Bihar Jhandu Kumar: पहले बात -मलेशिया में थ्रो बॉल चैम्पियनशिप में गोल्ड मैडल जीतने वाला झारखंड का अमरदीप रांची की करेंगे जो सड़क किनारे फड़ लगाकर सब्जियां बेच रहा है।

अमरदीप एक प्रतिभावान खिलाड़ी है. वह चार बार विदेश गया और हर बार मैडल जीतकर आया. उसने अपनी दुकान पर अपने चारों मैडल टांग रखे है. झारखंड की निकम्मी सरकार ना तो उसे खेलने के साधन दे पायी और ना उसके लिए अच्छी नौकरी का इंतजाम कर पायी।.
अब बात बिहार की। ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में नालंदा के हरनौत की मिट्टी से निकले पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया है। उन्होंने न सिर्फ बिहार, बल्कि पूरे देश को गौरवान्वित किया है। पुरुषों की हेवीवेट पैरा पावरलिफ्टिंग स्पर्धा में 190 किलोग्राम का सर्वश्रेष्ठ सफल भार उठाकर झंडू कुमार ने भारत को इस प्रतियोगिता का पहला पदक दिलाया।
पदक जीतने के बाद पहली बार अपने पैतृक क्षेत्र हरनौत पहुंचने पर झंडू कुमार का भव्य स्वागत किया गया। स्थानीय लोगों ने उन्हें रथ पर बैठाकर पूरे नगर क्षेत्र में विजय जुलूस निकाला। जगह-जगह फूल-मालाओं से उनका अभिनंदन किया गया। इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बनने के लिए बड़ी संख्या में खेलप्रेमी, जनप्रतिनिधि और आम लोग उमड़ पड़े।
बचपन में पोलियो ने बदली जिंदगी, फिर भी नहीं मानी हार
झंडू कुमार की कहानी किसी प्रेरणादायक फिल्म से कम नहीं है। पांच साल की छोटी उम्र में पोलियो के कारण उन्हें शारीरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और खेल को ही अपनी जिंदगी का लक्ष्य बना लिया। नालंदा के हरनौत से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने का उनका सफर आर्थिक कठिनाइयों से भरा रहा। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य नहीं थी और जीविका चलाने के लिए सब्जी बेचनी पड़ती थी।
कठिन परिस्थितियों के बावजूद, झंडू ने अपने खेल को जारी रखा और धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर से अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई। परिवार की आर्थिक मदद करने और अपने प्रशिक्षण व डाइट का खर्च जुटाने के लिए उन्होंने करीब आठ-नौ महीने तक ई-रिक्शा भी चलाया। दिनभर काम करने के बाद वह अभ्यास के लिए जिम पहुंचते थे। यह दर्शाता है कि जिस खिलाड़ी ने आज अंतरराष्ट्रीय मंच पर 190 किलो वजन उठाया है, उसने अपनी जिंदगी में परिवार का बोझ और अपने सपनों का भार भी उठाया है।
ग्लासगो में भारत को दिलाया पहला पदक
ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में झंडू कुमार ने पुरुषों की हेवीवेट पैरा पावरलिफ्टिंग स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन किया। उन्होंने अपने पहले प्रयास में 181 किलो वजन सफलतापूर्वक उठाया। इसके बाद, दूसरे प्रयास में 190 किलो वजन उठाकर अपने स्कोर को बेहतर किया। हालांकि, वह तीसरे प्रयास में 196 किलो उठाने में सफल नहीं हो सके।
190 किलो के सर्वश्रेष्ठ सफल प्रयास के साथ झंडू कुमार ने कांस्य पदक जीता और प्रतियोगिता में भारत का पदक खाता खोला। उनका प्रदर्शन इसलिए भी खास रहा क्योंकि वह कुछ समय तक पदक तालिका में शीर्ष स्थान पर बने हुए थे। हालांकि, स्वर्ण पदक चूकने का उन्हें मलाल है, लेकिन उनकी नजर अब बड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं पर है।
प्रधानमंत्री मोदी और खेल मंत्री ने दी बधाई
झंडू कुमार के ऐतिहासिक प्रदर्शन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया के जरिए उन्हें बधाई दी थी। प्रधानमंत्री ने उनके दृढ़ संकल्प और मेहनत की सराहना की। अगस्त 2026 में झंडू कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से शिष्टाचार मुलाकात भी की, जो उनके लिए बेहद खास रही। केंद्रीय खेल मंत्रालय के अनुसार, झंडू ने प्रधानमंत्री से मिली सराहना को अपने लिए बेहद उत्साह बढ़ाने वाला बताया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने झंडू कुमार के प्रदर्शन, दृढ़ संकल्प और मेहनत की सराहना की। उन्होंने झंडू को सोशल मीडिया के जरिए बधाई दी।
कांस्य पदक जीतने के बाद 27 जुलाई 2026 को केंद्रीय युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने भी झंडू कुमार को सम्मानित किया। इस समारोह में उन्हें 10 लाख रुपये का नकद पुरस्कार प्रदान किया गया। केंद्रीय खेल मंत्रालय के अनुसार, मांडविया ने झंडू की उपलब्धि की सराहना करते हुए उन्हें आगे भी शानदार प्रदर्शन जारी रखने और आने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत के लिए बेहतर पदक जीतने के लिए प्रेरित किया।
नाम पर मिले ताने, अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर गूंज
झंडू कुमार की कहानी का एक भावनात्मक पहलू उनके नाम से भी जुड़ा है। बचपन में उन्हें अपने नाम को लेकर ताने और मजाक का सामना करना पड़ा। लेकिन जिस नाम को कभी उपहास का कारण बनाया जाता था, वही नाम आज कॉमनवेल्थ गेम्स के पदक विजेता के रूप में अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान बन चुका है। झंडू ने इन परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि अपनी मेहनत से इसका जवाब दिया और आखिरकार कॉमनवेल्थ पदक तक पहुंचे।
हरनौत में हुए स्वागत समारोह के दौरान वक्ताओं ने झंडू कुमार की सफलता को युवाओं के लिए प्रेरणादायक बताया। यह सफलता दर्शाती है कि प्रतिभा केवल बड़े शहरों या महंगे प्रशिक्षण केंद्रों तक सीमित नहीं है। सही मार्गदर्शन, परिवार का सहयोग और मजबूत इच्छाशक्ति हो तो छोटे शहर और साधारण परिवार से निकला खिलाड़ी भी दुनिया के बड़े मंच पर देश का झंडा लहरा सकता है।
कांस्य पदक जीतने के बाद झंडू कुमार का लक्ष्य अब और भी बड़ा हो गया है। उनका कहना है कि यह उपलब्धि उनके सफर का अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। उनकी नजर अब पैरा एशियन गेम्स और पैरालंपिक जैसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं पर है, जहां वह 232 किलोग्राम के रिकॉर्ड को तोड़ने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। हरनौत के एक साधारण परिवार से निकलकर ग्लासगो में भारत का पहला पदक जीतने तक का झंडू कुमार का संघर्ष आज पूरे बिहार के लिए गर्व और प्रेरणा की कहानी बन चुका है।








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