इसका प्रवाह काफी तेज होता है। भोटेकोशी, ल्हेन्दे खोला, मैलमंग खोला, चिलीमे खोला और आंखू खोला जैसी नदियों का पानी भी आगे जाकर नारायणी में मिलता है। अगर पहाड़ी इलाके में अचानक भारी मात्रा में पानी आता है तो इन नदियों का संयुक्त प्रवाह नीचे के क्षेत्रों में दबाव बढ़ा सकता है।
जानकारों के मुताबिक, गंडक का उद्गम तिब्बत के कागबेनी इलाके के एक नाले से माना जाता है, जहां इसे जुगूं खोला कहा जाता है। आगे बढ़ने पर यह काली गंडकी के नाम से जानी जाती है। अलग-अलग स्थानों पर इसमें दूसरी नदियां मिलती जाती हैं और देवघाट के पास यह नारायणी कहलाती है। भारत की तरफ आने के बाद इसे गंडक के नाम से जाना जाता है। यानी नेपाल और तिब्बत में होने वाली घटनाओं का असर इस पूरी नदी प्रणाली के जरिए भारत तक पहुंच सकता है।
विशेषज्ञों ने बताया कि नेपाल में बड़ी संख्या में ग्लेशियर झीलें हैं। इन झीलों में पानी और बर्फ के दबाव से प्राकृतिक अवरोध टूटने का खतरा बना रहता है, जिसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है। ऐसी घटनाओं में पानी के साथ पत्थर, मिट्टी और मलबा भी बहकर आता है, जो नदियों और तटबंधों के लिए अतिरिक्त खतरा पैदा करता है। 26 अगस्त को नेपाल में आई प्रलयंकारी बाढ़ के बाद से बिहार में गंडक के जलस्तर पर लगातार नजर रखी जा रही है। गंडक बराज पर मुख्यालय स्तर से अधीक्षण अभियंता के नेतृत्व में तकनीकी टीम तैनात की गई है। बराज के सभी 36 गेट खोलकर नेपाल से आने वाले पानी को निकालने की व्यवस्था की गई है। फिलहाल प्रशासन की रणनीति तीन स्तरों पर है – नदी के डिस्चार्ज पर नजर, तटबंधों की लगातार निगरानी और किसी भी आपात स्थिति में तुरंत बचाव अभियान। बिहार में अभी हालात नियंत्रण में बताए जा रहे हैं, लेकिन तिब्बत से नेपाल और फिर भारत तक जुड़ी इस पूरी नदी प्रणाली को देखते हुए अगले कुछ घंटे बेहद अहम माने जा रहे हैं।







